Tuesday, June 15, 2021 12:21 PM

सेना और कोविड प्रबंधन

महामारी के इस आपात दौर में कम से कम इतना तो किया ही जा सकता है कि तमाम निजी अस्पतालों को ट्रस्ट के हवाले कर दिया जाए, जो मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि लोक-कल्याण की कर्त्तव्य भावना से समाज की सेवा करेंगे। आगे चलकर शिक्षा को भी इसी तरह निजी हाथों से मुक्त कराने की ज़रूरत है। इसी से गांधी की संकल्पना का सर्वोदय होगा...

कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर से भारत जूझ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दो महीने की अवधि में इसमें तकरीबन 24 गुना की बढ़ोतरी हुई है। जाहिर है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर इस भयावह स्थिति का भार पड़ना ही था। अप्रैल की शुरुआत में ही यह समाचार आने लगे थे कि अस्पतालों में जगह नहीं मिल पा रही है। ज़्यादा पैसे देकर या रसूख का इस्तेमाल करके जगह मिली भी तो रेमडिसिवर जैसी प्राणरक्षक दवा और ऑक्सीजन सिलेंडर नहीं मिल रहे हैं। फिर खबरें आने लगीं कि दवाओं और सिलेंडरों की कालाबाज़ारी हो रही है। आभासी दुनिया में ऐसे कई वीडियो प्रसारित होने लगे जो किन्हीं अस्पतालों के अनाप-शनाप बिलों का कच्चा चिट्ठा खोलते नज़र आ रहे थे। शवों को दफनाने या अग्नि-संस्कार करने की प्रक्रिया में मुनाफाखोरी और कालाबाज़ारी की चर्चाएं भी आम हैं। कहीं शव-वाहन के चालकों-संचालकों द्वारा हज़ारों रुपयों की मांग की जा रही है, कहीं लकड़ी के दाम अचानक आसमान छूने लगे हैं तो कहीं कब्र खोदने वाले मुंहमांगा मेहनताना मांग रहे हैं। कुल मिलाकर लोग त्रस्त हैं कि उन्हें इस महामारी में बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही और हर चीज़ महंगे दामों पर खरीदनी पड़ रही है। कोरोना के इलाज या मृतकों की अन्त्यविधि में मुनाफाखोरी करना स्वाभाविक रूप से हर विवेकवान व संवेदनशील व्यक्ति को अनुचित लगेगा। सरकार से दखल देने, मुनाफाखोरी को नियंत्रित करने और आमजन के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने की मांग की जा रही है। लेकिन भारत का पढ़ा-लिखा मध्यम वर्ग वाकई चाहता है कि सरकार इस बाज़ार को नियंत्रित करे? इसका जवाब आसान नहीं है। बाज़ार वह स्थान है जो हमें वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय करने का अवसर प्रदान कराता है। किन्हीं दो सेवाओं या वस्तुओं के विनिमय के लिए यह ज़रूरी है कि उनका मूल्य निर्धारित हो ताकि विनिमय पारदर्शी, तुलनीय और न्यायपूर्ण हो सके। सवाल उठता है कि किसी सेवा या वस्तु का मूल्य कैसे निर्धारित किया जाए? सुप्रसिद्ध किताब ‘वेल्थ ऑफ  दि नेशन्स’के पांचवें अध्याय में अर्थशास्त्री एडम स्मिथ कहते हैं कि किसी वस्तु या सेवा में लगा श्रम ही उसका मूल्य निर्धारित करता है। लगभग यही बात कार्ल मार्क्स अपने ग्रंथ ‘दास कैपिटल’ में स्वीकार करते हैं, हालांकि वे श्रम को भी ‘पण्य वस्तु’ के रूप में देखते हैं, जो खरीदी और बेची जाती है। पूंजीवाद के पितामह एडम स्मिथ और साम्यवाद के प्रणेता कार्ल मार्क्स के बीच जो बुनियादी भेद है, वो श्रम के मूल्य को लेकर है। मार्क्स का कहना है कि पूंजीपति श्रमिक को उसके समुचित श्रममूल्य से कहीं कम का मेहनताना देता है और इस तरह मुनाफे के रूप में पैसा बनाता है। उनकी नज़र में यही ‘शोषण’ है और इसी से पूंजी की उत्तरोत्तर बढ़ोतरी होती रहती है।

एडम स्मिथ कहते हैं कि बाज़ार को अनियंत्रित रखा जाना चाहिए ताकि साहसी व्यक्ति को उद्यम लगाने का मौका मिले, उत्पन्न माल को प्रतिस्पर्धी मूल्य पर बेचने का मौका मिले। इस तरह उद्यमी और उपभोक्ता, दोनों को ही लाभ होगा। इसके विपरीत मार्क्स कहते हैं कि मुक्त बाज़ार श्रमिक का शोषण करते हुए अधिकाधिक मुनाफा कमाते जाएगा। परिणामस्वरूप पूंजी में बेतहाशा बढ़ोतरी होगी। बड़ी पूंजी बाज़ार में एकाधिकार स्थापित करेगी और फिर ग्राहक मनमाने दाम पर वस्तुओं व सेवाओं को खरीदने के लिए बाध्य होगा। इसलिए उत्पादन के साधनों पर सर्वहारा द्वारा शासित राज्य का नियंत्रण होना अनिवार्य है। श्रमिक के मूल्य, यानी पारिश्रमिक का मूल्यांकन किस आधार पर किया जाए, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। कुछ लोग कहेंगे कि जिंदा रहने के लिए जितनी कैलोरी खुराक की ज़रूरत है, उसके बाज़ार मूल्य के हिसाब से पारिश्रमिक मिलना चाहिए। कुछ लोग उत्पादन प्रक्रिया में योगदान के महत्त्व और कुछ लोग कौशल व शिक्षा का स्तर आदि को आधार बनाने की बात कहेंगे। लेकिन इन सबके जवाबों से यह स्पष्ट नहीं होता कि किसी महाविद्यालय के चपरासी और प्राध्यापक या किसी कारखाने के मज़दूर और मैनेजर की तनख्वाह में जो विशाल भेद है, वह किस पैमाने से तय होता है? प्राकृतिक संसाधनों के मूल्य पर भी अर्थशास्त्र मौन है। पानी, हवा, कोयला आदि का मूल्य आप कितना आंकेंगे और वह मूल्य आप किसे चुकाएंगे? मूल्य निर्धारण का कोई मानक सिद्धांत न होने की इस समस्या का व्यावहारिक निराकरण मूल्य को मांग और पूर्ति के साथ जोड़कर किया जाता है। मांग ज़्यादा और पूर्ति कम हो तो मूल्य बढ़ेगा। इसके विपरीत मांग कम और पूर्ति ज़्यादा हो तो मूल्य घटेगा। तमाम आर्थिक गतिविधियां इसी व्यवहार पर चलती हैं। चूंकि यह व्यवहार मुनाफा कमाने और पूंजी की उत्तरोत्तर बढ़ोतरी करते जाने के उद्देश्य से होता है, इसलिए कृत्रिम रूप से मांग बढ़ाते रहना और कृत्रिम रूप से पूर्ति को घटाने का भी खेल चलता रहता है। इन दिनों जीवनरक्षक रेमडेसिविर या कोरोना के टीके की कमी इसी तर्ज पर पैदा की जा रही है। इसका साम्यवादी समाधान है, उत्पादन और सेवाओं की तमाम आर्थिक गतिविधियों पर राज्य का नियंत्रण। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शीतयुद्ध के समय में एक ओर मुक्त पूंजीवाद का अग्रणी अमरीका था तो दूसरी ओर साम्यवाद का झंडाबरदार सोवियत संघ।

 भारत ने पूंजीवाद और साम्यवाद में से किसी एक को न चुनकर मिश्रित अर्थव्यवस्था का रास्ता चुना। अन्य कई मुल्कों की तरह भारत भी ‘लोक कल्याणकारी राज्य’ बना, जिसमें ज़रूरतमंदों को सस्ता राशन, मुफ्त शिक्षा और इलाज मुहैया कराया जाता है। परंतु अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और घरेलू दबाव के चलते 1990 के शुरुआती वर्षों में भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के नारे के साथ लोक-कल्याणकारी मिश्रित अर्थव्यवस्था को यह कहकर तिलांजलि दे दी थी कि राष्ट्र अब लालफीताशाही और लाइसेंसी राज को खत्म कर मुक्त अर्थव्यवस्था को अपना रहा है। जॉन रस्किन ने अपनी किताब में मांग और पूर्ति के अतार्किक और असंवेदनशील सिद्धांत को खारिज करते हुए एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जिसमें सभी की ज़रूरतें न्यायपूर्ण और सम्मानजनक ढंग से पूरी होती हों। महात्मा गांधी पर इस किताब का गहरा असर पड़ा और उन्होंने ‘सर्वोदय’ शीर्षक से उसका अनुवाद किया था। इसमें कहा गया है कि चर्मकार को कम और चिकित्सक को ज़्यादा पारिश्रमिक दिए जाने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि समाज को दोनों की जरूरत है। महामारी के इस आपात दौर में कम से कम इतना तो किया ही जा सकता है कि तमाम निजी अस्पतालों को ट्रस्ट के हवाले कर दिया जाए, जो मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि लोक-कल्याण की कर्त्तव्य भावना से समाज की सेवा करेंगे। आगे चलकर शिक्षा को भी इसी तरह निजी हाथों से मुक्त कराने की ज़रूरत है। उत्पाद-वितरण के शेष तमाम व्यवहारों को भी क्रमशः विकेंद्रित और समाज-आधारित बनाया जा सकता है। रास्ता कठिन है, लंबा है, पर नामुकिन नहीं।

अमित कोहली

स्वतंत्र लेखक

कोरोना की दूसरी लहर ने भारत के जनजीवन को बुरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। हर शहर, हर जिले में संक्रमित मरीजों की भीड़ लगने लगी है। ऑक्सीजन की कमी से हालात और भी भयावह हो रहे हैं। आखिरकार प्रधानमंत्री ने अपने चुनावी दौरों से विश्राम लेकर लोगों की सुध लेने का फैसला किया है और दुनिया के हर समृद्ध और योग्य देश से सहायता की गुहार लगाई है। विश्व के बहुत सारे मुल्क मुसीबत और महामारी की इस घड़ी में भारत की सहायता के लिए आगे आए हैं, पर एक बात तो बहुत साफ  है कि विदेशों से आने वाली सहायता आम जन तक कैसे पहुंचेगी, इसके लिए देश के अंदर का सिस्टम ठीक होना चाहिए। हमारा प्रशासन पहले ही हाथ खड़े कर चुका है। राज्य सरकार व केंद्र सरकार ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने शुरू कर दिए हैं। अगर समझा जाए तो स्थिति हकीकत में ही बहुत खराब हो चुकी है और मानो या न मानो, इसके लिए राज्य सरकारों से ज्यादा केंद्र सरकार जिम्मेदार है।

ऑक्सीजन प्लांट लगाने की जिम्मेदारी जब केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को न देकर खुद अपने हाथ में ले ली और उस पर समय से कोई काम नहीं किया गया। दवाई को देश की जरूरत के अनुसार स्टोर न करके दूसरे देशों को दे दिया, पर इसका मतलब यह नहीं कि राज्य सरकारें पाक-साफ  हैं और उन्हें दोषी नहीं मान सकते। राज्य सरकारों को भी चाहिए था कि हालात बिगड़ने का अंदेशा लगने पर वह केंद्र सरकार पर दबाव बनाते कि जरूरत के अनुसार सुविधाएं राज्य सरकारों को उपलब्ध करवाई जाएं। पर इन हालात में जब श्मशानघाटों पर लाश जलाने को तथा अस्पतालों में मरीजों को दाखिल करने की जगह नहीं है, अब भी केंद्र सरकार और राज्य सरकारें एक-दूसरे को नीचा दिखा रही हैं तथा इस स्थिति के लिए जिम्मेदार बनाकर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहती हैं। लोगों के कल्याण के लिए मिलजुल कर समन्वय बिठाकर रास्ता निकालने के बजाय हर स्थिति पर राजनीति करना चाहती हैं।

पर ऐसी स्थिति में जब विदेशों से आई मदद को देश के हर कोने में पहुंचाने के लिए प्रशासन कारगर साबित नहीं हो पा रहा, तो इस बार भी पहले की तरह सेना ने कोविड  प्रबंधन का बीड़ा उठाया है। भारतीय सेना द्वारा जरूरत के अनुसार सैनिक अस्पतालों को कोविड सेंटर बनाना, दिल्ली का बेस हॉस्पिटल तथा आईटीबीपी द्वारा दिल्ली में कोविड केयर अस्पताल स्थापित करना, सेना से 2 साल पहले सेवानिवृत्त हुए डॉक्टरों को भी वापस इस महामारी की घड़ी में लोगों की सहायता करने के लिए ड्यूटी पर बुलाना तथा सेना द्वारा अपने हिस्से की ऑक्सीजन को अस्पतालों को देने का भी निर्णय काबिलेतारीफ  है। विदेशों से लाई जाने वाली ऑक्सीजन के लिए भारतीय वायु सेना ने अपने विमान उपलब्ध करवाए हैं तथा देश में भी जगह-जगह पर किसी भी तरह की दवाई, जरूरत की चीजों को पहुंचाने के लिए सेना हर तरह की सहायता उपलब्ध करवाने के लिए आगे आई है। भारतीय सेना जो मुसीबत की हर घड़ी में देश एवं देशवासियों के लिए हमेशा तैयार रहती है, हमें उस पर गर्व है।

कर्नल (रि.) मनीष धीमान

स्वतंत्र लेखक