Sunday, November 17, 2019 03:22 PM

हिंद-चीन बाजार-बाजार

एक महाबली है, तो दूसरा बाहुबली है। एक सुपर पावर है, तो दूसरा उभरती  हुई शक्ति है। भारत और चीन पुराने पड़ोसी हैं, लेकिन दोनों ही घोर प्रतिद्वंद्वी देश हैं। कमोबेश मित्र देश या रणनीतिक साझेदार नहीं हैं। दोनों में टकराव और शत्रुता-भाव भी है, लेकिन साथ-साथ चलना और सहयोग करना वक्त की मजबूरी है, क्योंकि दोनों विशालतम बाजार हैं, दोनों के बीच छह लाख करोड़ रुपए से अधिक का सालाना कारोबार होता है। बाजार के मद्देनजर दोनों गंभीर साझेदार हो सकते हैं। किसी और बिंदु पर चीन भारत के साथ हर समय मौजूद मिलेगा, यह बहुत बड़ा मुगालता होगा। बेशक भारत और चीन प्राचीन प्रमुख आर्थिक शक्तियां थीं। चीन तो आज भी 13 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था के साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है, लेकिन भारत अभी 2.8 ट्रिलियन डालर तक ही सीमित है। अलबत्ता वह भी छठी प्रमुख अर्थव्यवस्था है, लेकिन भारत और चीन के बीच कई असंतुलनों के साथ-साथ विरोधाभास भी हैं। चीन बेहद चालाक, कुटिल, कूटनीतिक और अविश्वसनीय देश है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत आने से पहले कश्मीर पर उसका रुख अलग था, लेकिन प्रवास के दौरान चीन के सरकारी टीवी पर भारत का जो नक्शा दिखाया गया, उसमें जम्मू-कश्मीर को उसका अभिन्न अंग माना गया। यानी चीन मान रहा है कि कश्मीर पर पाकिस्तान का कोई अधिकार या दावा नहीं है। यदि यही मान्यता है, तो क्या चीन अपने कब्जे वाले गिलगिट, बाल्टिस्तान के इलाकों को भी ‘भारतीय’ घोषित करने की कोशिश करेगा? क्या अक्साई चिन पर से भी अपना कब्जा छोड़ देगा? क्या लद्दाख में भी सेंध लगाकर सड़क आदि का निर्माण बंद करेगा? हमारा मानना है कि चीन ऐसा कभी नहीं करेगा और इन्हें ‘विवाद’ वाली श्रेणी में डाल देगा। बहरहाल दोनों नेताओं ने कश्मीर पर चर्चा नहीं की, लेकिन जिनपिंग आतंकवाद के संदर्भ में पाकिस्तान और कश्मीर का उल्लेख कर ही सकते थे और आतंकवाद के लिए पाकिस्तान को फटकार लगाते हुए चेतावनी दे सकते थे। आतंकवाद और कट्टरपंथ के बारे में संवाद भी प्रसंगवश था, क्योंकि व्यापक तौर पर यह सामने नहीं आया कि चीन किस आतंकवाद का विरोधी है! बेशक भारत और चीन इस समय दुनिया की दो साझा ताकतें हैं। यदि अमरीका के टे्रड वार का मुंहतोड़ जवाब चीन को देना है, तो भारत के साथ अंतरंग, सार्थक और भरोसेमंद संबंध अनिवार्य हैं। भारत ही अमरीका का एकमात्र विकल्प है। दोनों देशों की कुल आबादी करीब 280 करोड़ है। भारत के बाजार में करीब 60 फीसदी स्मार्टफोन, करीब 80 फीसदी खिलौने, करीब 50 फीसदी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण चीन के हैं। चीन की करीब 100 कंपनियां भारत में उत्पादन और कारोबार कर रही हैं। दोनों देशों में 404 अरबपति उद्योगपति हैं और विश्व की करीब 20 फीसदी अर्थव्यवस्था भारत-चीन की है। भारत में चीन का निवेश छह अरब डालर बताया जाता है। बेशक दोनों साझा तौर पर महाशक्ति से भी महाबलि हैं। यदि 21वीं सदी एशिया की होगी तो भारत-चीन का ईमानदार साथ, सहयोग अनिवार्य है। उसके बिना कुछ भी संभव नहीं है। यहां कुछ सवाल स्वाभाविक और मौजू हैं। पहला बुनियादी सवाल तो यह है कि दोनों देशों के आपसी कारोबार में इतना असंतुलन क्यों है कि भारत का व्यापार घाटा 53 अरब डालर तक पहुंच गया है और यह लगातार बढ़ता ही जा रहा है? हालांकि इस मुद्दे पर बातचीत हुई है। दूसरा गंभीर सवाल यह है कि चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप सरीखे अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत की सदस्यता का विरोध क्यों करता रहा है? जबकि सुरक्षा परिषद के लिए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने चीन की पैरवी की थी और चीन वीटो पावर वाला सदस्य बन गया था। इन संदर्भों में देखें, तो चीन को भारत में सिर्फ  बाजार ही दिखाई देता है। उसके अन्य सरोकारों पर चीन चिंतित नहीं है। ऐसी दोस्ती, गरमाहट वाले रिश्ते और भावनात्मक जुड़ाव के कथन बेमानी हैं। आज भारत-चीन के संबंध और यौद्धिक समीकरण 1962 वाले नहीं हैं और न ही दोनों देश युद्ध सरीखा टकराव चाहेंगे, क्योंकि दोनों ही देशों में पड़ोस भी किसी न किसी रूप में मौजूद है। फिर भी संवाद और समझौते बराबरी के स्तर पर होने चाहिए, तभी कह सकते हैं कि भारत-चीन में संबंधों का नया अध्याय शुरू हुआ है।