Tuesday, September 17, 2019 02:15 PM

19 लाख बांग्ला घुसपैठिए

घुसपैठियों का मुद्दा सिर्फ  असम तक ही सीमित नहीं है। जब असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) की प्रक्रिया शुरू हुई थी, तो सबसे पहले अरुणाचल प्रदेश ने भी यह मुद्दा उठाया था। फिर नगालैंड से आवाज उठी थी और उसके बाद मिजोरम, मेघालय ने भी उनके राज्यों में एनआरसी की मांग की थी। एक और पुराना संदर्भ याद दिला रहा हूं कि 1993 में दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले तत्कालीन भाजपा नेता मदन लाल खुराना ने यह मुद्दा उठाया था कि राष्ट्रीय राजधानी में तीन लाख अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं। उन्हें देश से बाहर करने की कार्रवाई की जानी चाहिए। चुनावों के बाद खुराना दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। अब दिवंगत हो चुके हैं और 2019 में दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने भी एनआरसी की मांग की है। पूर्वोत्तर में पहचान और नागरिकता संघ और भाजपा के पुराने, प्रिय मुद्दे रहे हैं, लेकिन इनके जरिए राजनीति और हिंदू-मुसलमान, अलगाव को ज्यादा हवा दी जाती रही है। अब एनआरसी की अंतिम सूची गृह मंत्रालय ने जारी की है, तो सर्वोच्च न्यायालय के दखल और निगरानी का योगदान ज्यादा है। फिर भी विसंगतियों के सवाल सामने आ रहे हैं। कोई मां सूची में है, तो बेटी बाहर है। कोई सेना का पूर्व अधिकारी ही सूची में नहीं है, लेकिन उसकी पत्नी सूची में है। कोई विधायक ही अवैध नागरिक मान लिया गया है। ऐसी गलतियां तब हैं, जब पूरी प्रक्रिया पर करीब 1288 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं और करीब 62,000 कर्मचारियों ने काम किया। अलबत्ता एनआरसी सूची के मुताबिक, तीन करोड़ 11 लाख 21 हजार से ज्यादा नागरिक वैध हैं और 19 लाख 6657 के नाम सूची से नदारद हैं। वे बांग्ला घुसपैठिए हैं, रोहिंग्या मुसलमान हैं या 1971 के बाद के शरणार्थी हैं अथवा उनके पास ऐसे वैध दस्तावेज नहीं हैं, जो उन्हें ‘भारतीय नागरिक’ सत्यापित कर सकें। बेशक एनआरसी अपने अंजाम तक भाजपा सरकारों के दौरान पहुंचा है, लेकिन इसकी शुरुआत 1951 की जनगणना के दौरान हुई। तब पहला एनआरसी बना। दरअसल असम भारत का ऐसा राज्य है, जहां 100 से ज्यादा जातियों के लोग बसे हैं। वे ज्यादातर बांग्ला और असमिया बोलते हैं। असम में औसतन 34 फीसदी आबादी मुस्लिम है। राज्य के 33 जिलों में से नौ जिलों में बीते चार दशकों में बांग्लादेशियों की घुसपैठ ज्यादा हुई है। 1985 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने आसू और कई अन्य क्षेत्रीय संगठनों के साथ ‘असम करार’ किया था। उसके मुताबिक, 25 मार्च 1971 को या उसके बाद आए विदेशियों को निष्कासित किया जाएगा। क्या एनआरसी की सूची के बाद कथित घुसपैठियों को देश के बाहर किया जाएगा? उन्हें हिरासत केंद्र में रखा जाएगा? उनकी नागरिकता और उससे जुड़ी सरकारी सुविधाओं को छीन लिया जाएगा? फिलहाल राज्य में करीब 1000 लोग ‘विदेशी नागरिक’ घोषित हैं। उनमें ज्यादातर बांग्ला बोलने वाले मुसलमान हैं। उन्हें 10 हिरासत केंद्रों में रखा गया है। लेकिन बुनियादी मुद्दा तो घुसपैठियों को निष्कासित करने का रहा है, क्योंकि गृह मंत्री अमित शाह और अन्य संघ-भाजपा के नेता असम को ‘दूसरा कश्मीर’ नहीं बनने देना चाहते। दरअसल आबादी के प्रतिशत के लिहाज से कश्मीर के बाद सबसे ज्यादा मुसलमान असम में ही रहते हैं। चूंकि सूची से बाहर रहे लोगों के पास फिलहाल विदेशी ट्रिब्यूनल का विकल्प है। वे उनके सामने पेश होकर अपना पक्ष रख सकते हैं। उसके बाद भी उच्च तथा सर्वोच्च न्यायालय तक जाने के विकल्प हैं। किसी को भी ‘घुसपैठिया’ साबित करना इतना आसान नहीं है। जब तक कोई व्यक्ति अंततः पराजित नहीं हो जाता, तब तक वह ‘भारतीय नागरिक’ है। असम सरकार में मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का मानना है कि इस सूची में तो बांग्लादेशी भी ‘नागरिक’ बना दिए गए हैं। मोदी सरकार में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू ने राज्यसभा में बताया था कि असम में करीब दो करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं। अब अधिकृत सूची में यह आंकड़ा 19 लाख 6657 पर अटक गया है। क्या इतने घुसपैठियों को देश से बाहर निकाला जा सकेगा? इस सवाल के साथ पश्चिम बंगाल, ओडिशा और हरियाणा सरीखे राज्यों में एनआरसी की मांग का मुद्दा भी बेहद संवेदनशील है। क्या वहां एनआरसी की प्रक्रिया संभव होगी? क्या इस गंभीर और नाजुक मुद्दे पर राजनीतिक सहमति भी संभव है? क्या देश के कुछ हिस्सों में गृहयुद्ध के आसार तो बनने नहीं लगेंगे?