Sunday, November 18, 2018 07:33 AM

हिंदी भाषा को मनोभाव से अपनाने की जरूरत

उमा ठाकुर

लेखिका, शिमला से हैं

जीवन में आगे बढऩे के लिए जहां अन्य भाषाएं जरूरी हैं, वहीं मातृभाषा हिंदी को जानना-समझना भी उतना ही जरूरी है। अभिभावक यह कोशिश करें कि बचपन से ही बच्चों को मातृभाषा के महत्त्व के साथ-साथ स्थानीय बोली (पहाड़ी बोली) के महत्त्व को भी समझाएं...

भारत देश में विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं, परंतु दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में ‘हिंदी’ एक है। यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की राजभाषा है। चीनी भाषा के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी भाषा को सम्मान देने के लिए प्रति वर्ष 14 सितंबर को ‘हिंदी दिवस’ मनाया जाता है। हिंदी भारत की संपर्क भाषा है और इसे राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करना ही चाहिए। हिंदी भाषा केवल अभिव्यक्ति का साधन ही नहीं, अपितु राष्ट्रीय एकता और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए भी जरूरी है। महात्मा गांधी ने कहा था ‘राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की उन्नति के लिए आवश्यक है।’

भारतेंदु जी लिखते हैं:-

‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति कौ मूल बिन निज भाषा ज्ञान कै, मिटै न हियकै शूल।’ अर्थात ‘मातृभाषा को समृद्ध करने से ही देश को प्रगतिशील एवं खुशहाल बनाया जा सकता है। अपनी भाषा के ज्ञानोपार्जन से ही अपनी मूल संस्कृति की जड़ों को मजबूत किया जा सकता है।’ हिंदी भाषा के इतिहास की अगर हम बातें करें, तो इसका इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना गया है। दसवीं शताब्दी में अप्रभंश की अंतिम अवस्था ‘अबहट्ठ’ से हिंदी का उद्भव हुआ और चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने इसी अबहट्ठ को पुरानी हिंदी का नाम दिया। अपभ्रंश हुआ और हिंदी के रूप में और निखार आया और इसे खड़ी बोली के रूप में साहित्य में सम्मान मिला। 14 सितंबर, 1949 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 (1) में देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिया गया। सबसे पहले महाराष्ट्र के नागपुर में 10 जून, 1975 को हिंदी दिवस मनाया गया था। हिमाचल प्रदेश में हिंदी भाषा के समुचित विकास एवं कार्यालय के प्रयोग के लिए वर्ष 1975 में ‘हिमाचल प्रदेश राजभाषा अधिनियम 1975’ पारित किया गया। इस अधिनियम के अंतर्गत 26 जनवरी, 1978 से हिमाचल प्रदेश में समस्त प्रशासनिक कार्य हिंदी में ही किए जाने का निर्णय लिया गया। 25 जनवरी, 1965 को हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा जारी अधिकार के अनुसार हिंदी को प्रदेश की राजभाषा घोषित किया गया। भाषा सर्वे के अनुसार भारत में 780 भाषाएं बोली जाती हैं तथा भारतीय संविधान में मान्यता प्राप्त भाषाओं की संख्या 22 है। हिंदी के प्रयोगकर्ता भारत में 70 प्रतिशत से अधिक हैं, जबकि अंग्रेजी भाषा बोलने वालों की संख्या मात्र 0.58 प्रतिशत है। दुनिया भर के देशों में हिंदी को बढ़ावा मिल रहा है और इसे प्रमुख विषय के रूप में शिक्षण संस्थानों में पढ़ाया जा रहा है। हिंदी की शब्द संपदा 2,50,000 से अधिक है। तकनीक के इस दौर में इंटरनेट, टीवी, दूरदर्शन, रेडियो, हिंदी सिनेमा ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में अपनी अहम भूमिका निभाई है। नेशनल जियोग्राफी डिस्कवरी, कार्टून आदि विदेशी चैनलों ने भी अपने कार्यक्रम हिंदी में प्रसारित करने शुरू कर दिए हैं। हिमाचल प्रदेश की अगर हम बात करें, तो पहाड़ी प्रदेश होने के बाद भी हिंदी भाषा के प्रति काफी सजग है। इस दिशा में हिमाचल प्रदेश का भाषा एवं कला संस्कृति विभाग प्रतिवर्ष राजभाषा प्रतियोगिता का आयोजन करता है, जिससे सरकारी व गैर सरकारी संगठनों के कर्मचारियों को हिंदी में सरकारी कामकाज करने के लिए प्रेरित किया जा सके। साथ ही प्रत्येक वर्ष हिंदी पखवाड़ा और 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है, जिसमें साहित्यकारों और कवियों को हिंदी भाषा को सम्मान देने के लिए आमंत्रित किया जाता है। कुछ गैर सरकारी संगठन हिंदी की दशा और दिशा के प्रति लोगों को जागरूक करने के कार्यक्रम का आयोजन करते हैं। बच्चों को स्कूलों में खासतौर से इंग्लिश मीडियम स्कूलों में हिंदी भाषा के महत्त्व के बारे में बताया जाता है। इसी संदर्भ में ‘हिमवाणी’ संस्था द्वारा पैरामाउंट पब्लिक स्कूल में हिंदी भाषा के महत्त्व एवं संरक्षण के लिए आयोजित हिंदी पखवाड़ा कार्यक्रम एक सराहनीय कदम है, जिसमें विद्यार्थियों को हिंदी भाषा के इतिहास और वर्तमान स्थिति से अवगत करवाया जाता है। वर्तमान की अगर हम बात करें, तो हिंदी में प्रचार-प्रसार की अधिक आवश्यकता है। युवा पीढ़ी जो देश का भविष्य है, उसे अपनी मातृभाषा का ज्ञान होना बेहद जरूरी है।

जीवन में आगे बढऩे के लिए जहां अन्य भाषाएं जरूरी हैं, वहीं मातृभाषा हिंदी को जानना-समझना भी उतना ही जरूरी है। बच्चे की परवरिश में अभिभावक की अहम भूमिका होती है। कोशिश यह करें कि बचपन से ही बच्चों को मातृभाषा के महत्त्व के साथ-साथ स्थानीय बोली या कह सकते हैं, ‘पहाड़ी बोली’ के महत्त्व को भी समझाएं। मात्र ‘हिंदी दिवस’ मनाने से हिंदी को लोकप्रियता नहीं मिलेगी, बल्कि हम सब की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि हम अपने-अपने स्तर पर हिंदी भाषा को संस्कार की भाषा और देश की प्रतिष्ठा की भाषा बनाने में सहयोग देकर अपने भारतीय होने पर गौरवान्वित महसूस करें।