Sunday, July 25, 2021 08:55 AM

जन-विरोधी फैसला

पंजाब सरकार ने जिस तरह कोरोना वायरस के टीके की खुराकें निजी और कॉरपोरेट अस्पतालों को बेचीं, वह उदाहरण है कि हमारी चुनी सरकारें और उनके मातहत नौकरशाह किस तरह काम करते हैं? उनके मानस में आम आदमी की बजाय पूंजीवाद मौजूद रहता है, क्योंकि कालाबाज़ारी और मुनाफाखोरी पूंजीवाद के ही हिस्से हैं। सरकारों के सरोकार पूंजीवादी नहीं होने चाहिए। सरकार होने के नाते सार्वजनिक कोष भी सरकार के ही पंजों और विशेषाधिकारों में जकड़ा रहता है। सार्वजनिक कोष का निर्माण आम आदमी और करदाता ही करते हैं। कोष की असीमित राशि बुनियादी तौर पर आम आदमी की जेब से ही वसूली जाती है-आयकर, अन्य कर, उपकर और सामाजिक राष्ट्रवाद के नाम पर अधिभारों के जरिए। पंजाब सरकार ने भारत बॉयोटैक से बीती 27 मई को ‘कोवैक्सीन’ की 1.14 लाख खुराकें 3.20 करोड़ रुपए में खरीदीं। जाहिर है कि भुगतान सार्वजनिक कोष, अर्थात सरकारी खजाने, से किया गया होगा। यदि ये खुराकें गरीब, पिछड़े, अनपढ़, ग्रामीण आम आदमी को दी जातीं और उन्हें कोरोना महामारी के खिलाफ  सुरक्षा-कवच नसीब होता, तो उसे समाजवाद और मानवता की एक मिसाल माना जा सकता था, लेकिन पंजाब सरकार ने 42,000 खुराकें निजी और पंचतारा अस्पतालों को, 1060 रुपए प्रति खुराक के हिसाब से, बेच दीं। यही नहीं, उन्हें परोक्ष अनुमति भी दी गई कि वे एक खुराक की कीमत 1560 रुपए वसूल सकते हैं। किसी अस्पताल ने उससे भी ज्यादा जेब काटी होगी!

 इस तरह 8.48 करोड़ रुपए में टीके की खुराकें बेचकर पंजाब सरकार ने 5.28 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया। बेशक वह राशि भी सार्वजनिक कोष में ही गई होगी! सवाल यह है कि क्या मुनाफाखोरी भी सरकारों का जनादेश और संवैधानिक दायित्व होती है? सरकारें दुकानदारी या उद्योग-धंधों की तरह चलाई जाएंगी अथवा औसत नागरिक के चौतरफा कल्याण के लिए...? पंजाब सरकार में खुराकें बेचने का फैसला किसी का भी हो, लेकिन सामूहिक दायित्व के मद्देनजर मुख्यमंत्री समेत पूरी कैबिनेट जिम्मेदार है। मुख्य सचिव खुद ऐसा फैसला नहीं ले सकते, जब तक मुख्यमंत्री ने आदेश न दिया हो। कोरोना की दूसरी लहर में संक्रमण और मौत के लिहाज से पंजाब पहले 2-4 राज्यों की श्रेणी में रहा है। फिलहाल वहां की मृत्यु-दर 2.5 फीसदी से भी अधिक है, जो राष्ट्रीय औसत 1.15 फीसदी से काफी ज्यादा है। ऐसे राज्य में कोरोना टीके की खुराक का महत्व किसी ‘संजीवनी’ से कमतर नहीं आंका जा सकता। पंजाब सरकार को टीकों की यथासंभव आपूर्ति भारत सरकार करती रही है और वह भी निःशुल्क...! यह राष्ट्रीय टीकाकरण की नीति है और सभी राज्यों को उनके कोटे के अनुसार टीके दिए जाते रहे हैं। कम-ज्यादा हो सकते हैं, क्योंकि देश में टीकों का उत्पादन और उपलब्धता सीमित है।

 इस माह से सुधार संभव है। चूंकि टीकाकरण का विकेंद्रीकरण किया गया था, लिहाजा राज्य सरकारों को कंपनियों से सीधा ही टीके खरीदने की नीति भी तय की गई थी। लेकिन सरकारें निजी अस्पतालों को ही खुराकें बेचने लगेंगी, ऐसी नीति कभी भी तय नहीं की गई। अलबत्ता अस्पतालों को भी कंपनियों से सीधा खरीदने को अधिकृत किया गया था। अब बेशक खुराकें बेचने का फैसला वापस ले लिया गया है और शेष खुराकें भी वापस लेने का दावा किया जा रहा है, लेकिन ऐसा करके भी पंजाब सरकार दोषमुक्त नहीं हो सकती। उसकी स्थिति सवालिया बनी रहेगी कि उसने टीके बेचने का निर्णय क्यों लिया? सरकार का कुकर्म और चोरा-चोटी खत्म नहीं हो सकते। बेशक इसे घोटाले की परिभाषा में न रखा जाए, लेकिन पंजाब सरकार घोटाले की दहलीज़ पर जरूर खड़ी है। कोरोना टीका मिलना पंजाब के औसत नागरिक का अधिकार है। राज्य में किसान, मज़दूर और दलितों की आबादी ही सर्वाधिक है। वे कमज़ोर तबके हैं। निजी और महंगे अस्पताल ‘अमीरों’ के लिए हैं। ‘अमीर’ और ‘धन्नासेठ’ ही पूंजीवाद की बुनियादी इकाइयां हैं। वे कहीं भी और किसी भी कीमत पर कोविड का टीका लगवा सकते हैं। अस्पतालों का अपना कोटा है। पंजाब सरकार ने गरीबों और आम आदमी का हिस्सा बेचकर और मुनाफाखोरी कर गरीबों पर ही ठीकरा फोड़ा है। इस असामाजिक कृत्य के लिए सरकार को किस तरह और क्यों माफ  किया जाना चाहिए? यह बड़ा सवाल पंजाब की जनता के बीच धधकता रहेगा। राजनीति भी होगी, तो कोई क्या कर सकता है? कठघरे में एक बार फिर कांग्रेस ही है।