Tuesday, November 12, 2019 09:51 AM

हिंदी को प्रोत्साहन मिला, पर अंग्रेजी से खतरा

क्या वास्तव में हिमाचल हिंदी राज्य है -2

क्या वास्तव में हिमाचल हिंदी राज्य है? क्या हिंदी को राज्य में वांछित सम्मान मिल पाया है अथवा नहीं? इस बार राष्ट्र भाषा से जुड़े ऐसे ही कुछ प्रश्नों पर विभिन्न साहित्यकारों के विचारों को लेकर हम आए हैं। 14 सितंबर को विश्व हिंदी दिवस है। इसलिए ऐसे प्रश्नों की प्रासंगिकता है। पेश है इस विषय पर विचारों की दूसरी और अंतिम कड़ी...     

(अगली बार देखें एक नई बहस)

केआर भारती

मो. 9816672455

हिमाचल में हिंदी की दिशा व दशा को दो दृष्टिकोणों से देखा व परखा जाना आवश्यक है। पहला यह कि हिंदी प्रदेश में बोलचाल व संपर्क भाषा के रूप में कितना विस्तार ले सकी है और दूसरा यह कि प्रदेश की राजभाषा के रूप में हिंदी भाषा कितनी स्थापित हो सकी है। जहां तक प्रदेश में हिंदी भाषा में बोलचाल की बात है, यह बेझिझक कहा जा सकता है कि प्रदेश के समस्त भागों में बोलचाल की भाषा हिंदी ही है। हालांकि प्रदेश में स्थानीय बोलियां जैसे चंबयाली, कांगड़ी, कहलूरी, लाहौली, कुल्लवी, मंडियाली, महासुवी, सिरमौरी, हिंडूरी इत्यादि भी प्रचलित हैं, लेकिन उन सबके मूल में हिंदी ही है। यहां तक कि अति दुर्गम जनजातीय क्षेत्रों में भी हिंदी ही बोलचाल व संपर्क साधने के काम में प्रयुक्त होती है। साक्षरता की बढ़ती दर के फलस्वरूप हिंदी और इंग्लिश का मिश्रित रूप यानि हिंग्लिश का प्रचलन भी प्रदेश में देखने को मिल रहा है। हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से प्रदेश में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। स्कूली स्तर पर प्रथम कक्षा से दसवीं कक्षा तक हिंदी अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाई जा रही है। विद्यार्थियों का हिंदी की ओर ध्यान आकृष्ट करने के उद्देश्य से हिमाचल प्रदेश सरकार का भाषा एवं संस्कृति विभाग हर वर्ष बच्चों के लिए पहले जिला स्तर पर हिंदी भाषण, निबंध लेखन तथा हिंदी प्रश्नोत्तरी का आयोजन करवाता है। इसके पश्चात स्कूली बच्चों का चयन इन्हीं राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं के लिए किया जाता है। महाविद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए ऐसी प्रतियोगिताएं सीधी राज्य स्तर पर आयोजित की जाती हैं। विजेता विद्यार्थियों को हिंदी दिवस के अवसर पर पुरस्कार दिए जाते हैं। किसी भी भाषा का प्रचलन उसके साहित्य विकास पर निर्भर करता है। भाषा एवं साहित्य का विकास हिमाचल के भाषा कला संस्कृति विभाग व कला, भाषा एवं संस्कृति अकादमी के जिम्मे है। हिंदी भाषा के विकास में विभाग व अकादमी ने द्विमुखी योजनाएं चलाई हैं जिसमें एक ओर हिंदी की साहित्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देना और दूसरी ओर प्रशासन में हिंदी के प्रचलन को बढ़ावा देना है। प्रदेश के साहित्यकारों की वैयक्तिक अभिरुचियों को प्रोत्साहित करने के लिए कवि गोष्ठियों एवं लेखक गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। हिंदी साहित्यिक रंगमंच के क्षेत्र में भी विभाग और अकादमी प्रयासरत हैं। प्रदेश के साहित्यकारों को प्रोत्साहन देने के अभिप्राय से अकादमी लेखकों के अनुमोदित हस्तलेखों के प्रकाशनार्थ सहायतानुदान दे रही है व उनकी प्रकाशित पुस्तकों को  खरीदने की योजना भी चालू है। हिंदी लेखकों को पुरस्कार भी सरकार द्वारा दिए जाते हैं। विभाग की अपनी पत्रिका विपाशा व अकादमी की पत्रिका सोमसी भी निरंतर प्रकाशित हो रही है। इसी प्रकार सूचना एवं लोक संपर्क विभाग की ओर से मासिक पत्रिका हिमप्रस्थ व साप्ताहिक पत्र गिरिराज प्रकाशित किया जा रहा है। लेखकों व कवियों की अपनी पुस्तकें लगातार प्रकाशन में आ रही हैं। हिमाचल प्रदेश में अन्य प्रदेशों की तरह हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी अखबारों व हिंदी सिनेमा का बहुत बड़ा हाथ है। अगर बोलचाल व संपर्क भाषा के दृष्टिकोण से देखा जाए तो हिमाचल प्रदेश हिंदी भाषी राज्य के रूप में सशक्त है। लेकिन प्रदेश में बढ़ती अंग्रेजी स्कूलों की तादाद व माता-पिता की अपने बच्चों को इन स्कूलों में पढ़ाने की बढ़ती प्रवृत्ति से हिंदी पर खतरा बना हुआ है। इसी तरह राजभाषा के रूप में हिंदी के प्रचलन की बात करें तो राजभाषा का अर्थ होता है राज्य के काम-काज में प्रयुक्त होने वाली भाषा। किसी भी राष्ट्र अथवा राज्य में सुचारू कामकाज के लिए राजभाषा का निर्धारण किया जाता है। चूंकि हिमाचल प्रदेश में सर्वाधिक बोली व समझी जाने वाली भाषा हिंदी है, इसलिए हिमाचल सरकार ने हिंदी को राजभाषा बनाया है और इस आशय से हिमाचल प्रदेश राजभाषा अधिनियम 1975 लागू किया गया है। हिंदी का अभिप्राय देवनागरी लिपि में हिंदी से है। इस अधिनियम में यह प्रावधान किया गया है कि जब तक राज्य सरकार अन्यथा निर्देश नहीं देती, राज्य की विधानसभा की कार्यप्रणाली के लिए राज्य की सरकारी भाषा के अतिरिक्त अंग्रेजी का प्रयोग भी किया जा सकता है। इसी अधिनियम के अंतर्गत पंजाब राजभाषा अधिनियम 1960 जो पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966 की धारा 5 के अधीन हिमाचल प्रदेश में सम्मिलित किए गए क्षेत्रों में लागू था तथा हिमाचल प्रदेश भाषाएं अधिनियम 1952 जो नवंबर 1966 से तुरंत पहले हिमाचल प्रदेश के क्षेत्रों में लागू था, को निरस्त कर दिया गया है। 14 फरवरी 1975 को हिमाचल प्रदेश मंत्रिमंडल ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया जिसके अनुसार अग्रेजी टाइपिस्टों, स्टैनोग्राफरों की नियुक्ति तथा अंग्रेजी टाइप मशीनों की खरीद पर प्रतिबंध लगा दिया गया। विभागों के नियमों, उपनियमों, विनियमों व फार्मों इत्यादि को हिंदी में रूपांतरित करने का कार्य भाषा विभाग को सौंपा गया। सरकार की राजभाषा नीति को गंभीरता से अपनाने के लिए 12 दिसंबर 1977 को सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर मेडिकल कालेज, विधि विभाग तथा तकनीकी विभाग को छोड़ कर प्रदेश के समस्त विभागों में 26 जनवरी, 1978 से सारा कामकाज पूर्ण रूप से हिंदी में करने के आदेश दिए। वर्ष 2011 व वर्ष 2018 में माननीय मुख्यमंत्री ने सभी प्रशासनिक सचिवों को निर्देश दिए कि मंत्रिमंडल के लिए कार्य सूची और संबद्ध दस्तावेज  तथा बैठकों की कार्यवाही हिंदी में तैयार करे। प्रशासन में हिंदी प्रचलन में सुविधा जुटाने का उत्तरदायित्व भाषा एवं संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश को सौंपा गया। इस उद्देश्य से विभाग ने निम्नलिखित सहायक पुस्तकों का प्रकाशन किया तथा इनकी प्रतियां समस्त विभागों/निगमों/बोर्डों आदि में वितरित की गईं। अंग्रेजी-हिंदी प्रशासनिक शब्दावली, हिंदी-अग्रेजी प्रशासनिक शब्दावली, अंग्रेजी-हिंदी राजस्व शब्दावली तथा अंग्रेजी-हिंदी पदनाम शब्दावली। हिंदी परमार्थ जिसमें हिंदी का आधारभूत और कार्यसाधक ज्ञान दिया गया है। साथ ही प्रशासनिक हिंदी सहायिका व राजभाषा में शुद्ध प्रयोग। सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग की प्रतिशतता की त्रैमासिक रिपोर्ट भाषा विभाग, सचिवालय, विभागों व बोर्डों इत्यादि से एकत्रित करता है तथा हिंदी में सर्वश्रेष्ठ  कार्य करने वालों को पुरस्कृत किया जाता है। राजभाषा के कार्यान्वयन के लिए हिमाचल प्रदेश विधानसभा में वर्ष 1991-92 तक राजभाषा कार्यान्वयन समिति का गठन भी किया जाता रहा है, लेकिन उसके बाद इस समिति का गठन नहीं हो पाया है। सरकार के विभिन्न प्रयत्नों के फलस्वरूप सरकारी काम-काज में हिंदी का प्रचलन जरूर बढ़ा है, लेकिन अंग्रेजी का प्रचलन भी अभी बराबर बना हुआ है। विभागों एवं बोर्डों में 20 से 50 प्रतिशत तक ही काम हिंदी में हो रहा है। अतः हिंदी राजभाषा के रूप में स्थापित नहीं हो पाई है और जब तक अंग्रेजी का नल खुला रहेगा, हिंदी को राजभाषा के रूप में शत-प्रतिशत सफलता मिलना संदेहास्पद है।

कौन कहता है हिमाचल हिंदी भाषी राज्य है

डा. सुशील कुमार फुल्ल

मो. 9418080088

वैसे तो देश भर में हिंदी की जो स्थिति है, वही चिंताजनक है क्योंकि सात दशकों के बाद हिंदी केवल हिंदी प्रदेशों की ही थाती बनी हुई है। हिंदी का प्रचार-प्रसार दुनियाभर में तो हो गया, लेकिन भारत में इसकी स्थिति शोचनीय बनी हुई है। इसका प्रमुख कारण तो सरकार की ढुलमुल नीति ही रही है। फिर त्रिभाषी फार्मूले ने तो इसकी रही-सही हवा ही निकाल दी। राष्ट्र भाषा राज भाषा हो गई और फिर क्षेत्रीय भाषाओं ने हिंदी को दबोच लिया। और राष्ट्र भाषा हिंदी क्षेत्रीय भाषाओं के स्तर पर आ गिरी। भारतेंदु हरिश्चंद्र का जयघोष ‘हिंदी हम सबकी भाषा’ तथा ‘जय हिंदी जय नागरी’ मात्र नारे बन कर रह गए। हिमाचल तो सरकारी नीति के कारण पिस गया। व्यवहार में देखें तो हिमाचल में या तो कांगड़ी, मंडयाली, कुल्लवी, सिरमौरी, चंबयाली आदि बोलियां बोली जाती हैं या फिर बीस प्रतिशत के लगभग पंजाबी बोली जाती है। वास्तव में जब सन् 1966 में पंजाब का भाषा के आधार पर पुनर्गठन हुआ, उस समय पंजाबी सूबे का डर बना हुआ था और बहुत से लोगों ने जिनकी मातृभाषा पंजाबी थी, उन्होंने अपनी मातृ भाषा हिंदी लिखवा दी। इसी तरह हिमाचली बोलियां बोलने वाले प्रदेशवासियों ने भी हिंदी को अपनी मातृभाषा लिखा, जबकि उन्हें अपनी पहाड़ी बोली दर्ज करवानी चाहिए थी। फिर 1975 में जब हिमाचल की राजकाज की भाषा हिंदी मान ली गई तो हिमाचल के हिंदी भाषी होने पर मुहर लग गई। हिमाचल की स्थिति त्रिशंकु वाली हो गई। न इधर के रहे, न उधर के। अहिंदी भाषी होते हुए भी सरकारी तौर पर हिंदी भाषी हो गए। अभिप्रायः यह कि अहिंदी भाषियों को जो प्रोत्साहन सहज रूप में मिलते हैं, वे हिमाचलियों के लिए बंद हो गए।  यह सरासर अन्याय था और है। अब एक बार हिंदी भाषी डिक्लेयर हो गए तो उस टैग को मिटाएं कैसे? यही आज की दुविधा है। न हिंदी प्रदेश हिमाचल को सही हिंदी प्रदेश मानते हैं और न ही अहिंदी भाषी उन्हें पहचानते हैं। बस गुलेरी, यशपाल का नाम लेकर वे हिमाचलियों की पीठ थपथपा देते हैं, लेकिन यह सब किस काम का? कुछ वर्षों से आठवीं अनुसूची में शामिल होने की आवाज उठ रही है, अच्छी बात है, किंतु यह तभी संभव होगा जब सरकार की इच्छा जागृत होगी। और तब तक हमें खड़ताल बजानी होगी। हिंदी शिखरों का स्पर्श करने चली थी, परंतु क्षेत्रीय सौतिनों ने उसकी एक न चलने दी। भले ही हिंदी सेवी संस्थाएं लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कार बांटती हों, भले ही बड़े-बड़े आयोजन करती हों, परंतु आज तक हिंदी का अखिल भारतीय हिंदी साहित्य का इतिहास नहीं बन पाया, जिसमें उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक के सभी प्रांतों का विवरण हो। केवल आठ हिंदी प्रदेशों के साहित्य का ही उल्लेख मिलता है और हिमाचल तो उसमें भी कहीं नहीं ठहरता। हिमाचल एकदम, खालिस तौर पर अहिंदी भाषी प्रदेश है और इसे शीघ्र इसका हक मिल जाना चाहिए। देखें ऊंट कब सीधी करवट बैठता है। अभी तो तेल देखो और तेल की धार देखो।

सरकारी कामकाज की भाषा नहीं बन पाई हिंदी

मुरारी शर्मा

मो. 9418025190

भारतीय गणतंत्र का 18वां राज्य हिमाचल प्रदेश भले ही अपनी अलग भौगोलिक परिस्थितियों, भाषा, संस्कृति और अलग पहचान के चलते अस्तित्व में आया। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री हिमाचल निर्माता डा. वाईएस परमार ने इन्हीं मुद्दों पर हिमाचल को अलग और पूर्ण राज्य बनाने की मांग पर जोर दिया था। इसमें कोई शक नहीं है कि हिमाचल हिंदी पट्टी के राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश और राजस्थान की तरह हिंदी भाषी राज्य है। लेकिन सरकारी कामकाज हिंदी के बजाय अंग्रेजी में अधिक हो रहा है। हैरानी की बात तो यह है कि हिंदी राज्य में सरकारी कामकाज हिंदी में करने के लिए सरकार को विभिन्न विभागों को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कृत करना पड़ रहा है। इसके बावजूद हिंदी प्रशासनिक स्तर पर हिमाचल में अपना मुकाम हासिल नहीं कर पाई है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा कागजों में हासिल है, मगर सरकारी फाइलों में फर्राटे से अभी भी अंग्रेजी ही दौड़ रही है। इसके पीछे सबसे अहम कारण यह है कि सरकारी कामकाज की हिंदी आम जनता की भाषा में न होकर दुरूह बना दी गई है। हिंदी की प्रशासनिक शब्दावली इतनी कलिष्ट है कि उसका अर्थ समझने के लिए शब्दकोश का सहारा लेना पड़ता है। आम आदमी के पल्ले तो सरकारी हिंदी पड़ती ही नहीं है। जबकि वह अंग्रेजी के शब्दों को समझ व रट लेता है और अपनी बोलचाल में अंग्रेजी के शब्दों को प्रयोग भी करता है। जहां तक हिमाचल प्रदेश के हिंदी राज्य होने का सवाल है, यहां पर बोलियों की विविधता के इतर हिंदी संपर्क भाषा के रूप में जनमानस में अपनी पैठ बनाए हुए है। यही नहीं, अब तो घरों में नई पीढ़ी अपनी मां बोली की जगह पर हिंदी में बात करना सहज महसूस करती है। इससे हिमाचल में पहाड़ी को भाषा का दर्जा देने की मुहिम को झटका अवश्य लगता है। पहाड़ी के झंडाबरदार स्वयं भी हिंदी व अंग्रेजी के मोहपाश से मुक्त नहीं हैं। यह अलग बात है कि हिमाचल में हिंदी साहित्य में आंचलिकता के चलते स्थानिकता को भी शामिल किया जा रहा है। इससे हिंदी का खजाना समृद्ध हो रहा है। हिमाचल का हिंदी साहित्य और रचनाकार राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बना रहा है। लेकिन सरकारी कामकाज में अभी भी हिंदी को वह मुकाम हासिल नहीं हो पाया है, जो उसे मिलना चाहिए।

हिमाचल को एकसूत्र में पिरोती है हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी

दौलत भारती

मो.9418561327

प्राकृतिक सौंदर्य से सराबोर हिमाचल प्रदेश की विभिन्न वादियों की अपनी छटा, अपनी सांस्कृतिक विरासत है। यहां की वादियों की अलग-अलग दृश्यावलियों की भांति हर वादी की अपनी बोली भी है। हिमाचल में आसानी से समझ न आने वाली लाहौली और किन्नौरी सरीखी बोली भी बोली जाती है। यहां यूं कहें कि हिमाचल में पहाड़ी बोलियों को मातृभाषा होने का गौरव प्राप्त है। पहाड़ी हिमाचल की पहचान भी है। पहाड़ी रियासतों के विलय से अस्तित्व में आए हिमाचल और पहली नवंबर 1966 के बाद पंजाब से कुछ हिस्से हिमाचल में मिलने के उपरांत हिंदी ने हिमाचल में बोलियों की विविधता के बीच संवाद स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। हिंदी की बदौलत ही बोली एवं भाषा के आधार पर क्षेत्रवाद कहीं हावी नहीं दिखता। हिमाचल में हिंदी ने ही विभिन्न बोलियों एवं जनसामान्य के बीच तारतम्य बिठाया। हिमाचल में सरकारी कामकाज में भी हिंदी को अधिमान दिया गया है। भले ही प्रदेश में अंग्रेजी माध्यम स्कूलों का जाल बिछ गया है, लेकिन आज भी शिक्षा के क्षेत्र में हिंदी भारी है। हिमाचल ने शिक्षा के क्षेत्र में नए आयाम छुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों तक शिक्षा के विस्तार के साथ पहाड़ी बोली पीछे छूटती जा रही है और हिंदी मातृभाषा के रूप में जगह बना रही है। बदले संदर्भों में कहा जाए कि वास्तव में पहाड़ी होते हुए भी हिमाचल हिंदी राज्य है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। प्रदेश में हिंदी विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी एक विकल्प के रूप में सामने आई है। अनगिनत बोलियों के भंडार हिमाचल प्रदेश की अपनी ऐसी कोई क्षेत्रीय भाषा एवं बोली नहीं है जिसे प्रदेश की भाषा के रूप में स्वीकारा जा सके। हालांकि प्रदेश में पहाड़ी भाषा को दर्जा देने की मांग प्रदेश के बुद्धिजीवी, कलमकार, रचनाधर्मी करते रहे हैं, लेकिन यह प्रयास सिरे नहीं चढ़ पाए। प्रदेश की बोली कदम-कदम पर बदलती है, ऐसे में कौन सी पहाड़ी भाषा हो? किसे पहाड़ी भाषा का दर्जा मिले? यह यक्ष प्रश्न बहसों और चर्चाओं में उछलता भी रहा। बेशक हिमाचल में पहाड़ी भाषा में भी साहित्य खूब रचा जा रहा है, लेकिन हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने वालों की भी फेहरिस्त कम नहीं है। बीती सदी के आठवें दशक तक प्रदेश में पड़ोसी प्रांत से कुछ इक्का-दुक्का अखबार हिमाचल आते थे। इनमें से कुछ उर्दू के तो कुछ पंजाबी में होते थे। हिमाचल में हिंदी पाठकों की कमी भी थी और हिमाचल की खबरों को तवज्जो भी कम ही मिलती थी। पिछले तीन-चार दशकों में हिमाचल मीडिया हब बन गया और हिंदी के पाठकों की तादाद लाखों में पहुंच गई है। सरकारी कामकाज, बोलचाल हर जगह हिंदी ने अपना रुतबा कायम किया है। हिंदी ही है जिस वजह से विविधता में एकता की झलक साफ दिखाई देती है। वरना पहाड़ी भाषा के नाम से क्षेत्रवाद की दरारें  गहराती दिखाई देतीं। राष्ट्र भाषा की प्रदेश में गहरी पैठ एवं भूमिका प्रदेश को हिंदी राज्य होने पर गौरवान्वित करती है। हिंदी ने ही बोलियों की विविधता होते हुए भी प्रदेश को एकसूत्र में पिरोया है।

हिंदी भाषा की विडंबना और हिमाचली भाषा

अमरदेव आंगिरस

साहित्यकार

मो. 94181-65573

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 43.63 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा या पहली भाषा हिंदी है। भाषायी जनगणना के अनुसार भारत की 121 भाषाओं में से 22 भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में हैं तथा हिंदी के बाद तमिल 6.90 प्रतिशत, कन्नड़ 4.37, तेलगू 8.11, मलयालम 3.48, बोडो 0.15, संथाली 0.74 प्रतिशत लोगों की भाषाएं हैं। तब प्रश्न उठता है कि भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी क्यों नहीं? इसका सीधा उत्तर है आजादी के पश्चात परिश्मी शिक्षा प्राप्त राजनीति करने वाले नेता। अंग्रेजी भाषा तथा गुलाम मानसिकता की सोच रखने वाले नेताओं ने मातृभाषाओं की अपेक्षा अंग्रेजी को अधिमान दिया। व्यावहारिक रूप से आज भी कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक पर्यटक हिंदी के माध्यम से बात करता है जिसे प्रायः दक्षिण के चार राज्यों को छोड़कर हिंदी भाषा आसानी से व्यवहार में आती है। इन राज्यों में भी तीस-चालीस प्रतिशत लोग हिंदी जानते हैं। आजादी के समय उत्तर भारत के राज्यों में हिंदी भाषा तथा साहित्य का पर्याप्त प्रचार-प्रसार था तथा राष्ट्रभाषा के लिए समर्थन था। आजादी की लड़ाई क्रांतिकारियों तथा नेताओं सुभाष, गांधी, नेहरू, तिलक, भगत सिंह, आजाद आदि ने हिंदी के नारों तथा पत्र-व्यवहार के माध्यम से लड़ी थी। राजनीतिक कारणों से दक्षिण भारत में प्रारंभिक तथा प्रमुख रूप से प्रशासन के कारण अंग्रेजों ने अंग्रेजी की सुदृढ़ नींव डाल दी थी। अतः आजादी के पश्चात इन राज्यों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता का हिंसक विरोध किया, जिसके कारण राष्ट्र की एक भाषा हिंदी न होकर अंग्रेजी ही बनी रही। उस समय यदि इस आंदोलन को सख्ती से दबा दिया जाता अथवा कुछ काल टाल दिए जाने पर अंग्रेजी के साथ लागू कर दिया जाता तो राष्ट्र की एक भाषा होती। यह कहना उचित नहीं है कि भारत में हजारों (1961 में 1652) भाषाएं इसमें बाधा हैं। विश्व के अन्य बड़े देशों अमरीका, मैक्सिको, कैमरून, आस्ट्रेलिया व कांगो में क्रमशः 311, 277, 280, 275 व 216 भाषाएं हैं, फिर भी इनकी एक राष्ट्रभाषा है। इसका एक पहलू यह भी है कि कनाडा, स्पेन आदि देशों में दो-दो भाषाएं राज्यभाषा के रूप में प्रयुक्त होती हैं। फिर भारत में कोई दो भाषाएं क्यों नहीं। कोई मध्यम मार्ग अपनाना होगा। कहीं न कहीं से शुरुआत करनी होगी। राजनीतिक इच्छाशक्ति से उर्दू, फारसी, अंग्रेजी आदि भाषाएं यहां राजभाषाएं रही हैं। आज बिना राष्ट्रभाषा दर्जे के हिंदी धड़ल्ले से कार्यालय, बाजार, पत्र व्यवहार आदि में स्वाभाविक रूप से व्यवहार में आ रही है। आज अंग्रेजी की विश्वव्यापकता के बावजूद हिंदी विश्व के अधिकांश देशों में समझी जाती है तथा इसकी लोकप्रियता भारतीय संस्कृति के कारण दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। हमारे प्रधानमंत्री तथा राजनेता राष्ट्रसंघ तथा बाहर के देशों में हिंदी में भाषण देते हैं, तो विदेशी उसका स्वागत करते हैं तथा समझते भी हैं। सौ से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी का पठन-पाठन होता है। प्रवासी भारतीयों ने हिंदी का विश्व में प्रचार-प्रसार किया है। आज हिंदी की लोकप्रियता के कारण विश्वभाषा की मान्यता तथा इसे संयुक्त राष्ट्र की भाषा की मान्यता के लिए प्रयत्न हो रहे हैं। लेकिन जब अपने देश में ही इसे राष्ट्रभाषा को दर्जा नहीं मिल पाया है, तो यह कैसे संभव होगा? किसी भी राष्ट्र की अवधारणा एक भाषा, एक ध्वज, एक संविधान के तत्त्वों से निर्मित होती है। इन विशेषताओं के लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। हिंदी को अंग्रेजी से ऊपर अधिमान तो देना ही होगा। मौलिक अधिकारों से ऊपर कर्त्तव्य एवं देश की एकता हो सकती है। इसके अभाव में भारत राष्ट्र की पहचान नहीं हो सकती। आज विज्ञान की उन्नति तथा तकनीक के कारण अंग्रेजी की सार्वभौमिकता संपूर्ण विश्व में मान्यताप्राप्त सी हो गई है। विज्ञान, कानून, उद्योग, इंटरनेट, कम्प्यूटर आदि की भाषा अंग्रेजी होने के कारण शिक्षा प्रणाली में अंग्रेजी की अनिवार्यता भी स्वाभाविक है। इस कारण हमारे स्कूलों में अंग्रेजी को प्राथमिकता दी जा रही है। लेकिन सुखद पहलू यह है कि हिंदी भाषा की लिपि छोड़कर मोबाइल, कम्प्यूटर आदि में हिंदी का प्रयोग रोमन में होते हुए भी हिंदी का विश्वव्यापी प्रसार बिना प्रयत्न के हो रहा है। आज स्थिति यह है कि भारत में एक व्यक्ति सुबह घर में परिवार के साथ अपनी मातृभाषा में बात करता है तो दफ्तर में दिन में हिंदी या अभिजात भाषा में वार्तालाप करता है। रास्ते में स्थानीय बोली में बात करता है तो माता-पिता-बुजुर्गों के साथ अपनी लोकभाषा में बात करता है। एक अन्य भाषा पूजा-पाठ में संस्कृत, उर्दू-फारसी आदि व्यवहार में लाता है। इन समस्त पहलुओं के निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय एकता एवं अस्मिता के लिए अधिकांश लोगों की भाषा हिंदी तथा प्रादेशिक मातृभाषाओं को स्थान मिलना आवश्यक है। भारतीय संस्कृति संस्कृत की ज्येष्ठपुत्री हिंदी के माध्यम से संरक्षित हो सकती है। अतः आज राजनीतिक इच्छाशक्ति की परम आवश्यकता है। हिमाचली भाषा की विडंबना यह है कि पहाड़ी-हिमाचली भाषा को आठवीं अनुसूची में मान्यता पर कानूनी रूप में यह हिमाचली-पहाड़ी भाषी राज्य कहलाएगा, हिंदी भाषी नहीं। लेकिन हिमाचली भाषा भी राजनेताओं एवं लेखकों के वितंडावाद में उलझ गई है। सहत्तर के दशक में कांगड़ा क्षेत्र के नेता-लेखक ‘डोगरी’ को हिमाचली भाषा कहते रहे, बाद में जनगणना में पहाड़ी लिखवाई। बाद के दशकों में हिंदी राजभाषा बनी भी, लागू भी हुई, किंतु धीरे-धीरे फिर अंग्रेजी ही व्यवहार में आ रही है। वैसे हिमाचल में तो व्यवहार में हिंदी ही प्रयोग होती है। हिमाचली-पहाड़ी के लिए आठवीं अनुसूची अथवा साहित्य के लिए विशेष प्रयास करने की आवश्यकता है। बहरहाल हिंदी ही हिमाचल की प्रादेशिक भाषा मानी जाएगी।