आनंद की धारा

हम बाहर की कठिनाई से बचने के लिए जटिल हो जाएं अथवा बाहर की कठिनाई को झेलने की तैयारी कर लें। इस दशा में हम भीतर से विनम्र, सरल और सहज हो जाते हैं और भीतर की विनम्रता और सहजता की शुद्धि से असल आनंद की धारा बहने लगती है। क्योंकि संतो की सबसे बड़ी तपस्या विनम्रता और सहजता ही है और कोई अन्य कर्मकांड तपस्या नहीं है, न सिर के बल खड़ा होना तपस्या है, न धूप में या पानी में खड़ा होना तपस्या है, यह तो सब कर्मकांड है, इसका कोई बहुत बड़ा मूल्य नहीं है, जैसा कि वर्णन किया गया है। विन्रमता, सहजता और सरलता में शुरू में कठिनाई तो जरूर होती है, परंतु थोड़े ही दिनों में सब कठिनाइयां दूर हो जाती हैं। फिर सद्गुरु की कृपा से मनुष्य कठिनाइयों से ऊपर उठ जाता है और मजे की बात यह है कि विन्रमता और सहजता में झेली हुई कठिनाई आत्मिक आनंद देती है और जटिलता में आया हुआ सुख भी पलभर में दुख बन जाता है। क्योंकि जटिलता के साथ पहले सुविधा होती है फिर बाद में असुविधा होती है, जबकि विन्रमता और सहजता के साथ हमें पहले  कठिनाई मालूम होती है और बाद में हमारे जीवन में आनंद की धारा बहने लगती है। अतः महात्माओं का मत है कि बाहर की सभी परिक्रियाओं से मुक्त हो जाओ, क्योंकि स्वयं में विन्रमता और सहजता की भावनाएं छिपी होती हैं। अब विन्रमता में कर्म भाव चला जाता है परंतु कर्म परमात्मा को समर्पित होकर पूरी गति से प्रवाहित होता रहता है। जैसे नदी बहती है तो उस कार्य का कोई अहंकार नहीं होता, हवाएं चलती हैं, परंतु उन्हें कोई अहंकार नहीं होता। इसी प्रकार धरती के साथ कैसा भी व्यवहार करें, धरती सब सहन कर लेती है, यह कुछ नहीं करती अपितु शांत रहती है क्योंकि विनम्रता, सहजता और धैर्य धरती के स्वाभाविक गुण है। धरती को महामाता का दर्जा दिया जाता है, क्योंकि यह मां से भी बढ़कर सभी को अपनी गोद में बिना किसी भेदभाव के संभाले हुए है। अतः मनुष्य में विन्रमता, सहजता और धैर्य का परम गुण कायम करने के लिए तथा सदा धैर्यवान बना रहने के लिए इसके शरीर को धरती का तत्त्व लगाया है। अब ये परमगुण पूर्ण सद्गुरु ही प्रदान कर सकता है और कोई साधन नहीं। ठीक ऐसे ही विन्रमता व सहजता से भरा हुआ और अहंकार से रहित जीवन ही एक सफल जीवन होता है, क्योंकि इस अवस्था में कर्त्तापन का भाव मन में संगृहीत नहीं होता है। विन्रमता और सहजता से भरा हुआ चित्त और निरविचार चित्त से जो गीत निकलते हैं, वे उसके नहीं अपितु परमात्मा के होते हैं और वह चित्त उस बांस की पौगरी की तरह होता है, जिसमें से स्वर तो निकलते है परंतु वह स्वर उसके अपने नहीं होते। ऐसे ही चित्त वही बोलेगा जो उसे परमात्मा बुलवाता है, वही करेगा जो परमात्मा उससे करवाता है अर्थात उसके और परमात्मा के बीच जो मैं के नाम की दीवार है वह टूट जाएगी।

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