Monday, October 18, 2021 04:00 PM

निजी हाथों में एयरपोर्ट

हवाई अड्डों पर सवार हिमाचल की राजनीति के लिए इमरजेंसी लैंडिंग जैसी स्थिति इसलिए पैदा हो रही है, क्योंकि प्रदेश के सबसे सक्षम और कार्यशील कांगड़ा एयरपोर्ट की बोली लगने जा रही है। देश के तेरह छोटे-बड़े हवाई अड्डों के निजीकरण की फांस में कांगड़ा एयरपोर्ट अब अपने पंख केवल निवेशक की इच्छा से ही खोल पाएगा यानी अब तक सर्वेक्षणों की खुराक पर इसके विस्तार की जो भी मुनादी हुई, उसे नए सिरे से पीपीपी मोड के तहत खरीददार की जरूरत रहेगी। ऐसा नहीं कि निजीकरण की परिपाटी में एयरपोर्ट की संभावनाएं कम हो जाएंगी, बल्कि आज के हालात में ऐसी सूचनाएं ही राष्ट्रीय योजना है यानी भविष्य की मिलकीयत में निजी क्षेत्र ही सफलता का परिचायक है। कुछ बड़े एयरपोर्ट के साथ कलस्टर में छोटे हवाई अड्डे जोड़कर इन्हें निजी हाथों के सुपुर्द करने की योजना पुरानी है। पहले कोच्चि एयरपोर्ट का निजीकरण 1999 में शुरू हुआ और इसके साथ मेक इन इंडिया के डिजाइन में दिल्ली-मुंबई हवाई अड्डों ने अपनी संभावनाओं और क्षमता का विस्तार किया। अडानी गु्रप ने अहमदाबाद, जयपुर, लखनऊ, तिरुवनंतपुरम, मंगलुरु और गुवाहटी जैसे हवाई अड्डों को हासिल करके नई व्यवस्था में काम करना शुरू किया है। यह दीगर है कि केरल सरकार ने तिरुवनंतपुरम हवाई अड्डे को लीज पर देने का विरोध किया है।

 अब भुवनेश्वर, वाराणसी, अमृतसर, रायपुर, इंदौर व त्रिची जैसे बड़े हवाई अड्डों के साथ सात छोटे हवाई अड्डे जोड़ कर कुल 13 एयरपोर्ट लीज पर जा रहे हैं। इनमें से हिमाचल का कांगड़ा एयरपोर्ट अब अमृतसर के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के साथ जुड़कर निजी निवेश की राहें ताक रहा है। इस फैसले के कई मायने व आधार हैं, जबकि दूसरी ओर राष्ट्रीय हवाई सेवाओं के नए मानचित्र पर अंकित होने का यह एक अवसर भी है। देश में हर तरह की हवाई पट्टियों की संख्या 449 आंकी गई है, जिनमें से एयरपोर्ट अथारिटी ऑफ इंडिया के अधीन 126 हवाई अड्डे आते हैं। देश में 13 अंतरराष्ट्रीय, 85 घरेलू और सैन्य पट्टियों मेें से 28 नागरिक उड्डयन सुविधाओं को भी पूरा करते हैं। इसी मानचित्र को सुदृढ़, सक्षम और विस्तृत आकार देने की रूपरेखा वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण पेश कर चुकी हंै और केंद्र सरकार 2024 तक 3700 करोड़ एयरपोर्ट पर निवेश करना चाहती है। ऐसे में जबकि प्रदेश का सबसे कामयाब व कार्यशील एयरपोर्ट लीज पर जा रहा है, तो अन्य हवाई अड्डों समेत प्रस्तावित मंडी एयरपोर्ट का भविष्य क्या होगा। मार्च 2020 के दस्तावेज बताते हैं कि अमृतसर एयरपोर्ट मात्र 92 लाख के लाभ में था, जबकि कांगड़ा हवाई अड्डे का घाटा 9.72 करोड़ तक था।

 बावजूद इसके राष्ट्रीय मूल्यांकन में कांगड़ा हवाई अड्डे की बोली इसे भविष्य के क्षेत्रीय या ग्रीन फील्ड एयरपोर्ट की संभावना से जोड़ती है। देश अब तक दो दर्जन एयरपोर्ट को लीज पर देकर हवाई यात्राओं की परिपाटी, कुशल संचालन की पद्धति और पर्यटन की हैसियत में हवाई अड्डों का विस्तार देख रही है। निजी क्षेत्र में जाने से क्षमता विकास, अतिरिक्त रन वे, टर्मिनल और सर्किट, डेस्टिनेशन व कांवेंशन टूरिज्म को नई दिशा मिलेगी। उदाहरण के लिए वाराणसी-कुशीनगर-गया की हवाई पट्टियों का निजीकरण बौद्धसर्किट की कामयाबी का नया अध्याय लिख सकता है। इसी तरह कांगड़ा-अमृतसर-जयपुर हवाई अड्डों की निजी भूमिका में पर्यटन के कई सर्किट विकसित होने की संभावना को नई ऊर्जा मिल सकती है। निजीकरण की ओर बढ़ते कांगड़ा एयरपोर्ट का नजरिया अब वैश्विक प्रतिस्पर्धा के आंगन में कैसे महकता है, लेकिन इस फैसले से हिमाचल की तमाम हवाई पट्टियों के अरमान बदलेंगे। यानी जिस निवेश की खोज में मंडी हवाई पट्टी की प्रस्तावना हुई है, उसके ऊपर कोई निवेशक मोहित होगा या जो अमृतसर के अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के साथ-साथ धर्मशाला की अंतरराष्ट्रीय संभावना को जोड़ेगा, वह अधिक मेहरबान होगा। मसला हवाई अड्डे के विस्तार को नया आयाम देने का है, तो राष्ट्रीय हवाई अड्डों की अब निजी फेहरिस्त ही कारगर होगी और इस तरह कांगड़ा एयरपोर्ट के दिन बहुरेंगे।