Wednesday, September 18, 2019 05:01 PM

1965 का मंजर याद रखे पाकिस्तान

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक, बिलासपुर से हैं

 

8 सितंबर, 1965 के दिन पाक सेना ने अपने टैंक डिवीजन के कई किलोमीटर काफिले के साथ पंजाब के तरनतारन से लगते खेमकरण सेक्टर पर धावा बोल दिया। देश की उसी सहरद पर ‘चीमा’ गांव के पास भारतीय सेना ने 4 ग्रेनेडियर रेजिमेंट की एक कंपनी तैनात की थी, जिसके एंटी टैंक दस्ते की कियादत हवलदार अब्दुल हमीद कर रहे थे...

पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की सेना ने जब भी अपनी गलत व छल भरी मंशा से भारत की सरजमीं पर अपने नापाक कदम रखने की हिमाकत की, तभी भारतीय सेना के जाबाजों ने अपने पराक्रमी तेवरों से पाक की नामुराद सेना को माकूल मुंह तोड़ जवाब देकर उसकी हैसियत तथा औकात दिखाने में कोई गुरेज नहीं किया। ठीक 54 साल पहले सन् 1965 के सितंबर माह में पाकिस्तान के हुक्मरानों ने भारत पर हमले की मंसूबाबंदी को अंजाम दिया था। उस हमले में उसका एक लक्ष्य पंजाब का अमृतसर शहर भी था, जहां कब्जा करके उसकी योजना दिल्ली की तरफ बढ़ने की थी।

आखिर 8 सितंबर, 1965 के दिन पाक सेना ने अपने टैंक डिवीजन के कई किलोमीटर काफिले के साथ पंजाब के तरनतारन से लगते खेमकरण सेक्टर पर धावा बोल दिया। देश की उसी सहरद पर ‘चीमा’ गांव के पास भारतीय सेना ने 4 ग्रेनेडियर रेजिमेंट की एक कंपनी तैनात की थी, जिसके एंटी टैंक दस्ते की कियादत हवलदार अब्दुल हमीद कर रहे थे, जिन्होंने उन शक्तिशाली पाक पैटर्न टैंकों के घातक हमले से पीछे हटने के बजाय बहादुरी से उनका सामना करने का विकल्प चुना और उस पाक टैंक डिवीजन के हमले के खैर मकदम का शहीद आगाज अपनी जीप पर माउंटेड स्टीक मारक क्षमता वाली रिकॉयलेस गन से 7 पाकिस्तानी पैटर्न टैंकों को कब्रस्तान में तबदील करके किया था। ये ताकतवर पैटर्न टैंक उस समय अमरीका ने पाक को दिए थे।

अभेद्य माने जाने वाले उन पैटर्न टैंकों की भारत के खिलाफ आजमाइश पर पाक सैन्य पैरोकारों को बहुत घमंड था, लेकिन भारतीय सेना के शूरवीर अब्दुल हमीद ने मुस्तैद होकर अपने अचूक निशाने के प्रहारों से उन पाक टैंकों को नष्ट करके पाक हुकमरानों की गलतफहमी की ख्वाहिश को टैंकों के साथ खेमकरण में ही दफन कर दिया। खेमकरण के रणक्षेत्र में आग की लपटों में सिमटे अपने टैंकों के खौफनाक मंजर को देखकर पाक सेना इस कद्र खौफजदा हुई कि उसने बचे हुए पैटर्न टैंकों का रुख वापस पाक सरहद की तरफ मोड़कर वहां से भागना ही मुनासिब समझा। लेकिन दुर्भाग्यवश भागते पाक टैंकों का पीछा कर रहे उसी आक्रामक सैन्य अभियान के दौरान वीर अब्दुल हमीद को दुश्मन के गोले का शिकार होना पड़ा तथा 10 सितंबर 1965 के दिन वह जांबाज वीरगति को प्राप्त हुआ। मगर उससे पहले इस योद्धा ने अपने बुलंद हौसले व निडरता से इतने बड़े टैंकों के हमले को नाकाम करके पाक सेना की कमर तोड़ डाली थी। उस अदम्य साहस के आगे खेमकरण बार्डर से दिल्ली तक कब्जा करके वहां की मस्जिदों में नमाज अदा करने का ख्वाब लेकर निकली पाक तानाशाह अयूब खान तथा पाक जनरल मूसा खान की फौज के मंसूबे सहरद पर ही जमींदोज हो गए।

युद्ध में अब्दुल हमीद व उसके साथियों ने पाक सेना की पूरी रणनीति तबाह करके भारतीय सैन्य प्रशिक्षण तथा पराक्रम को श्रेष्ठ साबित कर दिया था। उस अद्भुत शूरवीरता के प्रदर्शन के लिए भारत सरकार ने अब्दुल हमीद को देश के सर्वोच्च सम्मान ‘परमवीर चक्र’ (मरणोपरांत) से अलंकृत किया था। वह प्रथम भारतीय सैनिक थे, जिनका नाम ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड’ में भी शामिल है। खेमकरण की तस्वीरें सामने आने के बाद अमरीका को विश्व भर में फजीहतों का ही सामना करना पड़ा था। ऐसा कोई युद्ध नहीं रहा जब पाकिस्तान ने कश्मीर को हड़पने की बिसात न बिछाई हो और ऐसा कोई सैन्य अभियान नहीं रहा, जिसमें वीरभूमि हिमाचल के सपूतांे ने अपने शौर्य का स्वर्णिम अध्याय न लिखा हो। 1965 के  आपरेशन से निपटने के लिए जम्मू-कश्मीर के पुंछ सेक्टर में भारतीय सेना की 3 डोगरा रेजिमेंट तैनात थी, इसी सैन्य मिशन के दौरान इस यौद्धा की शहादत हुई थी।

रणक्षेत्र में दुश्मन के समक्ष उच्चकोटि के युद्ध कौशल व सर्वस्व बलिदान के लिए भारत सरकार ने इन्हें ‘वीर चक्र’ मरोणापरांत से नवाजा था। इस जांबाज का संबंध बिलासपुर से था। 1965 के इस युद्ध में हिमाचल के 195 सैनिकों ने देशरक्षा में अपनी शहादत दी थी, जिन्में 31 शहीद सैनिकों का संबंध बिलासपुर से था। युद्ध में असाधारण वीरता के प्रदर्शन के लिए वीरभूमि के सैनिकों को सरकार ने एक महावीर चक्र, 11 वीर चक्र तथा सात सेना मेडलों से सम्मानित किया था। राज्य के लिए सम्मान की बात यह भी है कि इस युद्ध की ऐतिहासिक रणनीति का पूरा रोडमैप शिमला में तैयार हुआ था, जो उस समय सेना की पश्चिमी कमान का मुख्यालय था और वर्तमान में ‘आरट्रैक कमान’ का मुख्यालय है, जिसे अकसर यहां से शिफ्ट करने के समाचार भी छपते रहे हैं।

मगर ऐसी योजना बनाने वाले सियासी रहनुमाओं को एक बार पहाड़ के गौरवमयी इतिहास में झांक लेना चाहिए। युद्ध की पराजय के बाद पाक पैरोकारों को एहसास हुआ कि भारतीय सेना के मनोबल तथा तत्कालीन वजीरे-आजम लाल बहादुर शास्त्री के कद को छोटा आंकना उनकी भयंकर भूल थी। उस पराजय के सदमे से पाक हुकमरान आज तक नहीं उबर पा रहे हैं। लेकिन देश उस पराक्रम को भूल गया। अतः लाजिमी है कि राष्ट्र भारतीय सेना के 1965 के गुमनाम शहीदों को याद करे, जिन्होंने देश की अस्मिता के लिए अपना सर्वस्व बलिदान किया था। मुल्क उनके बलिदान का सदैव ऋणी रहेगा।