Wednesday, August 21, 2019 03:56 AM

हिमाचल से जम्मू-कश्मीर के दीदार

कश्मीर घटनाक्रम के बगल में बैठे हिमाचल प्रदेश के लिए अपने साझे पहाड़ पर अमन की रोशनी का इंतजार, देश की बदलती परिस्थिति और पड़ोसी राज्य के नए दीदार में समाहित है। लद्दाख के आंगन में आई नई बहार हो या जम्मू-कश्मीर के नए अवतरण में राष्ट्रीय संसाधनों का पैगाम, अब हिमाचल उस बराबरी का हकदार है, जो कभी बहते दरियाओं के आर पार रंग बदलती रही है। आजाद भारत के मायने और जम्मू-कश्मीर के सवाल पर बहता रहा राष्ट्रीय पसीना हिमाचल के माथे पर भी रहा, क्योंकि सरहद पर लिखी हर कहानी में प्रदेश के नायक दर्ज रहे। हिमाचल का हर चूल्हा जानता है कि रिश्ते तो उधर भी कमोबेश एक जैसी पृष्ठभूमि का आदाब रहे, लेकिन बिखराव की आंधियों ने हमसे भी तो दर्जनों जिंदगियां छीनी। जिन्हें फख्र था सेना की वर्दी और उस शपथ का, जो तिरंगा पहन कर पहरा देती रही तथा उसी में लिपट कर जब शहादत की खबर बनी, तो हर बार लहू ने केवल ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष लिखा। इससे पहले हिमाचल ने पंजाब से आए आतंकवाद में रिश्तों के जख्म ढोए हैं, तो जम्मू-कश्मीर की अशांति के जख्म चंबा के सतरुंडी-कालावन से सुप्पाचोली तक महसूस किए गए। हिमाचल के वजूद का डोगरा संस्कृति से जुड़ा स्नेह अगर जम्मू की रियासत तक था, तो मणिमहेश यात्रा से जुड़ते भद्रवाह के समूहों में आस्था की डगर की रिवायत वर्षों से विश्वास से हिमाचल में वरदान ढूंढती है। वर्षों से कश्मीरी मजदूरों के आने से शिमला में माल ढुलाई की सुविधा, अगर अनूठा तालमेल न बनाती तो मिट्टी तेल के ड्रम या गैस के सिलेंडर प्रतिबंधित मार्गों की चढ़ाई न चढ़ते। कुछ इसी तरह केबल के लिए जमीन की खुदाई करती कश्मीरी मजदूरों की टुकडि़यां और दोनों प्रदेशों के एफएम रेडियो के प्रसारण पकड़ते श्रोताओं का सद्भाव सांस्कृतिक साझेपन की जड़ों पर भरोसा करता रहा है। लद्दाख के अलग होने या जम्मू से नाते-रिश्तों की अटूट गाथा को पिरोने के अलावा भी आजाद भारत के कश्मीर के लिए मेजर सोमनाथ शर्मा का बलिदान और देश के गौरव का पहला परमवीर चक्र याद दिलाता है कि हिमाचल के लिए वहां की शांति कितनी कीमत रखती है। इसलिए जम्मू-कश्मीर की नई राजनीतिक संरचना कम से कम हिमाचल की सामाजिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को यह विश्वास दिलाती है कि वर्षों की जंजीरें खुली हैं। हिमाचल में बयाही गईं जम्मू-कश्मीर की बेटियों को पहली बार मायके की विरासत मिली है, तो उन शहनाइयों को फिर से मंगलगीत गाने का अवसर जो कभी विदाई के वक्त बजीं और उसके बाद भूल गईं कि इनके लौटने की राह। हिमाचल के पहाड़ सदियों से जम्मू-कश्मीर की नदियों के लिए पिघलते रहे, लेकिन लाल लकीरों में कैद प्रदेश ने आजादी की लहरें भी देखना मुनासिब नहीं समझा। हैरानी यह कि मशहूर लोकगीत जो कभी जम्मू की राहों से चंबा की दूरी पूछा करता था, नए दौर में ‘माए नी मेरिए शिमले दी राहें चंबा कितनी की दूर’ कहता हुआ यह आभास दे गया कि उस पार अब रास्ते नहीं जुड़ते। अशांत कश्मीर के जितने भी आंसू वहां गिरे, उनसे जुड़े दर्द का एहसास आज भी हिमाचल के आंचल में बसा है। विस्थापित कश्मीरी पंडितों की बस्तियां और हिमाचल में उभरते उनके क्षितिज जिस सूर्योदय का इंतजार करते रहे हैं, शायद वह सुबह जरूर आएगी। एक नया विश्वास हिमाचल की भुजाओं को खोलता हुआ एक ओर लद्दाख को गले लगाता है, तो दूसरी ओर जम्मू से पींगें बढ़ाता है। पड़ोस के घटनाक्रम में सौहार्द की आशा और बराबरी के मजमून देखकर हिमाचल की अपनी सुरक्षा चुनौतियां कम होती हैं, तो आर्थिक रिश्तों में स्वाभाविक लक्षण देखने की उम्मीदें बढ़ जाती हैं। देखना यह होगा कि हिमाचल के आसपास के उपद्रवग्रस्त इलाकों में केंद्र की गश्त में अब कितने राष्ट्रीय संसाधन बंटते हैं और शांतिप्रिय होने के नाते हमारे भविष्य की पैरवी कैसे होती है।