Monday, April 06, 2020 06:26 PM

हिमाचल में बाल पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका

कृष्णचंद्र महादेविया

मो.-8679156455

बालकों में प्रसन्नता भरने, आत्मविश्वास जगाने, अच्छे संस्कार देने के साथ, उनकी जिज्ञासाएं शांत करने, उनमें संवेदना और कल्पना बढ़ाने के गुण जिस साहित्य में हों, उसे बाल साहित्य का दर्जा दिया जाता है। बालकों के सर्वांगीण विकास के लिए स्वस्थ बाल साहित्य का होना अत्यंत अनिवार्य है। बालक की प्रथम पाठशाला परिवार और पहली गुरु मां होती है। परिवार से बालक का व्यक्तित्व और चरित्र विकास प्रारंभ हो जाता है, इसलिए आवश्यक है, परिवार और माता-पिता का कुल अकलुषित स्वरूप परिवार से ही बालक जीवन जीने के लिए, समाज और राष्ट्रहित में तमाम तत्त्वों को पाता है। परिवार में पठन-पाठन की प्रवृत्ति और माता में साहित्य के प्रति प्रेम और अभिरुचि बालक में सहज ही हस्तांतरित हो जाती है। अतएव, परिवार माता व पिता बालक में बाल साहित्य की ओर सरलता से प्रवृत्त कर सकता है। मोबाइल, एलसीडी, कंप्यूटर के अत्यधिक प्रचलन से बालकों में खेलने और पढ़ने की प्रवृत्ति में कमी आई है, किंतु इसका दायित्व भी परिवार और पाठशाला पर ही है। माता-पिता व गुरुजन जागरूक नागरिक होने के साथ अच्छे पुस्तक प्रेमी भी रहने चाहिए। बालकों का कोमल मन परिवार, स्थानीय परिवेश और पाठशाला से वास्तविक ज्ञान, शिक्षा, संस्कार प्राप्त कर बाल साहित्य के पठन-पाठन से दो-चार होता है। अतः परिवार और पाठशाला ही बच्चे में बाल साहित्य पढ़ने में स्वस्थ रुचि पैदा करता है। हिमाचल प्रदेश में बहुत पहले से बालकों को केंद्र में रखकर बाल साहित्य का सृजन किया जा रहा है। यद्यपि, दादी-नानी, बड़े-बुजुर्गों से लोक कथाएं, पहेलियों, लोकोक्तियों, लोकनाट्यों, लोरियों, लोकगीतों से हिमाचली बच्चों के स्वस्थ मनोरंजन, व्यक्तित्व एवं चरित्र विकास, ज्ञान और शिक्षा मिलती रही है। भारत के अन्य राज्यों की भांति हिमाचल में भी बाल साहित्य का बेहतर सृजन होता रहा है।

संतराम वत्स्य, डा. गौतम व्यथित, डा. सुशील कुमार फुल्ल, सैन्नी अशेष, प्रत्यूष गुलेरी से लेकर पवन चौहान तक अनेकों साहित्यकार बाल साहित्य का लगन से सृजन कर रहे हैं। देश की तमाम बाल पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं के साथ उनकी सुंदर बाल साहित्य कृतियां भी उपलब्ध हैं। हिमाचल प्रदेश में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की पत्रिका हिमप्रस्थ और साप्ताहिक गिरिराज बाल साहित्य के प्रकाशन में सर्वदा अग्रणी हैं। हिमप्रस्थ मासिक तो बाल साहित्य में एक सुंदर और महत्त्वपूर्ण विशेषांक भी प्रस्तुत कर चुकी है। इनके साथ-साथ कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी की पत्रिका हिम भारती और सोमसी भी बाल साहित्य को स्थान दे रही है। मंडी की युग मर्यादा और मंडी समाचार, बागर, हिमतरू, हिमखंड, कल्पद्रुम, हिम सुमन, हिम कलाधर, सृजन सरिता, ज्ञान विज्ञान समिति द्वारा अक्कड़-बक्कड़ व मरुआ, पंचजगत, सुरभि, अपना हिमाचल, रचना, बाणेश्वरी, हिमालय डॉन, हिमालय टाइम्स, हिमाचल जनता, न्यूज पोस्ट, शक्ति दर्शन, शब्द मंच, पर्वतगाथा, पहाड़ी लहर, आर्य वंदना, सुरेंद्र मिन्हास द्वारा संपादित हैड न्यूज हिमाचल, चंबा न्यूज, हिमाचल केसरी आदि का योगदान भी उल्लेखनीय है। इसके साथ ही समय-समय पर निकलने वाली स्मारिकाओं में भी बाल साहित्य के दर्शन होते हैं। विभिन्न पाठशालाओं की पत्रिकाओं में बाल रचनाकारों द्वारा लिखित साहित्य भी बालकों के लिए उपयोगी रहता है। इधर राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय छम्यार में पवन चौहान द्वारा दीवार पत्रिका का श्रीगणेश, बाल साहित्य के क्षेत्र में मील का पत्थर है। दिव्य हिमाचल दैनिक के ‘बचपना’ पृष्ठ का बाल साहित्य प्रकाशन में महत्त्वपूर्ण और श्लाघनीय योगदान है। अपने जन्म से लेकर अब तक दिव्य हिमाचल का अवदान बाल साहित्य हेतु मार्के का रहा है। इसके अलावा हिमाचल दस्तक का ‘बाल गोपाल’, अमर उजाला का ‘कच्ची धूप’, अजीत समाचार का ‘बचपन’, दैनिक सवेरा का ‘बाल सवेरा’, आपका फैसला का ‘नन्हे मुन्ने’, पंजाब केसरी की ‘बाल केसरी’ पत्रिका, दैनिक न्याय सेतु, दैनिक भास्कर की ‘बाल भास्कर’ पत्रिका और दैनिक ट्रिब्यून के ‘लहरें’ सप्लीमेंट में प्रकाशित होने वाला बाल साहित्य भी प्रमुख है। इसके साथ ही कुछ बंद हो चुके पत्र-पत्रिकाएं भी बाल साहित्य में सुंदर योगदान देते रहे हैं। आकाशवाणी शिमला लंबे अरसे से बाल कार्यक्रम कराता रहा है। आवश्यकता है, घर और पाठशाला में बालकों को मनपसंद साहित्य की ओर रुझान पैदा करने हेतु उचित वातावरण निर्माण करने की, उनमें सृजनशीलता व पाठन हेतु प्रोत्साहन देने की। हिमाचल प्रदेश में एक सुंदर-सी बाल पत्रिका की आवश्यकता लंबे समय से बनी हुई है। उम्मीद है, हिमाचल से शीघ्र ही बाल पत्रिका का पूरा प्रणयन होगा। श्रेष्ठ नागरिक और संपन्न राष्ट्र के निर्माण हेतु यह आवश्यक है।