हिमाचल में हर जगह बसते हैं किन्नर और किरात

हिमाचल का इतिहास भाग-12

इस जाति के लोग हिमाचल की पहाडि़यों तथा मैदानों में हर जगह बसते हैं। वे नागों अर्थात सर्पों और विशेषकर मणिधारी सर्पों की पूजा करते थे और नाग उनका कुल चिन्ह था। ऐसा प्रतीत होता है कि नाग जाति सबसे पहले मैदानों और मैदानों से लगने वाली हिमाचल की घाटियों में बसती होगी और धीरे- धीरे हिमालय के ऊंचे भागों की ओर भी फैली होेगी…

गतांक से आगे

आज ये लोग चंबा में लाहौले, कुल्लू में मलाणा, ऊपरी सतलुज के कनावर (किन्नर), माणानीती के मारछा, अस्कोट (अलमोड़ा) के राज किरात आदि नामों से पुकारे जाते हैं।किन्नरों और किरातों के सहजातीय बंधु संभवतः नाग भी थे। यद्यपि किरात जाति के कोई भी अवशेष इस प्रदेश में नहीं मिलते फिर भी  प्रागार्यकालीन नागों से संबंधित कई गढ़ यहां मिलते हैं। इस जाति के लोग हिमाचल की पहाडि़यों तथा मैदानों में हर जगह बसते हैं। वे नागों अर्थात सर्पों और विशेषकर मणिधारी सर्पों की पूजा करते थे और नाग उनका कुल चिन्ह था। ऐसा प्रतीत होता है कि नाग जाति सबसे पहले मैदानों और मैदानों से लगने वाली हिमाचल की घाटियों में बसती होगी और धीरे- धीरे हिमालय के ऊंचे भागों की ओर भी फैली होेगी। आज प्रायः सभी गांवों में नहीं, तो सभी परगनों में नागों की पूजा की जाती है। कई नाग मंदिर में नाग को शासक के रूप में दिखाया  गया है। इन मंदिरों में नाग देवताओं की प्रस्तर या धातु मूर्तियां भी देहधारी मानव सरीखी हैं, जो चारों ओर से सर्पाकृति के रेखाचित्रों से कुरेदी गई हैं। मंडी नदी में व्यास और सुकेती नदियों के संगम पर बने पंचवक्त्र नामक  प्राचीन शिव मंदिर के मुख्य द्वारा पर, जो व्यास नदी की ओर है। द्वारपालों के रूप में दो नागों को दिखाया गया है। नागों की ये मूर्तियां कोई दस-दस फुट ऊंची हैं। ऐसे ही अनेक  उदाहरण देश भर में मिलते हैं। इस जाति के लोग प्रागार्य खशों से भी पहले यहां बसते थे। इतिहास इस संस्कृति पर मौन है। अनुमान केवल यही लगाया जा सकता है कि इस जाति का संगठन कौटुम्बिक आधार पर हुआ था। और प्रत्येक  कुटुम्ब की पृथक बस्ती होती थी, जिसका मुखिया कोई वृद्ध पुरुष होता था। नाग जाति एक कोरी कल्पना है, यह भ्रम हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों में पाई मुहरों से दूर हो गया है। मिट्टी की एक विशेष प्रकार की मुहर में दो नोगों के सिर बने हुए हैं, जो भारत की आदि जाति नाग के अस्तित्व को प्रमाणित करती है। इन नागों को आर्यों ने भारत में प्रवेश करने के पश्चात उत्तरी भारत तथा हिमालय की पर्वतीय घाटियों में पाया था और उन्हें हिमाचल के दुर्गम भागों की ओर भगा दिया। नांगों का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। उस काल में उनके यमुना घाटी में रहने का वर्णन मिलता है। महाराष्ट्र से यह भी पता चलता है कि पांडु पुत्र अर्जुन ने हरिद्वार के नाग राजा वासुकी की ऊलोपी नामक नाग कन्या से गंधर्व विवाह किया था। इसी वासुकी नाग की उपासना अब तक पश्चिती हिमालय अर्थात चंबा, कुल्लू आदि में वासुकी नाग के नाम से की जाती है। महाभारत काल में ही आर्यों ने इंद्रप्रस्थ के निकट खांडव वन (आज का मेरठ) में नागों  को अनके नाग-राजा तक्षक सहित हिमाचल की पहाडि़यों में शरण लेने के लिए बाध्य किया और बाद में तक्षक नाग ने हिमालय में नाग राज्य स्थापित किया।

 क्रमशः

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