Wednesday, August 21, 2019 04:34 AM

370 पर कांग्रेस के भ्रम

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल ने संसद का रास्ता पार कर लिया है। लोकसभा में इसके समर्थन में 370 और विरोध में 70 वोट पड़े। पहली बार मोदी सरकार को किसी बिल पर सबसे ज्यादा 20 दलों का समर्थन हासिल हुआ। यह स्वाभाविक समीकरण था। अब राष्ट्रपति की मुहर के बाद इसका कानूनन लागू होना तय है। सर्वोच्च न्यायालय इस संवैधानिक परिवर्तन की समीक्षा करना चाहेगा अथवा नहीं, यह दीगर सवाल है, लेकिन कश्मीर में अनुच्छेद 370 की मौजूदगी अब अतीत का मुद्दा बन गया है। विडंबना यह है कि जिस कांग्रेस ने 370 के बीज बोए थे, वह आज भ्रम की स्थिति में है। 370 को लेकर कांग्रेस को विभाजित भी मान सकते हैं। इसका मूल्यांकन जरूरी है, क्योंकि कांग्रेस ने ही भारत का इतिहास लिखा है। चाहे उसे किसी भी भाव से स्वीकार करें, लेकिन यह बुनियादी सच है। हैरानी है कि आज लोकसभा में जो शख्स कांग्रेस संसदीय दल के नेता हैं, उन्हीं अधीर रंजन चौधरी ने आशंकित सवाल उठाया है कि क्या कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है? उन्होंने कश्मीर को संयुक्त राष्ट्र की निगरानी से जोड़ दिया। उनसे बार-बार सवाल किया गया कि क्या संयुक्त राष्ट्र कश्मीर की निगरानी करता रह सकता है? दरअसल यह पाकिस्तानी सोच की भाषा है। पाकिस्तान की संसद के साझा सत्र में वहां के वजीर-ए-आजम इमरान खान ने कहा है कि 370 को खत्म करना आरएसएस का एजेंडा है। हिंदू-मुसलमानों को बराबर का दर्जा नहीं दिया जा रहा। कश्मीर का यह विशेष दर्जा खत्म करने के बाद अब पुलवामा जैसे हमले हो सकते हैं। भारत-पाकिस्तान में जंग भी छिड़ सकती है और इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। यदि इमरान खान ऐसी भाषा बोल रहे हैं, तो उसकी बुनियादी जिम्मेदार भी कांग्रेस ही है, क्योंकि पाकिस्तान का कश्मीर पर द्विपक्षीय बातचीत का आधार ही छिन गया, जिसे कांग्रेस सरकारों ने बनाए रखा था और अब भी संयुक्त राष्ट्र के आलोक में कश्मीर का मूल्यांकन किया जा रहा है। सवाल तो यह होना चाहिए कि कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र तक कौन ले गया था? किसकी वजह से पाक अधिकृत कश्मीर एक अलग टुकड़ा हो गया, जिसकी लड़ाई भी मोदी सरकार ही लड़ेगी? दरअसल लोकसभा में बहस के दौरान कांग्रेस सांसद देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम से ही चिपके रहे और कुतर्कों का सैलाब बिखेरते रहे। नेहरू के अलावा कांग्रेस के पास दिखाने और कहने को कुछ भी नहीं है। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने यहां तक टिप्पणी की कि आज संसद में जो हो रहा है, वह संवैधानिक त्रासदी है। सवाल किया जा सकता है कि संवैधानिक क्या है? क्या अनुच्छेद 370 संवैधानिक था? इस प्रावधान पर कांग्रेस का आज रुख क्या है? क्या 370 ने कश्मीर घाटी में अलगाववाद और फिर आतंकवाद पैदा नहीं किए? क्या भारत राज्यों का संघ है या केंद्र शासित क्षेत्रों का संघ है? क्या कांग्रेस ने कभी राज्यों की सूची नहीं देखी कि 15वें स्थान पर किसका नाम है? कांग्रेस नेता अधीर रंजन से खुद सोनिया गांधी नाराज थीं। राहुल गांधी भी सदन में खामोश बैठे रहे, लेकिन बाहर आकर जरूर ट्वीट किया कि 370 पर जो हुआ है, वह ‘असंवैधानिक’ है, तो फिर संवैधानिक क्या है? यदि कांग्रेस ने 370 पर सरकारी रुख का विरोध किया है, तो कमोबेश पार्टी का रुख स्पष्ट होना चाहिए कि उसे कश्मीर में 370 क्यों चाहिए? कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया, पूर्व महासचिव जनार्दन द्विवेदी, मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा, पूर्व सांसद दीपेंद्र हुड्डा और रंजीता रंजन आदि की लंबी फेहरिस्त है, जिन कांग्रेसियों ने मोदी सरकार के निर्णय का समर्थन किया है। उन्हें 21वीं सदी में अनुच्छेद 370 की व्यवस्था नहीं चाहिए, जो बुनियादी तौर पर विभाजक साबित होती रही है। कांग्रेस के प्रवक्ता भी अपने संसदीय नेता अधीर रंजन के बयान से सहमत नहीं थे। दरअसल इस मुद्दे पर भी कांग्रेस की सोच आत्मघाती रही। वह भ्रम में रही कि इतिहास से छूट कर आज के संदर्भ में क्या रुख अख्तियार करे। नेहरूवादी नीतियों पर ढेरों सवाल किए जा सकते हैं, लेकिन उस अतीत से अलग होना ही बेहतर होगा। अब मोदीवादी युग की सोच अलग होनी चाहिए, जिसके दौर में पाकिस्तान का प्रधानमंत्री परमाणु बम की बात कर रहा है। बहरहाल 370 का अस्तित्व समाप्त हुआ। अब दो नए केंद्रशासित क्षेत्र वजूद में सामने आएंगे। लद्दाख के लोग बेहद खुश हैं, क्योंकि लगातार उपेक्षा से वे परेशान थे और वहां का विकास ठप हो गया था। अब पीओके और अक्साई चिन की चुनौतियां सामने हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में जो दावा किया है, उससे पाकिस्तान और चीन के कान खड़े हो गए होंगे कि ये भी मृत मुद्दे नहीं हैं।