हिंदी पत्रकारिता की धार

बेशक इक्कीसवीं सदी आते-आते दुनिया का चेहरा-मोहरा हर लिहाज से बहुत अधिक बदल गया है, परंतु मीडिया और पत्रकारिता के संबंध आज भी बदस्तूर कसौटी पर कसे जाते हैं। इसमें दो राय नहीं कि अब तक रचित साहित्य का बड़ा भाग शाश्वत और यशस्वी होकर मानव सभ्यता के विकास की कहानी सफलता से कहता है...

विक्टोरिया काल के प्रसिद्ध अंग्रेज कवि और सांस्कृतिक समीक्षक मैथ्यू आर्नोल्ड के शब्दों में, ‘‘पत्रकारिता शीघ्रता में लिखा गया साहित्य है।’’ यह तथ्य रोचक है कि मीडिया और पत्रकारिता के संबंध उन्नीसवीं शताब्दी में भी मंथन का विषय थे। बेशक इक्कीसवीं सदी आते-आते दुनिया का चेहरा-मोहरा हर लिहाज से बहुत अधिक बदल गया है, परंतु मीडिया और पत्रकारिता के रिश्ते आज भी बदस्तूर कसौटी पर कसे जाते हैं। इसमें दो राय नहीं कि अब तक रचित साहित्य का बड़ा भाग शाश्वत और यशस्वी होकर मानव सभ्यता के विकास की कहानी सफलता से कहता है। दूसरी ओर, मीडिया जनता को हर घटनाक्रम के विषय में सूचित करने का दायित्व निभाता आ रहा है। यकीनन, इन सूचनाओं में साहित्य गतिविधियों से जुड़े घटनाक्रम भी शामिल होते हैं। बावजूद इसके, देश-दुनिया के साथ ही हिमाचल प्रदेश में भी यदा-कदा प्रश्न उठते हैं कि कहीं मीडिया के संदर्भों से साहित्य खारिज तो नहीं हो रहा? कहीं ऐसा तो नहीं कि आज के मीडिया ने साहित्य जैसे विषय उठाने ही बंद कर दिए? ये सवाल इसलिए क्योंकि साहित्य जगत यह तो मानता है कि इससे जुड़ी गतिविधियां या सृजन मीडिया में स्थान पाते हैं, लेकिन अखबारों के पन्नों में साहित्य के लिए स्थान सिकुड़ने के उलाहने भी कम नहीं। साहित्य जगत की शिकायत सिरे से नकारना हरगिज संभव नहीं, पर हिमाचली मीडिया सृजन को अहमियत नहीं देता, यह भी सही नहीं। अभी भी यहां साहित्य और इससे जुड़ी गतिविधियों को समाचार पत्रों में साप्ताहिक तौर पर मुख्य संस्करण में पूरा पृष्ठ निरंतर समर्पित किया जाता है। इसके अतिरिक्त साहित्यकारों की विविध उपलब्धियां दैनिक समाचार के रूप में सचित्र स्थान पाती हैं। देश-प्रदेश की घटनाओं पर रचनाकारों की त्वरित कृतियों को भी विभिन्न पन्नों पर सम्मान देने की परंपरा कायम है। बावजूद इसके, यह तथ्य नकारा नहीं जा सकता कि चुनौतियों से जूझ रहा वर्तमान मीडिया कई मर्तबा स्वयं को कुछ मजबूरियों में बंधा पाता है। आम आदमी नहीं जानता कि पिछले कुछ समय में अखबारी कागज के दाम कितने फीसदी बढ़ गए। मीडिया जगत में काम करने वाले श्रमजीवी कर्मचारियों की अपेक्षाओं पर निरंतर  खरा उतरने की चुनौती मैदान में डटे रहने के जज्बे की किस प्रकार परीक्षा लेती है, यह समझना भी आसान नहीं। फिर भी, तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच हिमाचली मीडिया अपना दायित्व निभाने के निश्चय पर दृढ़ता से कायम है। निश्चय प्रदेश को जागरूक बनाने पर दृढ़ता से कायम है। निश्चय प्रदेश को जागरूक बनाने का, निश्चय भाषा को समृद्ध बनाने का... और निश्चय साहित्य का साथ निभाते जाने का।

सूत्रधार

अनिल अग्निहोत्री, पवन कुमार शर्मा,  अमन अग्निहोत्री, जितेंद्र कंवर,  नीलकांत भारद्वाज, व राकेश सूद के साथ शकील कुरैशी

मीडिया में राजनीतिक घुसपैठ चिंताजनक

नैतिक मूल्यों में गिरावट के कारण ही पत्रकारिता का स्तर भी गिर रहा है। यह कहना है नादौन के पखरोल से ताल्लुक रखने वाले यूनएनआई से सेवानिवृत्त ब्यूरो चीफ  एमएल शर्मा का। मौजूदा समय में पत्रकारिता के गिरते स्तर को लेकर ‘दिव्य हिमाचल’ ने 78 वर्षीय एमएल शर्मा से बात की। शर्मा कहते हैं कि अफसरशाही, राजनेता सहित हमारे घरों में भी नैतिक मूल्यों और संस्कारों का लगातार पतन हो रहा है, जिसके कारण यथा राजा तथा प्रथा की कहावत हर क्षेत्र में चरितार्थ हो रही है। मीडिया क्षेत्र में भी धन की होड़ तथा हस्तक्षेप इतना बढ़ गया है कि इन मूल्यों की रक्षा करने वाले भी एक तरह से बंधुआ बन गए हैं।   उन्होंने कहा कि मीडिया जगत में राजनीतिक घुसपैठ आने वाले समय के लिए बहुत चिंताजनक है।

लीक से हटकर कुछ करने की चुनौती

मौजूदा दौर में पत्रकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी विश्वसनीयता को कायम रखना बन गई है। वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र शर्मा का कहना है कि पाठकों की कसौटी पर खरा उतरने के लिए पत्रकार को निष्पक्षता, निर्भीकता व प्रोफेशनल अप्रोच के साथ काम करने की जरूरत है। सूचना प्रौद्योगिकी के युग में जब सोशल मीडिया में सूचनाओं का तेजी से आदान-प्रदान हो रहा है तो ऐसे में पत्रकार को तथ्यपरक,खोजपूर्ण पत्रकारिता करते हुए लीक से हटकर कार्य करना होगा। पत्रकारों को अपडेट होने की भी जरूरत है। पत्रकारिता पेशे के साथ जुड़े ग्लैमर की चकाचौंध के सैलाब में बहने से खुद को बचाना होगा तथा ग्राउंड जीरो से सटीक सूचनाओं का संप्रेषण करते हुए समाचार पत्र को सही मायने में आम आदमी की आवाज के रूप में प्रस्तुत करना होगा।

समाज को जोड़ रहा हिमाचली मीडिया

डा. मनोहर लाल अवस्थी का कहना है कि मीडिया आज विश्व परिदृश्य में संघर्ष करता हुआ अपनी एक अलग पहचान बना चुका है । हिमाचली पत्रकारिता में भाषा का अहम योगदान है। सरल में सबको समझ में आने में आसान होने के चलते हिंदी पत्रकारिता दिनांदिन फलफूल रही है। हिंदी पत्रकारिता ने अपनी अलहदा पहचान बनाते हुए समाज के हर वर्ग को अपने साथ जोड़ा है। हिंदी भाषा ने  मीडिया  राजनीति ,धर्म,दर्शन,साहित्य, प्रतिभा ,प्रोत्साहन एवं अनछुए पहलुओं की नब्ज टटोलकर खोजी पत्रकारिता एवं लोक रुचि की विभिन्न प्रकार की सामग्री समाज के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है ।  मीडिया दिनोंदिन नित नए प्रयोग कर रहा है तो हिमाचली  भी  इससे अछूता नहीं रहा है। मीडिया हर छोटी खबर अछी तरह से  प्रस्तुत करता है जिससे  प्रदेश-देश  विश्व में  भी अपनी धमक रखता है। गंभीर चुनौतियों को स्वीकार करता हुआ हिमाचली मीडिया अपनी विशेष भूमिका अदा कर रहा है। हिमाचली मीडिया का भविष्य उज्जवल है क्योंकि पत्र.पत्रिकाएं छोटे से छोटे कोने में बैठे समाज को मुख्य घटना से जोड़ती हैं।

हिमाचल के विकास में पत्रकारिता का भी बड़ा रोल

वरिष्ठ पत्रकार जीसी पठानिया का मानना है कि हिमाचल के उत्थान में पत्रकारिता ने अहम भूमिका निभाई है।   प्रदेश के जनजातीय जिला भी देश के मानचित्र पर आ गए और इन इलाकों में सेब और आलू तथा अन्य फलों की फसल को बड़ी मात्रा में बढ़ावा मिला। राज्य के पत्रकारों ने हिमाचल की रीढ़ कहे जाने वाले किसानों और बागबानों के विकास के लिए कार्य किया। उनकी समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने और सरकारी योजनाओं को आम लोगों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई, जिससे इन क्षेत्रों में रह रहे लोग आज प्रदेश के अन्य भागों की तरह ही अपना जीवन यापन कर रहे है। इसलिए यह कहने में कोई संकोच नहीं कि प्रदेश के उत्थान में पत्रकारिता ने अपनी मौलक जिम्मेदारी बखूबी निभाई है।

बाजारीकरण ने कुंद की कलम की धार

वरिष्ठ पत्रकार मुरारी शर्मा कहते हैं कि अब नए दौर की पत्रकारिता है। सूचनाओं को बाजारीकरण ने पत्रकारिता का चेहरा ही बदल कर रख दिया है। पत्रकारिता कभी मिशन और जनजागरण की भूमिका अदा करती रही है। मगर नव उदारवाद और बाजारवाद के इस दौर में पत्रकारिता का स्वरूप पूरी तरह से बदल गया है।   अब हमारे सामने सूचनाओं का बाजार खुला हुआ है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बाद अब सोशल मीडिया के मैदान में कूद जाने से न केवल परंपरागत मीडिया यानी प्रिंट मीडिया के सामने चुनौतियां खड़ी हो गई है, बल्कि सूचना की बहुलता के बीच यह तय कर पाना मुश्किल हो गया है कि जो भी सूचना विभिन्न माध्यमों से हमारे तक पहुंच रही है। उसकी विश्वसनीयता कितनी है। सवाल यह भी है कि प्रतिस्पर्धा के इस युग में हम पत्रकारिता के मूल सिद्धांत निष्पक्षता, निर्भीकता और सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ-साथ तटस्थता की अपनी पेशेवर ईमानदारी का निर्वाह कर पा रहे हैं या नहीं। आज बड़ा पत्रकार वह नहीं,जिसकी कलम में धार है,बल्कि बड़ा पत्रकार वह है,जो विज्ञापन खूब लाता है। ऐसे में स्वाभाविक ही है कि पत्रकारिता के मूल्यों का ह्रास तो होना ही है। दूसरा अखबारों में बढ़ रही प्रतिस्पर्धा ने भी पत्रकार को बेबस और लाचार कर दिया है। ब्रेकिंग न्यूज के चक्कर में आधी अधूरी सूचनाओं के चलते कई बार पत्रकारों की स्थिति हास्यास्पद हो जाती है।

राजनीतिक द्वंद्व में फंसे कुछ पत्रकार

राजनीतिक पत्रकारिता भी राजनीति होती जा रही है। वर्तमान दौर में कुछ पत्रकार राजनेताओं की आपसी प्रतिद्वंद्विता का हिस्सा बन रहे हैं, जो कि  सुखद नहीं है। हालांकि सभी को एक ही नजरिए से नहीं हांका जा सकता मगर वर्तमान में ऐसे लोगों की संख्या अधिक हो चुकी है, जो कि राजनेताओं के इशारे पर काम कर रहे हैं। इस मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश चंद लोहुमी का कहना है कि अभी भी कुछ पत्रकार ऐसे हैं, जो परंपराओं को निभाते हुए पर्यवेक्षक बने हुए हैं। वो समाज के नजरिए से राजनीति को देखते हैं और उनकी लेखनी पूरी तरह से सटीक है।  मगर दूसरी एक पीढ़ी  ऐसी भी पत्रकारिता में आ चुकी है जो राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का हिस्सा बन चुकी है। ऐसे लोगों की संख्या काफी ज्यादा हो चुकी है जा ेकि समाज के लिए सही नहीं। पत्रकारिता संतुलित होनी चाहिए मगर संतुलित पत्रकारिता के लिए सोशल मीडिया सही नहीं है।

साहित्य की दृष्टि भी एक पक्ष

डा. जय प्रकाश सिंह

मीडिया और साहित्य के संबंधों की चर्चा करते समय प्रायः एक पक्ष से ही सारे कर्त्तव्यों के निर्वहन की अपेक्षा की जाती है। यह अपेक्षा दोनों के बीच सहज संबंध नहीं बनने देती, एक असंतुलन की स्थिति पैदा कर देती है। मीडिया का साहित्य के प्रति क्या नजरिया रहा है, इसमें कितना बदलाव आया है, इसका विश्लेषण तो होना ही चाहिए। मीडिया, साहित्य को पकड़ने में कहां चूक रहा है और इसके कारण सामाजिक-संवेदना कैसे सिकुड़ रही है, इस प्रश्न से भी मुठभेड़ समय की जरूरत बन गई है, लेकिन क्या सब कुछ मीडिया के कंधों पर डालकर ही हम किसी सही निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं। मीडिया और साहित्य के संबंधों का लेखा-जोखा करते समय मीडिया की साहित्य दृष्टि का विश्लेषण एकपक्ष है और साहित्य की मीडिया दृष्टि दूसरा पक्ष। यह जानना जरूरी है कि मीडिया, साहित्य तक कैसे पहुंचता है, पर समग्र चिंतन तभी हो सकता है जब इस प्रश्न पर भी विचार किया जाए कि साहित्य, मीडिया तक कैसे पहुंच रहा है। यदि पहुंचता है तो क्या उसमें कहीं समानता और सहजता भाव है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मीडिया में साहित्य के लिए स्पेस कम हुआ है। राजनीतिक खबरों के फैलते दायरे और बाजार के दबाव के कारण साहित्य, मीडिया में सिकुड़ रहा है। मीडिया-शिक्षा से साहित्य के गायब होने के कारण साहित्यिक समझ वाले पत्रकारों के अभाव ने भी एक त्रास्द स्थिति को जन्म दिया है। फिर भी मीडिया में साहित्य कमोबेश बना हुआ है। हिमाचल प्रदेश के मीडिया में भी साहित्यिक कंटेंट पर दबाव दिखता है, लेकिन उसकी निरंतरता बनी हुई है। हिमाचल के समाचार पत्रों में स्थानीय साहित्यिक प्रवृत्तियों को स्पेस देने के चलन से भी हिमाचली भाव पुष्ट होता है। हिमाचली मीडिया के लिए जटिल स्थिति तब पैदा होती है जब वह विश्लेषण और विमर्श की तरफ आगे बढ़ती है। मीडिया में आज का पाठक कविता-कहानी के साथ विविध साहित्यिक मुद्दों पर संतुलित विश्लेषण की मांग करता है। प्रायः उसकी यह मांग ठीक ढंग से संबोधित नहीं हो पाती। साहित्यिक पृष्ठों पर विश्लेषण और विमर्श की संस्कृति अभी पूरी तरह आकार नहीं ले पा रही है। हिमाचल का साहित्यिक और मीडिया जगत विमर्शों के दायरे को बढ़ाकर न केवल पाठकों से मजबूत संबंध स्थापित कर सकता है, बल्कि आपसी संबंधों को भी मजबूती प्रदान कर सकता है।

रिपोर्टिंग में सिमटती हिमाचली खबर

अजय पाराशर, उप-निदेशक, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग धर्मशाला

समूचा विश्व जब सूचना के मामले में सिमटकर मुट्ठी में समा चुका हो (मार्शल मैक्ल्यूहन के शब्दों में वैश्विक गांव बन चुका हो) और भारत जैसे देश में जहां व्यक्तिगत और सामूहिक चेतना तथा उत्तरदायित्व, दोनों का अभाव हो, हर व्यवसाय में सेवा के स्थान पर विद्वता और शक्ति का प्रदर्शन किया जा रहा हो, ऐसे में पत्रकारिता कैसे अछूती रह सकती है? हालत तो अंग्रेजी पत्रकारिता की भी भली नहीं; लेकिन उसके मुकाबिल हिंदी और आंचलिक पत्रकारिता आज संक्रमण के जिस दौर से गुजर रही है, वह आए दिन सोचनीय होती जा रही है। ऐसा नहीं है कि पहले भी सब भला था। यदि ऐसा होता तो सरदार भगत सिंह को स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व सांप्रदायिक दंगों के दौरान कई हिंदी समाचार-पत्रों की भूमिका से आहत होकर अपनी प्रतिक्रिया लेख में व्यक्त करने की जरूरत नहीं पड़ती। इसमें कोई दोराय नहीं कि सूचना क्रांति के इस दौर में तमाम खबरों से निरंतर अपडेट रहना ही अब जागरूकता का पैमाना है। अब खबरों का माध्यम केवल प्रिंट मीडिया, रेडियो या टीवी ही नहीं है। इंटरनेट के आने के बाद तो पूरा परिदृश्य ही बदल गया है। रही-सही कसर फेसबुक, व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया ने पूरी कर दी है। लिहाजा समय के दबाव ने त्वरित कार्रवाई के फेर में उत्तरदायित्व को कहीं हाशिए से भी परे धकेल दिया है। रही-सही कमी हमारी लिजलिजी कानून-व्यवस्था ने पूरी कर दी है। इन सब बातों के चलते विभिन्न संचार माध्यमों से प्रकाशित-प्रसारित समाचारों (अब इन्हें सूचना कहा जाना ही बेहतर होगा) में तथ्यपरकता की कमी और दृष्टिकोणपरकता में बढ़ोतरी अनुभव की जा सकती है। इन सब बातों के चलते पत्रकारिता अब रिपोर्टिंग तक सिमटती जा रही है। संवेदनशीलता, उत्तरदायित्व और गंभीरता के अभाव में लोगों तक सच्चाई के स्थान पर प्रायः सनसनी ही पहुंच रही है। जब पूरे देश में ही पत्रकारिता के स्तर में गिरावट आई है तो हिमाचल कैसे अछूता रह सकता है।  हिमाचल मीडिया को अलग से देखने के लिए हमें गंभीर एवं सहानुभूतिपूर्ण विवेचन करना होगा। हर पल फूटते सूचना के नए स्रोतों के मध्य समय तथा जिम्मेदारी का अभाव और उस पर बाजारवाद का प्रेत मीडिया, विशेषकर प्रिंट मीडिया को सरापा निगलने को तैयार खड़े हैं। लिहाजा पत्रकारिता के मूल्य गुजरे जमाने की बातें होकर रह गए हैं। छीजती भाषा के साए तले खोज और विश्लेषण के अभाव में हर बात और तथ्य के अपने अर्थ निकाले जा रहे हैं। दबाव आज़ादी से पूर्व भी थे, लेकिन उत्तरदायित्व, संवेदना और खोज का अभाव नहीं था। अतः विवेचन और विश्लेषण तथ्यपरक था, दृष्टिकोणपरक नहीं। विदेशी हुकूमत की बर्बरता तो थी,लेकिन बाज़ार नहीं था। लोगों तक सही खबर पहुंचाना, भले ही वह विदेशी सल्तनत के खिलाफ होती, वतन परस्ती मानी जाती थी। अब मानदंड बदल रहे हैं, अगर सही बात भी हो रही हो, तो उसे राष्ट्रविरोधी करार दिया जा सकता है, लेकिन, इन सबके मध्य मीडिया अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।  उदाहरण के लिए केरल में फैले निपाह वायरस के समाचारों की बात करें तो हिमाचल में अभी स्थिति ऐसी है, कि केवंल परामर्श ज़ारी करना काफी है, लेकिन एक हिंदी अ़खबार ने छापा, ‘सिरमौर में सैकड़ों चमगादड़ों की मौत, निपाह वायरस का खतरा’। वहीं एक अंगे्रज़ी अखबार ने सावधानी से लिखा, ‘अलर्ट ओवर निपाह एज टूरिस्ट सीजन ऑन’ जबकि दोनों पर ही बाज़ार और लागत का बराबर दबाव है। पाठकों तक सस्ता अखबार पहुंचाने के चक्कर में मूल्य लागत से काफी कम रखा जाता है। लिहाज़ा आय की कमी को जब विज्ञापन से पूरा करना पड़ेगा तो समझौते तो होंगे ही, दायित्व और मूल्यों के आधार पर, भाषा चाहे कोई भी हो। लेकिन हिंदी पत्रकारिता की स्थिति तब और भी चिंताजनक हो उठती है, जब उसे न्यूज़ प्रिंट के महंगा होने से आर्थिक लक्ष्य पर और केंद्रित होना पड़ता है। अखबार के अलावा आमदन का कोई अन्य जरिया न होने से पत्रकारिता पर हमेशा रहने वाला प्रबंधन का दबाव स्पष्ट नज़र आता है। संसाधनों की कमी के चलते पत्रकारिता के स्थान पर सिर्फ रिपोर्टिंग ही हो रही है, क्योंकि संस्करण अधिक होने के कारण पेज अधिक होते हैं। जगह भरने की जद्दोजहद में स्पॉट कवरेज ही हो पाती है और साइड स्टोरी छूट जाती हैं। योग्य स्टाफ और संख्या की कमी के चलते तथ्यपरक रिपोर्टिंग का अभाव, योग्यता तथा डेस्क पर अनुभव की कमी, समय के साथ प्रूफ रीडर्स का गायब होना, खबरों की बजाय केवल पेज मेकिंग पर ध्यान, अंग्रेज़ी अखबारों के मुकाबले कम भुगतान और पत्रकारिता का जुनून या मिशन की बजाय व्यवसाय के बाद व्यापार में तबदील हो जाना कुछ ऐसे कारण हैं, जो हिंदी पत्रकारिता पर ग्रहण की तरह लगे हुए हैं।  यही हाल इलेक्ट्रॉनिक, वेब और सोशल मीडिया का है। कम से कम स्टाफ की आवश्यकता या निजी मीडिया होने के बावजूद इन पर संवेदनशीलता, उत्तरदायित्व और नैतिक मूल्यों के अभाव के चलते यही तमाम कमियां देखने में आ रही हैं। धर्मशाला में रेप की अफवाह में सोशल मीडिया, कोटखाई के गुडि़या मामले और नूरपुर स्कूल बस हादसे में तमाम हिमाचली मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका से उनके चरित्र पर प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं। भले ही कई अखबार आज भी अपनी भूमिका और गुणवत्ता से समझौता नहीं कर रही हों, लेकिन दूसरों की अधिकता के चलते उन पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक हैं। पर अभी भी वापसी संभव है, बशर्ते बाजार का शिकंजा ढीला हो।

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