Sunday, November 18, 2018 06:50 AM

हिंदी के अच्छे दिन कैसे आएंगे

प्रियंवदा

लेखिका, मंडी से हैं

हिंदी भाषा के इस वास्तविक प्रभाव में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त होना अब नितांत अपेक्षित है। हिंदी में तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा की दिशा में जो भगीरथ प्रयास हो रहे हैं, वे हिंदी के अच्छे दिन अवश्य लाएंगे। वह दिन दूर नहीं, जब हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी में संपूर्ण तकनीकी शिक्षण शुरू हो जाएगा...

किसी राष्ट्र की सभ्यता एवं संस्कृति के विकास में उसकी भाषा का विशेष महत्त्व होता है। राष्ट्र के पूर्वजों द्वारा विचार एवं कर्म के क्षेत्र में अर्जित श्रेष्ठ संपत्ति ही उसकी संस्कृति होती है। यह संस्कृति राष्ट्र के माध्यम से अनुप्राणित होती है। भाषा संस्कृति की वाहिका होती है। अत: संस्कृति की आधारशिला भाषा है। कहा जा सकता है कि भाषा और संस्कृति का अटूट संबंध है। विश्व की हर भाषा का ज्ञान हमें हो, इसमें कोई आपत्ति नहीं, किंतु अपनी मातृभाषा की उपेक्षा कर इसे प्राप्त करना, यह मंथन का विषय है। अपनी मूल संस्कृति का सर्वनाश करके किसी भी विकास की कल्पना मृगमरीचिका नहीं तो और क्या है? किसी राष्ट्र की सभ्यता एवं संस्कृति को नष्ट करना हो, तो उसकी भाषा को नष्ट कर दीजिए, इस सूत्र को भारत पर शासन करने वाले विदेशियों ने भलीभांति समझा। लार्ड मैकाले ने कहा कि हम इस देश में तब तक रहेंगे, जब तक हम इसकी संस्कृति व आध्यात्मिकता को छिन्न-भिन्न नहीं कर लेते। इसलिए उसने भारत में शासन तंत्र एवं शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बनाने की सिफारिश करके भारतवासियों को बौद्धिक गुलाम बनाने में भारतीय संस्कृति, स्थानीय बोलियों तथा राष्ट्रभाषा पर चोट की और इसमें सफल भी हुए।

यद्यपि आज भारत स्वाधीन है, परंतु वैचारिक और मानसिक दृष्टि से अब भी दास है। अपने ही देश के मूर्धन्य उत्तरदायी लोग हिंदी की अस्मिता को सुरक्षित रखने के प्रति उदासीन हैं। 14 सितंबर, 1949 को भारतीय संविधान ने देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी भाषा को भारत की प्रशासनिक भाषा के रूप में स्वीकार किया और यही वजह है कि 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में देश के विभिन्न भागों में अपने-अपने स्तर पर छोटे-बड़े पैमाने बनाकर मनाया जाता है, परंतु प्रश्र यह उठता है कि क्या यह कत्र्तव्य केवल एक दिन के लिए निभाना ही अनिवार्य है या वर्ष के अन्य दिनों में भी इसका कोई महत्त्व है। आजादी के 68 वर्ष का स्वतंत्रता दिवस मनाने वाला महान राष्ट्र भारत जो एक बार फिर विश्व पटल पर अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करने को लालायित है, यदि अपनी ऐसी राष्ट्रभाषा के विषय में विवादग्रस्त रहे, जो विश्व में चीनी भाषा के बाद सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है तो और क्या कहा जाए?

हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए बुद्धिजीवी, समाज सुधारक, विचारक गत शताब्दियों से संघर्ष करते आ रहे हैं, जिससे देश में एकता, अखंडता कायम रह सके। राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में सक्रिय योगदान देने वालों में पंडित मदन मोहन मालवीय, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय, विपिन चंद्रपाल, राजा राम मोहन राय, महात्मा गांधी, राजेंद्र प्रसाद, काका कालेलकर, पुरुषोत्तम दास टंडन, सेठ गोविंद दास आदि का नाम आदर से लिया जाता है। इन सभी समाज सुधारक नेताओं ने हिंदी को जनता के संपर्क का माध्यम बनाया तथा अपने भाषण हिंदी भाषा में दिए। इतने संघर्षशील दौर से गुजरती राजभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा का स्थान नहीं मिल पाया है। अंगे्रजी भाषा सार्वभौमिक रूप से सर्वमान्य एक अंतरराष्ट्रीय भाषा है एवं उसका अपना कार्य क्षेत्र है। क्षेत्रीय भाषाओं की अपनी महता है, किंतु एक राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के अतिरिक्त हमारे पास और क्या विकल्प है? किसी भी राष्ट्र पर किसी विदेशी भाषा को थोपना आधुनिकता के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध है। वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर हिंदी को एक प्रकार से मान्यता प्राप्त हो चुकी है। दूतावासों के माध्यम से ही नहीं, अनेक विश्वविद्यालयों में हिंदी के पठन-पाठन तथा अनुसंधान की व्यवस्था हो चुकी है। आज हिंदी विश्व में एक सौ से अधिक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। विश्व में हिंदी जानने वालों की संख्या 1023 मिलियन से अधिक है। यह तथ्य हिंदी के अच्छे दिनों का ही द्योतक है कि हिंदी का साहित्य विश्व में हिंदी की अंतरराष्ट्रीयता को बुलंदी के साथ स्थापित कर रहा है। हाल ही में मारिशस में संपन्न हुए विश्व हिंदी सम्मेलन और उसमें हिंदी के उत्थान को लिए गए संकल्पों से उम्मीद की कल्पना तो कर ही सकते हैं। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के इतिहास में पहली बार अपना वक्तव्य हिंदी में प्रस्तुत करके भारत के गौरव को बढ़ाने और वर्चस्व को स्थापित करने का स्तुत्य कार्य किया था।

इसी शृंखला को आगे बढ़ाते हुए देश के वर्तमान प्रधानमंत्री अपनी विदेश यात्राओं में हिंदी में अपना वक्तव्य प्रभावशाली ढंग से रखकर न केवल हिंदी को भारत की भाषा शिरोमणि बता रहे हैं, बल्कि विश्व में पूरे देश को हिंदी भाषा के प्रति गौरवान्वित अनुभव करवा रहे हैं। समय के बदलते इस दौर में हिंदी भाषा के इस वास्तविक प्रभाव में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त होना अब नितांत अपेक्षित है। हिंदी में तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा की दिशा में जो भगीरथ प्रयास हो रहे हैं, वे हिंदी के अच्छे दिन अवश्य लाएंगे। वह दिन दूर नहीं, जब हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी में संपूर्ण तकनीकी शिक्षण शुरू हो जाएगा। संवैधानिक दृष्टि से हिंदी की स्थिति मजबूत है। हिंदी में राष्ट्रभाषा के सभी गुण पाए जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायालयों, बैंकों की भाषा का हिंदीकरण प्रशासनिक प्रयासों के चलते धीरे-धीरे हिंदी के अच्छे दिनों की सुनहरी किरण धरातल पर लाने में सहायक सिद्ध होगा।