Saturday, January 23, 2021 04:18 PM

अनुचित कार्य

कई बार मनुष्य अपने अनुचित कार्यों और आदतों के संबंध में दुखी भी होता है और सोचता है कि उन्हें छोड़ दूं। अवांछनीय अभ्यासों की प्रतिक्रिया उसने देखी-सुनी भी होती है। परामर्श उपदेश भी उसी प्रकार के मिलते रहते हैं, जिनमें सुधारने-संभालने के लिए कहा जाता है। सुनने में वे परामर्श सारगर्भित भी लगते हैं। किंतु जब छोड़ने की बात आती है, तो मन मुकर जाता है अभ्यस्त ढर्रे को छोड़ने के लिए सहमत नहीं होता है। नशेबाजों में यही प्रक्रिया आए दिन चरितार्थ होते देखी जाती है। आर्थिक तंगी, बदनामी, शरीर की बर्बादी परिवार में मनोमालिन्य जैसी हानियां प्रत्यक्ष रहती हैं। उनका अनुभव भी होता है छोड़ने को जी भी करता है, पर जब तलब लगती है, तब सब सोचा-समझा बेकार हो जाता है। आदत उभर आती है और अपना काम करने लगती है।

 बार-बार सुधरने की बात सोचने और समय आने पर उसे न कर पाने से मनोबल टूटता है। बार-बार टूटने पर वह इतना दुर्बल हो जाता है कि यह विश्वास ही नहीं जमता कि उनका सुधार हो सकता है। कल्पना करने लगते हैं कि जिंदगी ऐसे ही बीतेगी। आदतों से किसी भी प्रकार छुटकारा न मिल सकेगा। आश्चर्य की बात यह है कि मनुष्य अपने मन का स्वामी है। शरीर पर भी उसका अपना अधिकार है। सामान्य जीवन में वह अपनी अभिरुचि के अनुरूप सोचता है और आवश्यकतानुसार कार्य करता है। यह स्वाभाविक भी है और इसी विधा को चरितार्थ होते हुए भी देखा जाता है। फिर दुष्प्रवृत्तियों के संबंध में ही ऐसी क्या बात है, जिसके कारण वे चाहते हुए भी नहीं छूटती? प्रयत्न करने पर भी भूत की तरह सिर पर लदी रहती है। अंधविश्वास कुप्रचलन इसी आधार पर अपनी जड़ जमाए हुए हैं।

अनेक कुरीतियां ऐसी हैं, जिन्हें बुद्धि विवेक और तर्क के आधार पर हर कोई अस्वीकार ही करता है, किंतु जब करने का समय आता है तो पुराने ढर्रे पर चल पड़ते हैं। खर्चीली शादियों के संबंध में यही बात आमतौर से देखी गई है। दहेज प्रदर्शन और प्रचलित रीति-रिवाजों का जंजाल सभी को कष्टकारक, असुविधाजनक खर्चीला मूर्खतापूर्ण होने के कारण विचारशीलता उसके विरुद्ध ही रहती है, इतने पर भी समय आने पर पुराना ढर्रा ही हावी हो जाता है और वही करना पड़ता है, जिसे न करने की बात अनेकों बार सोची थी। ऊंचा उठने के संबंध में तो और भी अधिक अड़चन है। महापुरुषों के कुछ अपने गुण, कर्म और स्वभाव ही ऐसे होते हैं, जो महत्त्वपूर्ण लोकोपयोगी कार्यों में लगते हैं अवरोधों से जूझते हुए लक्ष्य तक पहुंचने का साहस प्रदान करते हैं। उन्हें अनुकरणीय और अभिनंदनीय माना जाता है। उनकी उपलब्धियों प्रशंसा, प्रतिष्ठा को देखकर अनेकों का मन जलता है कि हमें भी यह सुयोग मिला होता, तो कितना अच्छा होता।

 इस दिशा में वे सोचते तो बहुत कुछ हैं, पर बन पड़े ऐसा कुछ कर नहीं पाते। इच्छा-इच्छा ही बनी रहती है। न आदतें बदल पाना बन पड़ता है और न महानता के राजमार्ग पर कदम बढ़ाते हुए चल सकना संभव होता है। सोचते, मन मारते ही जिंदगी बीत जाती है। मनुष्यों में से कम ही ऐसे हैं, जो साहस करके अपनी पतनोन्मुखी प्रवृत्तियों को रोक सकें और असंतोषजनक बदनाम जीवन जीने से बच सकें। वर्तमान दौर में मनुष्य एक-दूसरे से आगे निकलने के चक्कर में सब कुछ भूल जाता है। फिर चाहे इसमें उसे नुकसान ही क्यों न उठाना पडे़। इसलिए किसी भी कार्य को करने से पहले उसके परिणाम के विषय में जरूर सोचें।

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