Thursday, October 24, 2019 04:07 AM

हिमाचली जीवन में साहित्यिक गुंजाइश

किस्त - चार

हिमाचल का नैसर्गिक सौंदर्य बरबस ही हरेक को अपनी ओर आकर्षित करता है। साथ ही यह सृजन, विशेषकर साहित्य रचना को अवलंबन उपलब्ध कराता रहा है। यही कारण है कि इस नैसर्गिक सौंदर्य की छांव में प्रचुर साहित्य का सृजन वर्षों से हो रहा है। लेखकों का बाहर से यहां आकर साहित्य सृजन करना वर्षों की लंबी कहानी है। हिमाचल की धरती को साहित्य सृजन के लिए उर्वर भूमि माना जाता रहा है। ‘हिमाचली जीवन में साहित्यिक गुंजाइश’ कितनी है, इस विषय पर हमने विभिन्न साहित्यकारों के विचारों को जानने की कोशिश की। पेश है इस विषय पर विचारों की चौथी और अंतिम कड़ी...

गुटबाजी के कारण साहित्यकार अलग-थलग

कंचन शर्मा

‘सहितस्य भावः साहित्यम्’ अर्थात् जिसमें सहित का भाव हो, उसे साहित्य कहते हैं। साहित्य वास्तव में शब्द, भावनाओं व अपने समय की समस्याओं व विकास की ऐसी त्रिवेणी है जो न केवल जनहित की धारा ही अपितु समाज के लिए उच्च आदर्शों को स्थापित करने की दिशा में प्रवाहित होती है। हम इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो हम पाते हैं कि स्वयं व अपनी सेना के मनोबल को उन्नत रखने के लिए राजाओं, महाराजाओं द्वारा अपने दरबार में साहित्यकारों को विशेष नियुक्ति दी जाती थी। मध्यकाल में भूषण जैसे वीर रस के कवियों को दरबारी संरक्षण और सम्मान प्राप्त था, बिहारी लाल ने अपनी कवित्व शक्ति से विलासी महाराज को कर्त्तव्य का भान करवाया था। संस्कृत के महान साहित्यकारों कालीदास और बाणभट्ट को राजाओं का संरक्षण प्राप्त था। परतंत्रता के दिनों में अनेक कवि व कवयित्रियों ने अपनी कलम से आजादी की अलख जगाई थी। यहां तक कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता जैसी  कालजयी रचना से रणक्षेत्र में अर्जुन का मनोबल ऊंचा कर उसे अपने अधिकार पाने के लिए युद्ध के लिए प्रेरित किया। आज के परिप्रेक्ष्य में हिमाचली साहित्य में संभावना खोजने की बात करते हैं तो क्या वर्तमान में किसी भी साहित्यकार को इस पंक्ति में खड़ा पाते हैं जिसे अपने समय की सरकार का संरक्षण प्राप्त हो! पहले तो इसके कारण खोजने होंगे। क्या यह सरकारों की साहित्यकारों के प्रति उदासीनता है या फिर साहित्यकार स्वयं को अपने समय की दुर्बलताओं से लड़ते हुए एक सशक्त कलम के सिपाही के रूप में स्थापित नहीं कर पा रहा है! दूसरा, हिमाचल में लिखा क्या जा  रहा है! क्या कविता, कहानी, बाल कहानी लिखना ही साहित्य की जिम्मेदारी है। आज देश हजारों प्रकार की समस्याओं से घिरा पड़ा है, उन समस्याओं को लिखने की जिम्मेदारी किसकी है। प्रत्येक समय के साहित्य में उस काल के परिवर्तनों और संस्कारों का चिन्ह मौजूद रहता है। इसलिए जैसे-जैसे समय की गति बदलती रहती है, साहित्य भी उसी प्रकार परिवर्तित व विकसित होता रहता है। यकीनन निर्मल वर्मा, पहाड़ी गांधी बाबा कांशीराम व ठाकुर मौलूराम जैसे अलौकिक साहित्यकारों ने हिमाचल के साहित्य को राष्ट्रीय स्तर पर अमिट पहचान दी है। लेकिन अफसोस हिमाचल का वर्तमान साहित्य आज गुटबाजी के कुचक्र में फंसा है। तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊं की तर्ज पर साहित्य में संभावनाओं की गुंजाइश नहीं रहती है। हिमाचल में आज एक से बढ़कर एक युवा लेखक हैं जिनमें प्रदेश के साहित्य को शीर्षस्थ ऊंचाइयों पर ले जाने की संभावनाएं हैं। लेकिन गुटबाजी व अपने-पराए की नीतियों के चलते वे अलग-थलग किए जा चुके हैं। यही नहीं, उच्चकोटी के अनेक वरिष्ठ साहित्यकार जो सदैव साहित्य कर्म में  ध्यानरत रहे, लेकिन साहित्यिक साजिशों के तहत उन्हें नेपथ्य में धकेल दिया गया। यहां तक कि भाषा अकादमी के सचिव भी चंद हाथों की कठपुतली बन नाच रहे हैं। किताबों की खरीद-फरोख्त तक में भारी विषमताएं चलती हैं, भाषा अकादमी के कार्यक्रम भी कुछ ही लोगों का अड्डा बनकर रह चुके हैं। अकादमी अपने कार्यक्रम अपने बूते पर करवाने में सक्षम नहीं है जिसके लिए उसे दूसरी संस्थाओं का सहयोग लेना पड़ता है। ऐसे में ‘सहितस्य भाव’ की संभावना ही कहां बचती है। हिमाचल के साहित्य की रीढ़ की हड्डी यानि भाषा अकादमी को मजबूत करने की आवश्यकता है।

परियों की कहानी से आज तक साहित्यिक गुंजाइश

सुरेंद्र मिन्हास

इस विषय पर यदि हम ध्यान देना शुरू करें तो हमें परियों की दुनिया, भूतों, भिरटियों व नानी-दादी की राजा-रानी की कहानियों से समृद्ध काल खंड में लौटना होगा। 500 वर्ष पूर्व की ही बात करें तो उस वक्त साहित्यिक तौर पर बुजुर्गों द्वारा अपने बच्चों को प्रेरणाप्रद, ज्ञानवर्धक, बहादुरी, भय, जात-पात इत्यादि विषयों में ओतप्रोत कहानियां परोसी जाती रही। इन कहानियों, ख्वाबों, मुहावरों व लोकोक्तियों का इतना प्रभाव बच्चों के मन-मस्तिष्क पर पड़ता कि उन्हें वे जीवन पर्यंत याद रहती। वही बच्चे जब स्वयं बड़े बनते तो वही कहानियां वे अपने नाती-पोतों को सुनाते, यही क्रम चलता रहा। इसी के साथ लोकगाथाओं ने भी समाज के ऊपर प्रभाव डाला तथा विभिन्न व्यक्तियों, घटनाओं ने लोकगाथाओं का रूप धारण कर श्रोताओं के मन-मस्तिष्क को झकझोर कर रख दिया। इसी तरह राजाओं के समय में राजाओं की बहादुरी, कायरता, छल-कपट, अन्याय  के किस्से तत्कालीन लेखकों व कवियों ने छंदबद्ध कर स्थानीय बोली में झेड़ों की शक्ल में परोसे, जिनका प्रभाव कालांतर तक पाठकों व श्रोताओं के मन पर पड़ता रहा। हीर-रांझा जैसे अनेक किस्से आज भी प्रदेश के जनमानस की जुबां पर राज कर रहे हैं। यशपाल, चंद्रधर शर्मा गुलेरी सरीखे गिने-चुने लेखक एक कालखंड में उभरे तथा उनकी रचनाएं हिमाचली जीवन में घर कर गई और अमिट होकर कालजयी बनी। इसी तरह मुंशी प्रेम चंद की कहानियां इतनी लोकप्रिय हो गई कि उन्हें आज भी हिमाचली जनमानस बड़े चाव से सुनना पसंद करता है। यदि वर्तमान में हिमाचली साहित्यकारों के कार्यों व कृतित्व पर गौर किया जाए तो आज भी प्रदेश में कुछ साहित्यकार ऐसे हैं, जिनकी रचनाएं हिमाचली लोगों के मन मस्तिष्क पर असर कर रही हैं।

यूं तो प्रदेश में लेखकों की संख्या हजारों में है, परंतु श्रोताओं व पाठकों की नब्ज पकड़ने में जिन्हें महारत हासिल है वे दो दर्जन से अधिक नहीं। भीम सिंह नेगी, रामकृष्ण कांगडि़या, भगत राम मुसाफिर, लश्करी राम, जीत राम सुमन, ललित कश्यप, वीनावर्धन, अशोक दर्द, कृष्ण चंद महादेविया, भूपेंद्र सिंह, बुद्धि सिंह चंदेल, अमरनाथ धीमान, अमरदेव अंगीरस, प्रत्यूष गुलेरी, मुरारी शर्मा, जयदेव विद्रोही सरीखे कुछ नाम हैं, जिनकी हिंदी व पहाड़ी साहित्य लेखन में अच्छी खासी पकड़ है और वे पाठकों का दिल जीतने की कुब्बत रखते हैं। साहित्य सृजन के लिए देवभूमि हिमाचल से श्रेष्ठ और कोई स्थान नहीं, इसलिए बाहरी राज्यों के साहित्य लेखक प्रदेश की तरफ रुख करते रहते हैं। महर्षि वेद व्यास ने भी अपने साहित्य लेखन के लिए बिलासपुर में शतद्रु नदी के तट पर गुफा को शायद इसी कारण चुना होगा, जो आज व्यास गुफा के नाम से विश्व विख्यात है। भले ही आज की पीढ़ी सोशल मीडिया या डीजे की धुनों की दीवानी है, परंतु यदि इन्हें उत्कृष्ट साहित्य सौंपा जाए तो वे अवश्य ही साहित्य में दिलचस्पी लेंगे। यूं भी कहते हैं कि यदि साहित्य में जान हो तो पाठक और श्रोता खुद-ब-खुद खिंचा चला आता है साहित्य रूपी शहद का रस पीने। वर्तमान में नितांत आवश्यक है कि साहित्यिक विधाओं के अनछुए पहलुओं, यात्रा वृत्तांत, लघु कथाओं, बाल कथाओं, बाल कविताओं, क्षणिकाओं का स्तरीय लेखन और प्रकाश हो, जिससे पाठक श्रोताओं को साहित्य पठन से मानसिक शांति व प्रेरणा मिले।

हिमाचली जीवन में व्यापक साहित्यिक गुंजाइश

दीपक कुल्लुवी

हिमाचली जीवन में साहित्यिक गुंजाइश इतनी ज्यादा, इतनी व्यापक है जिसका वर्णन करना आसान नहीं। मुख्य कारण यहां की भौगोलिक स्थिति और सुख-शांति, हिमाचल के ऊंचे-घने-हरे-भरे वृक्ष, गगनचुंबी पहाड़, कलकल करती नदियां और झीलें एक आम इनसान को भी लेखक बना डालती हैं और प्रेरित करती हैं ज्यादा से ज्यादा साहित्य सृजन  करने के लिए। भाग्यशाली हैं हम सब जो इस शांत प्रदेश के निवासी हैं। पहाड़ी गीतों की मिठास देखिए। पहाड़ी भाषा अद्भुत है, बेमिसाल है और पहाड़ी लेखक जो हिंदी में भी लिखते हैं, उसमें भी वही मिठास घोलने की कोशिश करते हैं और सफल भी हुए हैं। जहां दृश्यावलियां लेखक की लेखनी की नाक के नीचे बिंब प्रस्तुत करती हैं, वहां पर्वत शृंखलाओं के ऊपर टिकी हुई सफेद बदली से प्रभावित होकर हर आदमी के मन में हिलोरें पैदा करती है जो साहित्यिक अनुभूतियों की कारक होती है। फुलमू  और रांझू, कुंजू और चंचलो के संवाद उनके अपने नहीं, यह कलकल बहती हुई नदियों के प्रणय और वियोग की ही तो रूपरेखा है जो पर्वतों की देन है। जहां हम विकास के नाम पर  पर्वतों का सीना चीर रहे हैं, पर्यावरण की अर्थी उठा रहे हैं। प्राकृतिक स्रोतों को सुखाते चले जा रहे हैं, वहां यह पर्वत के सीने पर चलाया गया डोजर ही कहा जा सकता है। बढ़ती हुई जनसंख्या, वाहनों द्वारा निकलता हुआ ध्वनि प्रदूषण पहाड़ी संस्कृति के लिए अभिशाप है। राजनीतिक दृष्टिकोण से यह कहकर संतोष करना पड़ता है कि आखिर कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है। हिमाचली जीवन में साहित्यिक गुंजाइश बहुत ज्यादा है, वैसे लेखक चाहे पहाड़ का हो या रेगिस्तान का, उसे साहित्य की नोक के नीचे तो रहना ही पड़ेगा। इसके अलावा यह भी एक सत्य है कि हमारी युवा पीढ़ी साहित्य की ओर कम ध्यान दे रही है। कुछ ही युवा ऐसे हैं जिनकी साहित्य में रुचि है। आज का युवा इंटरनेट व सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय लगता है। इसके कारण साहित्य के पाठक नहीं बढ़ पा रहे हैं। साहित्य के पाठकों की संख्या बढ़ाने की दिशा में कारगर कदम उठाए जाने चाहिए और युवाओं को साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

साहित्यिक गुंजाइश साहित्यिक जिम्मेवारी बनी

हींगराज चिराग

चिरकाल से ही प्रकृति और साहित्य का प्रगाढ़ संबंध रहा है। हिमाचल प्रदेश की देवभूमि जहां एक तरफ प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है तो दूसरी तरफ यहां की जिंदगी प्रकृति के बेहद निकट है। इनसान प्रकृति का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। यह प्रकृति और जो कुछ भी प्रकृति के निकट है, उसकी तरफ हमेशा आकर्षित हुआ है। हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक संरचना एवं इसकी गोद में बह रही जीवनधारा सभी को रोमांचित एवं आकर्षित करती है। यहां के बर्फ एवं पेड़ों से ढके पहाड़, कलकल करती बहती नदियां, झरझर बहते झरने, झीलें, वन्य जीव-जंतु एवं यहां के लोगों की जीवन शैली बरबस ही हर किसी को अपनी ओर खींच ले आती है। प्राचीन काल से ही हिमाचल की यह पावन धरती ऋषियों, मुनियों, वीर योद्धाओं एवं साहित्यकारों की कर्मभूमि रही है। हिमाचल की विशाल सांस्कृतिक विरासत इसे विश्व में एक अलग ही पहचान दिलाती है। हिमाचली जीवन प्रकृति के अधिक निकट होने के कारण रोमांच एवं कठिनाइयों से भरा पड़ा है। हिमाचली जीवन को जिसने भी करीब से देखा है, उसका अंतर्मन हमेशा उद्वेलित हुआ है। इस उद्वेलन को साहित्यकारों ने लेखनी के माध्यम से उतारा है। आधुनिकता एवं विकास समय की मांग है। ये सब संतुलित होना चाहिए। जिसके लिए हिमाचल जाना जाता है, वो ही अगर सब कुछ खत्म हो गया तो हमें कौन पहचानेगा। हिमाचली जीवन में साहित्यिक गुंजाइश अपार है। आधुनिक संदर्भ में तो यह साहित्यिक गुंजाइश नहीं, बल्कि साहित्यिक जिम्मेवारी बन गई है, जिसे हर साहित्यकार को निभाना चाहिए क्योंकि दुनिया में आज तक जो कुछ बदला है या जो कुछ भी संरक्षित है, उसमें साहित्यकारों का बहुत बड़ा योगदान है। हिमाचली जीवन प्रकृति एवं सत्य के बेहद निकट होने के कारण इसमें अपार साहित्यिक गुंजाइश है। इसके अलावा यह भी एक सत्य है कि हमारी युवा पीढ़ी साहित्य की ओर कम ध्यान दे रही है। कुछ ही युवा ऐसे हैं जिनकी साहित्य में रुचि है। आज का युवा इंटरनेट व सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय लगता है। इसके कारण साहित्य के पाठक नहीं बढ़ पा रहे हैं। साहित्य के पाठकों की संख्या बढ़ाने की दिशा में कारगर कदम उठाए जाने चाहिए और युवाओं को साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

हिमाचल में लेखन का संग्रहण नहीं हो रहा

कर्नल जसवंत चंदेल

गुंजाइश की बात करूं तो इसका मतलब स्थान या जगह है। हालांकि अवकाश भी इसका अर्थ होता है, मगर इस लेख में स्थान या जगह अर्थ को ध्यान में रखकर ही आगे लिखूंगा। मनु महाराज हिमाचल में हुए, वेद व्यास का संबंध बिलासपुर व अन्य हिमाचली स्थानों से है, वेद यहां पर लिखे गए, कहते हैं पुराणों की रचना भी इसी भू-भाग में हुई लगती है। विद्वानों ने हिंदी साहित्य को आदिकाल, वीरगाथा काल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल के रूप में वर्णित किया है। साहित्य से हर क्षण छोटी-छोटी किरणें फैलती हैं। इस तरह यह किरणें उसी समय से फैल रही हैं जब से मनुष्य ने होश संभाला और बोलचाल के लिए किसी भाषा का आविष्कार किया।

हिमाचल में मानव की उत्पत्ति, उसके जीवन का विकास तथा रहन-सहन, खान-पान और भाषा अति प्राचीन है। हिमाचल की घाटियों के सर्वेक्षण से पाए गए अलग-अलग उपकरण यह प्रमाणित करते हैं कि आदिकाल से 5000 वर्ष पूर्व यहां पर पाषाण काल के मानव वास करते थे। यहीं से हमारी सभ्यता का विकास प्रारंभ हुआ लगता है। सभ्यता का विकास ही साहित्य की जननी होती है। साहित्य जीवन की वास्तविक समस्याओं, विद्रूपताओं पर विचार करता है और उन्हें हल करने में मददगार होता है। साहित्य ही हमारे विचारों और भावों को गति प्रदान करता है। साहित्य के हर काल में हिमाचली भू-भाग पर लेखन कार्य होता आया है। आदिकाल में जब भक्ति भावना दक्षिण से उत्तर भारत पहुंची तो हिमाचल में अपनी-अपनी बोली में शिव-पार्वती के भजनों का प्रचलन बढ़ा। भक्तिकाल में कृष्णलीला पर भजन आए लगते हैं। रामलीला इसका दूसरा उदाहरण है। बघल्याणी लोक रामायण-बाघल व धामी जैसे स्थानों पर आज भी रातभर मंडलियां गाती फिरती हैं। रजवाड़ों के समय के चेहड़े आज भी प्रचलित हैं। सिद्ध चानों का गुणगान रात भर चलता है। हालांकि इस तरह का साहित्य मौखिक है, पर इसे नकारा नहीं जा सकता। इस तरह का साहित्य समाज का दर्पण होता है। आज हिमाचल के लगभग हर जिले में लेखक संघ नामक साहित्यिक संस्थाएं बन चुकी हैं। ये मंच नए और पुराने लेखकों को प्रोत्साहित कर रहे हैं कि वे कुछ लिखें। जरूरत है हर लेखक अनुभव व्यवस्थित कर बड़ी ईमानदारी से अपनी कलम चलाए। हिमाचली जीवन में साहित्यिक गुंजाइश बहुत है, लेखक और साहित्यकार भी बहुत हैं, मगर उस लेखन का संग्रहण कहां हो रहा है। मेरा मानना है कि सरकार व उसके विभाग को इस पर गौर करने की आवश्यकता है।

 

सूचना

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