आदमी कितने टके का : निर्मल असो, स्वतंत्र लेखक

निर्मल असो

स्वतंत्र लेखक

हम जिंदगी भर खुद को तोलते हैं, टटोलते नहीं और यही वजह है कि हर कोई अपनी नहीं, दूसरे की औकात बताने में माहिर साबित होना चाहता है। आश्चर्य तो यह कि कोरोना काल में भी आदमी-आदमी को टकों में देख रहा है। जिसके पास टके ज्यादा हैं, वह कोरोना खतरों से दूर पर्दों के पीछे है वरना जिंदगी तो जरूरत है, इसलिए बिना मास्क भी लोग बता या बतिया रहे हैं। जो कल तक टिक टॉक पर टके बटोर रहे थे, वे आज दो टके के हो गए। दरअसल भारत सरकार ने भी ठान लिया है कि चीन को दो टके का बना दिया जाए, लिहाजा उसके 59 ऐप हटा दिए। खैर इस कोशिश में भाजपा की हो चुकी सोनाली फोगाट सबसे पहले दो टके की हो गई, वरना पार्टी में आते ही उसे तो चांटे मारने की औकात हासिल रही है। कम से कम हमारे आसपास या खुद हमारे भीतर भी अब औकात यूं ही आती जाती रहती है, बल्कि मिल गई तो औकात, वरना फोगाट। कभी-कभी देश की परिस्थितियों में औकात फंस जाती है या जब कभी बाबा रामदेव की दवाई पर शक हो जाए, तो मालूम हो जाता है कि वास्तव में दो टके के लोग क्यों भारत में रह गए। ये सारे दो टके के लोग या तो विपक्ष में हैं या वे सभी हैं जो समझते हैं कि आजादी के बाद देश बदल गया। देश अगर बदलता तो ले-देकर हमारे पास चर्चा का विषय नेहरू के आसपास ही क्यों बचता। दरअसल देश की बहस में दो टके के लोगों में इजाफा जरूरी चाहिए, इसलिए हम हमेशा गरीबी की चर्चा करेंगे या गरीबी के नाम पर कुछ न कुछ करेंगे। ये आम भारतीय हैं जिनके कारण देश काम करता है या यूं कहें कि देश भी दो टके के लोगों के लिए ही सारे इंतजाम करता है। कहने की जरूरत नहीं, खुद को देश के नक्शे पर उतार कर देखें कि हमारी औकात कितने टके की है। जरा सोचिए हमारे ऊपर कितनी सबसिडी चढ़ी है। क्या हम ‘औलाद’ बनकर पैदा हुए या पैदा होते ही जो प्रश्न बने, उनका उत्तर ढूंढते अब देश से पूछ रहे हैं कि वह हमारे होने का उत्तर दे। पहले कांग्रेस से पूछते थे और अब सीधे प्रधानमंत्री की मन की बात से पूछ रहे हैं। अगर दम होता तो प्रश्नों से पहले किसी नेता, अभिनेता या अंबानी के घर पैदा नहीं होते। दो टके के न होने का अर्थ है कि आप तैमूर होते। किसी सैफ अली और करीना कपूर की औलाद होते, तो डायपर के विज्ञापन में ही मां-बाप को डेढ़ करोड़ कमा के देते। हम केवल एक प्रश्न हैं और यह भी मात्र दो टके का, लाख टके का नहीं।

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