14 साल की उम्र में शहनाज की मंगनी हो गई

सौंदर्य के क्षेत्र में शहनाज हुसैन एक बड़ी शख्सियत हैं। सौंदर्य के भीतर उनके जीवन संघर्ष की एक लंबी गाथा है। हर किसी के लिए प्रेरणा का काम करने वाला उनका जीवन-वृत्त वास्तव में खुद को संवारने की यात्रा सरीखा भी है। शहनाज हुसैन की बेटी नीलोफर करीमबॉय ने अपनी मां को समर्पित करते हुए जो किताब ‘शहनाज हुसैन : एक खूबसूरत जिंदगी’ में लिखा है, उसे हम यहां शृंखलाबद्ध कर रहे हैं। पेश है पैंतीसवीं किस्त...

-गतांक से आगे...

जस्टिस बेग जबरदस्त पसोपेश में थे, एक तो वह हमेशा अपने जीवन में खुले विचारों के साथ जिए थे, इसलिए वह अपनी बेटी को उसकी पसंद का निकाह करने से नहीं रोक सकते थे, साथ ही वह उसके उस फैसले का साथ भी नहीं दे सकते थे, जो उसके उज्ज्वल भविष्य के बीच आ रहा था। आखिर में, वह फैसला शहनाज का ही था और भरे दिल से ही सही, उन्होंने अपनी बेगम से कहा कि वह हुसैन से अंगूठियां बदलने की बात कर लें। 14 साल की उम्र में शहनाज बेग की मंगनी हो गई, उनकी सिर्फ एक ही ख्वाहिश थी कि उस हसीन नौजवान की बेगम बनकर उम्रभर उसे आंखों में बसाए रखें।

मासूम प्यार

मम्मा को मंगनी का सबसे बड़ा फायदा आज भी याद है : ‘सोचो, दो साल तक मुझे कभी अपना होमवर्क खुद करने की जहमत नहीं उठानी पड़ी’, वह मुस्कुराती हैं, उन प्यार के दिनों को याद करते हुए। ‘वह हर सप्ताहांत आते और मेरे किताबों के ढेर में मसरूफ हो जाते। वह मेरे लिए गणित के सारे सवाल सॉल्व कर देते।’ जब भी नासिर बेग हाउस आते, उन्हें सबसे ऊपर का कमरा दे दिया जाता, जहां से वह गर्मियों में नीचे घर में चल रही दिन-रात की रस्में देख सकते थे। पूरा परिवार घर के पिछले बरामदे में साथ-साथ सोता था, चूंकि जस्टिस बेग का मानना था, इस तरह सब आठ घंटे शुद्ध ऑक्सीजन ले सकते थे। मच्छरदानी के साथ एक लाइन में पांच बिस्तर लगा दिए जाते थे, और एक टेबल फैन रातभर अच्छी हवा के लिए। हर बिस्तर के पास एक स्टूल पर पानी का जग और गिलास भी रखा होता था। एक रात नासिर ने उन टैंट की कतार देखी और सोचा कि वह रात को जाकर शहनाज को जगाएगा। उन्होंने एक गिलास पानी भरा और शहनाज की मच्छरदानी पर डालने से पहले अच्छी तरह निशाना साधा। ‘अल्लाह!’ एक तीखी आवाज के साथ अपनी चादर हटाते हुए सईदा बेगम अपने बिस्तर से बाहर निकलीं और चौंककर आसपास देखने लगीं। नासिर को तुरंत ही अहसास हो गया था कि उन्होंने गलती से अपनी होने वाली सास पर पानी डाल दिया, तो वह पलक झपकते ही ओझल हो गया। ‘यह पानी कहां से आया?’ जस्टिस बेग ने परेशान होते हुए कहा। पूरा परिवार अपने बिस्तरों से निकल आया था और वे सब ऊपर देख रहे थे। शहनाज बिना बादलों का साफ आसमान देखकर धीरे से मुस्कुरा रही थीं। सप्ताहांत हमेशा शहनाज के लिए रोमांचक रहते थे क्योंकि तब उन्हें नासिर से मिलने का मौका मिलता था, किताबों के ढेर के बीच, अपना पाठ याद करते हुए।