Monday, August 10, 2020 10:36 AM

सैन्य तमगों के बीच

हिमाचली युवा को आशा भरी निगाहों से देखने का मंजर, घर और प्रदेश के बाहर जब तसदीक होता है, तो राष्ट्रीय आंकड़े भी इस क्षमता को अंगीकार करते हैं। भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून की पासिंग आउट परेड के तमगों का हिसाब इस दृष्टि से भी होता है कि हिमाचली बच्चों का सैन्य सेवाओं के प्रति कितना रुझान है। राष्ट्रीय स्तर पर कुल 306 सैन्य अधिकारियों के बीच हिमाचल करीब छह प्रतिशत हिस्सा हासिल करते हुए अठारह बच्चों के तमगे निहार रहा है। यह उस प्रदेश की उपलब्धि ही मानी जाएगी जो देश की कुल आबादी में महज सत्तर लाख लोगों का समूह है और इस तरह यहां राष्ट्र की एक फीसदी से भी कहीं कम जनसंख्या रहती है। अठारह बच्चों की पारिवारिक व शैक्षणिक पृष्ठभूमि में हम शौर्य की जो तस्वीर देख रहे हैं, इसमें निजी प्रयास ही श्रेय ले सकते हैं, जबकि राज्य की ओर से सैन्य पृष्ठभूमि के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक कदम नहीं लिए गए। बेशक सुजानपुर का सैन्य स्कूल इस दिश में शिक्षा के आरोहण को सेनाओं से जोड़ता है, लेकिन इतना भर होने से रास्ता मुकम्मल नहीं होता। प्रदेश में डिफेंस स्टडीज पर केंद्रित उच्च शिक्षा का विराम महसूस किया जाता है। नित नए कालेजों को खोलते-खोलते शिक्षा जिस स्तर पर पहुंच गई है, वहां राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के विषय गौण हैं। ऐसे में करियर की तरफ रुझान बनाने के लिए अलग से आदर्श कालेजों का चयन आवश्यक हो जाता है। बच्चों के भीतर स्वाभाविक टेलेंट तथा क्षमता का निरूपण तभी मुकम्मल होता है, अगर इन्हें बचपन से ही उचित मार्गदर्शन उपलब्ध हो। बहुत सारे बच्चे मां-बाप की पृष्टभूमि से प्रभावित होकर करियर की संभावनाएं तलाशने के लिए अपनी दिशा तय कर पाते हैं, लेकिन सभी भाग्यशाली नहीं होते। सैन्य सेवाओं के प्रति एक आकर्षण तो सामान्य रूप से उस भर्ती पर टिका रहा है, जो गाहे-बगाहे शारीरिक क्षमता का मूल्यांकन करती है। ऐसे में हिमाचल को उस ट्रेंड को भी समझना होगा, जहां बच्चे अपने तौर पर संघर्ष कर रहे हैं या प्रदेश के बाहर अपनी तैयारी को उच्च मुकाम पर पहुंचाने के सफर पर निरंतर प्रयास कर रहे हैं। ये अठारह बच्चे भी अपनी जिद और मां-बाप के श्रेष्ठ मार्गदर्शन के कारण ही राष्ट्रीय फलक पर स्वाभिमान और शौर्य की पताका थाम रहे हैं। राज्य सरकार को सैन्य प्रतिष्ठानों की काबिलीयत तक अगर बच्चों का समर्थन करना है, तो इस उद्देश्य से प्रशिक्षण अकादमी तथा डिफेंस स्टडी कालेज स्थापित करने होंगे। इसके अलावा प्रदेश के पास पुलिस महकमे के तहत ढांचागत प्रशिक्षण की जो सुविधाएं उपलब्ध हैं, उनके तहत युवाओं के मकसद को पारंगत किया जा सकता है। प्रदेश के पुलिस मैदानों पर अगर युवाओं का प्रशिक्षण हो, तो सैन्य व अर्द्धसैन्य भर्तियों के अलावा कई तरह के सुरक्षाबलों में प्रवेश पाने में सहूलियत होगी। राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न प्रशासनिक, सैन्य व अन्य सेवाओं में हिमाचली युवाओं का मार्ग प्रशस्त करने के लिए जिला पुस्तकालयों में आमूल चूल परिवर्तन करने की जरूरत है। पुस्तकालय कक्ष को विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं के लिए आवश्यक अध्ययन सामग्री से सुसज्जित तथा अधोसंरचना प्रदान करनी होगी। हिमाचल की विडबंना भी यही है कि शिक्षा का प्रसार मानव संसाधन का विकास तथा युवाओं की क्षमता का उभार नहीं कर पा रहा है। नए स्कूल-कालेज खोलने के बजाय, कम से कम जिलास्तर पर युवाओं के करियर का मार्गदर्शन करने के लिए विशेष अकादमियों का संचालन तथा पुस्कालयों को समृद्ध किया जाए। खेलों के ढांचे को पुख्ता करते हुए पुलिस या खेल विभाग के तहत सैन्य सेवाओं या तत्संबंधी प्रवेश परीक्षाओं के लिए हर तरह का प्रशिक्षण दिया जाए। हिमाचल में स्थित रोजगार कार्यालयों को, अपनी भूमिका को बदलते परिप्रेक्ष्य में सक्षम करना होगा, जबकि प्रदेश में राष्ट्रीय स्तर की तमाम प्रवेश परीक्षाओं के लिए शिमला, धर्मशाला तथा मंडी में केंद्र विकसित करने होंगे, ताकि उम्मीदवारों को राज्य के बाहर भटकना न पड़े।