Sunday, May 09, 2021 07:32 PM

अंधेर नगरी, चौपट राजा

सुरेश सेठ

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नगरी अंधेरी थी और राजा चौपट था, लेकिन फिर भी अगर आज भारतेंदु होते, तो उससे प्रेरित होकर ‘अंधेरी नगरी चौपट राजा’ न लिख पाते, क्योंकि यहां न टके सेर भाजी बिकती थी और न ही टके सेर खाजा। खाजा तो ख़ैर सरहदों पर नाकाबंदी के कारण खत्म हो गया। जब मन में आदर नहीं, प्यार नहीं, तो कैसे कहें उसे ‘मेरा सबसे प्यारा देश’? वहां बाहें फैला आलिंगनबद्ध होते छद्मवेशियों के हाथ खून से रंगे हैं और अंधेरी होती सरहदों पर दम तोड़ते वीर सैनिकों की हुंकार, फिर कैसे गाती रहती वह झूठा व्यापारिक गीत, ‘मेरा बसे प्यारा देश पाकिस्तान’। हम पच्चीस बरस तक यही गीत एकतरफा गाते रहे। उधर से समवेतस्वर तो क्या कभी कोई प्रतिध्वनि भी नहीं हुई। फिर एक हाथ से कब तक ताली बजती रहती? अब एकतरफा गीत बंद हो गया है। सरहदों पर पार न कर पाने वाले ट्रकों की कतारें लगी हैं। अब हम नहीं भेज रहे अपनी सब्ज़ी। वहां अब टके सेर कैसे बिकती? उन्होंने खाजा, चिलगोज़े, काजू बंद किए।

 अरे उन्हें खाकर कौन चिलगोज़ा होना चाहता है? आपको आपके चिलगोज़े मुबारिक। बाज़ार में नहीं बिकते, तो सेना कमांड की चिलगोजा सरकार बन के ही उनका काम चल जाता है। सरहद पार के अपने बंधुओं को वे गीदड़ भभकियां देने के काम आ जाती हैं यह सरकारें। फिर अपने खून से सने हाथों पर दस्ताने पहन कर संवाद शुरू करने की तमन्ना भी तो इन्हें करनी है। यह तमन्ना वाघा और अटारी भी पार नहीं कर पाती और कभी कारगिल हो जाता है और कभी पुलवामा। सुना है आजकल सरहद पार करके इधर से उधर जाने वाली सद्भावना बस भी खाली नज़र आती है। आखिर कब तक भावना शून्य खाली डिब्बों की सहायता से बनावटी मोहब्बत के जलतरंग बजाए जाते? अब जब बनावट की बात होने लगी, तो साहिब कहां-कहां भाईचारे की इस बारात में यह जलतरंग खुशी का मुखौटा धारण कर उदासी के गीत गाते नज़र नहीं आए। आप कहते हो, हमने सदियों से सांस्कृतिक सांझ रखने वाले सरहद के इधर-उधर रहते लोगों को भाईचारे के आदान-प्रदान का प़ैगाम देना है।

 आप आज़ादी की हर वर्षगांठ पर प्यार और मोहब्बत की मोमबत्तियां जला कर सरहद पार के अंधेरे को उजाले का संदेश देने गए। लेकिन जवाब में क्या मिला, आतंकी वेश बना चोरों की तरह घुसे हत्यारों की कृपा से हमारे रणबांकुरों की क्षत-विक्षत लाशें। हमारी मोमबत्तियों की रौशनी में प्यारी भरी दुनिया बसाने का आग्रह था और तुमने जवाब में हमें भेंट कर दिए ऐसे मौन और उदास मोमबत्तियों के जुलूस जो अपने बेटों, भाइयों और पतियों की जुदाई पर आठ-आठ आंसू रोते हैं। तुमने कहा, अब हमारा देश एक नया देश हो गया। यह देश गिड़गिड़ाता नहीं, इसे जवाब देना आ गया है। अरे जवाब तो वही है, आस्तीन के सांप की फूंकार जैसा पुराना। फिर इसकी केंचुल बदल कर क्यों अपने लाल मुंहे अंग्रेज़ों के पास फरियाद करने जा रहे हो, कि ‘देखो हुज़ूर यह तो हमारा पानी भी बंद करने लगे।’ अरे अज़ीजो, यह लालमुंहे अब किसी के आका नहीं, फिर तुमने तो अपने आका कब के बदल लिए। यह नए आका हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा हमारे साथ लगाते हैं, कवच कुंडल और ढाल तुम्हारे बनते हैं।