हल षष्ठी का महत्त्व

हल षष्ठी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को कहा जाता है। यह हिंदू धर्म ग्रंथों में उल्लेखित एक प्रमुख व्रत है। हल षष्ठी के दिन मथुरामंडल और भारत के समस्त बलदेव मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई और ब्रज के राजा बलराम का जन्मोत्सव धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस बार बलराम जयंती 1 सितंबर को मनाई जाएगी। इस दिन गाय का दूध व दही का सेवन वर्जित माना गया है।

इस दिन व्रत करने का विधान भी है।  हल षष्ठी व्रत पूजन के अंत में हल षष्ठी व्रत की छः कथाओं को सुनकर आरती आदि से पूजन की प्रक्रियाओं को पूरा किया जाता है।

व्रत पूजन- धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान शेषनाग द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के रूप में धरती पर अवतरित हुए थे। बलराम जी का प्रधान शस्त्र ‘हल व मूसल’ है। इसी कारण इन्हें हलधर भी कहा गया है। उन्हीं के नाम पर इस पर्व का नाम हल षष्ठी पड़ा। इसे हरछठ भी कहा जाता है। हल को कृषि प्रधान भारत का प्राण तत्त्व माना गया है और कृषि से ही मानव जाति का कल्याण है। इसलिए इस दिन बिना हल चले धरती का अन्न व शाक, भाजी खाने का विशेष महत्त्व है।

संतान दीर्घायु व्रत- हल षष्ठी  के दिन भगवान शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, नंदी और सिंह आदि की पूजा का विशेष महत्त्व बताया गया है। इस प्रकार विधि पूर्वक हल षष्ठी व्रत का पूजन करने से जो संतानहीन हैं, उनको दीर्घायु और श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति होती है।  विद्वानों के अनुसार सबसे पहले द्वापर युग में माता देवकी द्वारा कमरछठ व्रत किया गया था, क्योंकि खुद को बचाने के लिए मथुरा का राजा कंस उनकी सभी संतानों का वध करता जा रहा था। उसे देखते हुए देवर्षि नारद ने हल षष्ठी का व्रत करने की सलाह माता देवकी को दी थी। उनके द्वारा किए गए व्रत के प्रभाव से ही बलदाऊ और भगवान कृष्ण कंस पर विजय प्राप्त करने में सफल हुए थे। उसके बाद से यह व्रत हर माता अपनी संतान की खुशहाली और सुख-शांति की कामना के लिए करती है। इस व्रत को करने से संतान को सुखी व सुदीर्घ जीवन प्राप्त होता है। कमरछठ पर रखे जाने वाले व्रत में माताएं विशेष तौर पर पसहर चावल का उपयोग करती हैं।

हलधर जन्मोत्सव- हल षष्ठी के दिन मथुरा मंडल और भारत के समस्त बलदेव मंदिरों में ब्रज के राजा बलराम का जन्मोत्सव आज भी उसी प्रकार मनाया जाता है। बलदेव छठ को दाऊजी में हलधर जन्मोत्सव का आयोजन बड़ी भव्यता के साथ किया जाता है। दाऊजी महाराज कमर में धोती बांधे, कानों में कुंडल, गले में वैजयंती माला पहनें है। विग्रह के चरणों में सुषल तोष व श्रीदामा आदि सखाओं की मूर्तियां हैं। ब्रजमंडल के प्रमुख देवालयों में स्थापित विग्रहों में बलदेव जी का विग्रह अति प्राचीन माना जाता है।