Thursday, December 03, 2020 07:03 AM

‘होम डिलिवरी’

व्यंग्य

राजेंद्र राजन

मो.-8219158269

लॉकडाउन के बीच लेखकों का एक डैपुटेशन राजा को मिलने में कामयाब हो गया। ‘कहो क्या फरियाद है?’ लेखकों के सरदार ने दंडवत प्रणाम किया। ‘देशभर के हजारों लेखक डिप्रैशन में हैं। एक तो कोरोना का खौफ, उस पर शराबबंदी। बिन मदिरापान के हजारों लोग मर चुके हैं। उनमें लेखक भी हैं। कोरोना मरीजों के साथ-साथ लेखकों ने भी आइसोलेशन वार्ड्स पर कब्जा कर लिया है।’ ‘क्या बक रहे हो? क्या कोई शराब न पीने से भी मर सकता है? औरतें खुश हैं। घरेलू हिंसा नहीं हो रही। शराबी घर तोड़ू होते हैं। लोग स्वस्थ हैं। देश स्वस्थ है।’ ‘सर आपकी फीडबैक सही नहीं है। मीडिया बता रहा है कि शराब की दुकानें लूटी जा रही हैं। ठेकेदार गरीबी रेखा से नीचे जा रहे हैं। यकीन करें, लोग खासकर लेखक जमात भूखे रह सकती है, शराब के बगैर जी नहीं सकती। एक हजार से ज्यादा लोग शराब के बगैर आत्महत्या कर चुके हैं।’ ‘शराब की दुकानों की दीवारें तो मजबूत होती हैं। ताले लगे होते हैं। वे भला कैसे टूट सकती हैं?’ ‘बाबरी मस्जिद टूट सकती है तो ये तो ... मस्जिद की दीवारें भी तो पुख्ता थीं।’ ‘तुम लोग क्या चाहते हो?’ ‘आप जानते ही हैं, अदबी दुनिया का सुरा से चोली-दामन का साथ है। पिये बिना तो कलम भी उंगलियों तक पहुंचने से इनकार कर देती है। मिजऱ्ा ग़ालिब नशे के आदी थे, तभी महान शायर बने। रचना पर बिन नशे के संकट मंडरा रहा है। हम लिख नहीं पा रहे। साहित्य को जीवित रखने का जिम्मा हमारी बिरादरी पर ही तो है। अगर हम कहानी, कविता, उपन्यास नहीं लिख पाए तो इतिहास हमें कभी मुआफ  नहीं करेगा। आने वाली पीढि़यां हमें सौ लानते भेजेंगी।’ ‘बंद करो ये बकवासबाजी। मूर्ख नहीं हूं मैं। तुम लोग मुझे बरगला नहीं सकते। तुम वही लोग हो न, वो कलमधारी, फिल्मकार, कलाकार, नाच-गाने वाले जिन्होंने देश को सिर पर उठा रखा है। कभी इंटॉलरेंस, तो कभी मॉब लिंचिंग को मुद्दा बनाकर मीडिया की सिंपथी पाना चाहते हो। जानते नहीं, देश की छवि दुनियाभर में तुम लोग धूमिल कर चुके हो, अपने विरोधी विचारों से।’ लेखकों का सरदार भी पक्का खिलाड़ी था। कब हार मानने वाला था, ‘हुजूर दुरस्त फरमाते हैं। पर चंद लेखकों की गलती की सजा सभी लेखकों को देना मुनासिब नहीं है।’

‘तुम लोग किस तरफ  हो। सरकार के विरोध में या पक्ष में?’ सरदार बोला, ‘आपकी तरफ, आपकी सरकार से मोटिवेट होकर हमने काफी रचनाएं की थीं। लेकिन शराबबंदी के कारण सब थम गया। लिखने के लिए दिल और दिमाग का रिलैक्स होना जरूरी है।’ ‘स्टॉप दिस।’ राजा ने बज़ीर को तलब किया। परामर्श के बाद बजीर बोला, ‘महाराज ये पॉवरफुल कौम है। प्रेमचंद, गोर्की, टॉलस्टाय को पढ़कर ही तो महात्मा गांधी महान बने थे। ये सब कोमल हृदय प्राणी हैं। इनका दिल शीशे की तरह कमजोर होता है। जरा सी ठेस से चकनाचूर हो सकता है। अगर वे शृंगार रस की कविताएं न लिखें तो हुजूर की जिंदगी उदास हो सकती है।’ राजा की भृकृटी तन गई, ‘तुम मेरे एडवाइजर हो या इन कलम-घसीटुओं के पीआरओ?’ बजीर भी डटा रहा, ‘हुजूर जाने दीजिए। दरबार से फरियादी को खाली हाथ लौटाना ठीक न होगा। ये लोग फिर खामख्वाह आपके खिलाफ  दुष्प्रचार करेंगे। जीडीपी खतरे में है। शराब बिक्री से ही तो रैवेन्यू जेनरेट होता है। महामारी के भय को भगाने के लिए नशा कारगर होता है। मरना तो सबको ही है, एक दिन। पीकर मरे या कोरोना से, क्या फर्क पड़ता है? शायद हमारे देश को पॉपुलेशन कंट्रोल के लिए ही हमारे दोस्त मुल्क चीन ने यह मेहमान भेजा हो?’

राजा के चेहरे पर मुस्कान के भाव देखकर लेखक खुश हुए। लगा वे जंग जीतने ही वाले हैं। ‘तुम्हारे सरदार और अपने एडवाइजार बज़ीर की दलीलें सुनने के बाद मुझे पहली बार एहसास हुआ कि अदबी जमात भी इंटैलैक्चुअल होती है। मेरा ख्याल है मेरे कैबिनेट में एक बज़ीर तो राइटर्स कम्युनिटी से होना ही चाहिए। मुझे ठीक गाइड करेगा। मेरे मंत्री और अफसर फाइलों से मुझे डराते रहते हैं। ये न करो, वो न करो। सब मिसगाइड ही करते रहते हैं। मैं तुरंत कैबिनेट की बैठक बुलाता हूं और यह गंभीर मसला डिस्कस करता हूं। तब तक आप सुधीजन महल में ही रहो। आपके चाय-पानी, नाश्ते का इंतजाम करवाता हूं।’ लेखक खुश थे कि उनको न्याय मिलने ही वाला है। वे फूले नहीं समा रहे थे। कैबिनेट ने सर्वसम्मति से फैसला किया कि शराब पर पाबंदी तुरंत हटा ली जाए। लेखकों को खुश रखने के लिए लाजिमी है कि वे खुलकर मदिरापान करें। मंत्रिमंडल ने राजा की सरपरस्ती में माना कि लेखक को खुश रखना सरकार की पहली प्राथमिकता है। वो खुश होगा तो मीडिया और सोशल मीडिया में सरकार के पक्ष में कविताएं, कहानियां पोस्ट करेगा। राजा को संसार का सर्वश्रेष्ठ राजनीतिज्ञ घोषित करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा देगा। दबे, कुचले, सताए, भिखमंगों की तरफ  देखने की जुर्रत नहीं करेगा। उन पर लिखना तो दूर की बात है। जाहिर है लेखकों के समर्थन से हमारे राजा को नोबेल शांति पुरस्कार भी मिल जाए। इसके लिए लेखकों की लॉबिंग बहुत मायने रखती है। राजा ने कैबिनेट का फैसला सुनाया, ‘लेखक समाज का अहम प्राणी है। मैं विकास के लिए नए नारे की घोषण करता हूं, ‘पियो और जियो’, शराब एसेन्शियल कमोडिटी में शामिल होगी। राशन के साथ ही शराब की भी होम डिलिवरी होगी। हेल्पलाइन, टोल फ्री नंबरों के अलावा एक ‘लिकर एैप’ भी शुरू की जाएगी। ‘लिकर एैप’ के जरिए घर-घर शराब पहुंचाई जाएगी।’ लेखकों के सरदार ने राजा को किताबों का एक सेट उपहारस्वरूप भेंट किया। राजा को फूलों और नोटों की मनमोहक माला पहनाई गई। सरदार ने डैपुटेशन के सभी लेखकों को राजा पर पुष्प वर्षा करने का इशारा किया। राजा गदगद हुआ, ‘आज आप सब मेरे महल में ही रुको। काकेटल का इंतजाम है, फॉलोड बाय डिनर।’ लेखकों को पंख लग चुके थे। वे बिन पिये ही झूम रहे थे। उन्हें लगा वे पहली बार खुले आकाश में परिंदों की तरह उन्मुक्त होकर उड़ रहे हैं।