Monday, April 06, 2020 05:10 PM

हिंदी भाषा का भविष्य धूमिल क्यों

संजय वर्मा

स्वतंत्र लेखक

खबर है कि अंग्रेजी का नवजात शब्द ‘ओके बूमर’ आने वाले अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में बहस की दिशा और दशा तय कर सकता है। इन दिनों ‘ओके बूमर’ शब्द का इस्तेमाल युवा तब करते हैं जब कोई उन्हें काफी देर उपदेश दे चुका हो। इसका सबसे नजदीकी हिंदी अनुवाद -‘अब बस करो बुढ़ऊ ..!’ हो सकता है। ‘ओके बूमर’ उन खास शब्दों में से एक है, जिन्हें दुनिया ने पिछले दशक की विदाई बेला में उसी तरह याद किया, जैसे चर्चित हस्तियों को किया जाता है। ये शब्द इस दशक के भाषायी जगत के ऐसे नायक हैं, जिन्होंने इस समय की चिंताओं, चाहतों को जानने-जतलाने में लोगों की मदद की। अमरीका की ‘टाइम मैगजीन’ ने ऐसे शब्दों की एक सूची जारी की है। दुख की बात है कि ‘हिंदुत्व’ को छोड़कर इस सूची में हिंदी का कोई और शब्द नहीं है। क्या हमारी प्यारी हिंदी में पिछले दशक भर में ऐसा कोई लफ्ज या मुहावरा नहीं गढ़ा गया है जो अंग्रेजी के इन इतराते शब्दों के साथ रखा जा सके? ‘टाइम मैगजीन’ में दशक के जिन शब्दों के बारे में बात की गई है उनमें से एक है- ‘देमसेल्फ’ जिसके जरिए अंग्रेजी वाले ‘हिमसेल्फ’ या ‘हरसेल्फ’ कहने की बजाय ‘जेंडर-न्यूट्रल’ (लिंग-निरपेक्ष) शब्द के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं। अब हिंदी की बात करें तो ‘जेंडर-न्यूट्रल’ शब्दों के लिए हमारी कोई तैयारी नहीं है। फिलहाल तो हमारे पास ‘थर्ड जेंडर’ के लिए भी कोई सम्मानजनक शब्द नहीं है। या तो वृहन्नला जैसा पौराणिक शब्द है या हिजड़े जैसा अपमानजनक संबोधन! कहा जा रहा है कि जल्दी ही सार्वजनिक स्थानों पर पुरुष और स्त्री शौचालयों के साथ ‘थर्ड जेंडर’ के लिए भी अलग से शौचालय होंगे। हिंदी में यह सूचित करने के लिए ‘साइन-बोर्ड’ पर क्या लिखा जाएगा? ऐसा ही एक शब्द है, ‘बॉडी-शेमिंग’ मतलब शारीरिक कमियों, जैसे-मोटापा, कद या रंग-रूप को लेकर की जाने वाली छींटा-कशी। इन दिनों युवा पीढ़ी इस मामले को लेकर बेहद संवेदनशील है, मगर हमारे पास हिंदी में इसके लिए कोई शब्द नहीं है। शारीरिक क्षमताओं का मजाक उड़ाने वाला समाज यदि संवेदनशील होना चाहेगा तो उसके लिए भाषा भी वैसी ही चाहिए होगी। हिंदी वालों की इसे लेकर कोई तैयारी नहीं दिखाई पड़ती। हम आए दिन सुनते हैं कि फलां व्यक्ति ने अंग्रेजी का एक नया शब्द इस्तेमाल किया, इसे वे ‘क्वाइन्ड ए न्यू वर्ड’ या ‘टर्म’ कहते हैं। इस नए शब्द को लेकर बात होती है और फिर ‘ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी’ उसे ‘मानक शब्द’ घोषित कर शब्दकोश में शामिल कर लेती है। अंग्रेजी वालों ने तो पीढि़यों तक के नामकरण किए हैं। मसलन 1990 के बाद पैदा होने वाली, या 21वीं सदी में जवान होने वाली पीढ़ी को ‘मिलेनियस’ कहा जाता है। वर्ष 1960 के बाद पैदा होने वाली पीढ़ी को ‘जेन एक्स’ कहा जाता है और 1980-90 के बीच पैदा हुए लोग ‘जेन व्हाय’। इसी तरह 21वीं सदी के दूसरे दशक में जवान हुई पीढ़ी को ‘जेन जेड’ कहा गया है। ये सिर्फ  संबोधन की सुविधा देने वाले नाम भर नहीं हैं, बल्कि ऐसे पारिभाषिक शब्द हैं जो खास दौर की पीढि़यों की आदतों, पसंद-नापसंद, उम्मीदों-आकांक्षाओं आदि के बारे में विस्तार से बताते हैं। पिछले वर्षों में हमने अंग्रेजी के ‘मी टू’ जैसे लफ्ज देखे, जिन्होंने यौन-शोषण के खिलाफ  एक पूरा आंदोलन खड़ा कर दिया। इस तरह के शब्द हमें बताते हैं कि वे समाज का आईना भर नहीं हैं, बल्कि अपनी तरह से समाज को बनाते, बिगाड़ते और कभी-कभी किसी खास दिशा की ओर ले जाते हैं। शब्द हवा में पैदा नहीं होते। वे किसी भाषा को बोलने वाले समाज के बारे में, उसके जीवन-मूल्यों, उसकी चाहतों और चिंताओं का पता देते हैं। जाहिर है, जब भी समाज बदलता है, जीवन मूल्य बदलते हैं तो उन्हें अभिव्यक्त करने के लिए भाषा नए शब्दों का आविष्कार करती है। ऐसे में हिंदी में नए शब्द, मुहावरों का पैदा न होना हैरान करता है। क्या वजह है कि हिंदी में ऐसे पारिभाषिक शब्द नहीं मिलते। यह हिंदी की समस्या है, या हिंदी के लेखक, पत्रकार, संपादकों की? हिंदी में सैकड़ों अखबार निकलते हैं, पर अंग्रेजी जैसे दिलचस्प शीर्षक देखने के लिए आंखें तरस जाती हैं। दसियों रेडियो, टीवी चैनल्स पर लगातार हिंदी बोलते रेडियो-जॉकी या एंकर कोई नया शब्द नहीं गढ़ते। हिंदी की कई क्षेत्रीय बोलियां हैं। वे चाहते तो वहां से कोई शब्द उठा सकते थे, लिखे हुए न सही, कम से कम कोई नई ध्वनि तो इस्तेमाल कर ही सकते थे, पर टीवी, रेडियो की राजकुमारियों ने पंजाबी भाषा के ‘हां..ज्जी..’ में रोमांस का तड़का लगा कर बोलने मात्र से नवाचार की अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली लगती है! इस सब पर बात करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि जल्द ही हिंदी इंटरनेट पर सबसे ज्यादा पढ़ी और सुनी जाने वाली भाषा बनने वाली है। हिंदी में लिखे, बनाए गए कंटेंट की एक बहुत बड़ी मांग पैदा हो रही है। हिंदी के लेखकों, भाषाविदों के लिए यह एक बड़ा अवसर और चुनौती है। यदि हिंदी को बचना है तो उसे नई पीढ़ी की आकांक्षाओं, सपनों और चुनौतियों की अभिव्यक्ति के लिए नए शब्द, नए मुहावरे गढ़ने ही होंगे। हिंदी का बचना और बढ़ना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि धर्म और जाति के नाम पर बंटता जा रहा यह देश हिंदी की छतरी के नीचे एक हो सकता है।  उम्मीद कीजिए, आने वाले दशक में हमारे पास भी दुनिया को बताने, सिखाने के लिए नए शब्द, नए मुहावरे होंगे।