Sunday, May 09, 2021 07:44 PM

जैसे थे...

दैनिक जीवन के तनाव और खराब जीवनशैली ने सबसे ज्यादा हमारी नींद को प्रभावित किया है। आलम यह हो गया है कि दिनभर की थकान के बाद भी बिस्तर में जाने के बाद लंबे समय तक नींद नहीं आती है। नींद पूरी न हो पाने का असर हमारे अगले दिन के कामकाज पर पड़ता है और यही सिलसिला लगातार चलता रहता है। धीरे-धीरे यह समस्या इस कदर गंभीर हो जाती है कि व्यक्ति का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। गुणवत्ता की ओर बढ़ने का मतलब यह नहीं कि स्वास्थ्य से समझौता किया जाए...

विश्व स्वास्थ्य दिवस यानी सात अप्रैल। आज कोई एक देश नहीं, बल्कि पूरा विश्व कोरोना महामारी जैसे घातक वायरस से लड़ रहा है। विश्व पर आए इस संकट के समय में विश्व स्वास्थ्य दिवस का यह दिन और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इस स्थिति ने हम सभी को स्वास्थ्य के प्रति और सचेत और जागरूक जरूर किया है। दुनियाभर में स्वास्थ्यकर्मी कोविड-19 से जंग लड़ते हुए देश और लोगों की सेवा में लगे हैं। इस साल की थीम है ‘हेल्थ कवरेज ः एवरीवन, एवरीवेयर’, यानी हर किसी को हर जगह बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ मिले। कहते हैं कि स्वास्थ्य ही जीवन है। अतः स्वस्थ रहना जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। भोजन के सेवन और योग की मात्रा को नियंत्रित करके शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखा जा सकता है। किसी भी देश की तरक्की तभी संभव है, जब उसके नागरिक स्वस्थ हों। किंतु आज की व्यस्त एवं तनावग्रस्त जिंदगी में मानव अपने स्वास्थ्य पर पूर्ण ध्यान नहीं दे पा रहा है। काम, व्यस्तता और तनाव के कारण मनुष्य जाति के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इस दिन स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और जन-साधारण को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जाता है। संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए आम आदमी को जागरूक किया जाता है। वेक्टर जनित रोगों से बचाव के लिए इस दिन जिला व ब्लॉक स्तर पर कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं। विश्व स्वास्थ्य दिवस के दिन शिक्षा विभाग के सहयोग से विभिन्न स्कूलों में रोगों के बारे में जागरूकता कैंप, वाद-विवाद प्रतियोगता, प्रश्नोत्तरी आदि के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

वैश्विक स्वास्थ्य के महत्त्व की ओर बड़ी संख्या में लोगों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के नेतृत्व में हर वर्ष सात अप्रैल को पूरे विश्व भर में लोगों के द्वारा विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। डब्ल्यूएचओ के द्वारा जेनेवा में वर्ष 1948 में पहली बार विश्व स्वास्थ्य सभा रखी गई जहां सात अप्रैल को वार्षिक तौर पर विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाने के लिए फैसला किया गया था। विश्व स्वास्थ्य दिवस के रूप में वर्ष 1950 में पूरे विश्व में इसे पहली बार मनाया गया था। हिमाचल प्रदेश में कोरोना वायरस के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि हमें अपने स्वास्थ्य के बारे में कितना सचेत रहने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य के मुद्दे और समस्या की ओर आम जनता की जागरूकता बढ़ाने के लिए वर्षों से मनाया जा रहा यह एक वार्षिक कार्यक्रम है। पूरे साल भर के स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए और उत्सव को चलाने के लिए एक खास विषय का चुनाव किया जाता है।

 विश्व स्वास्थ्य दिवस वर्ष 1995 के खास विषयों में से एक था वैश्विक पोलियो उन्मूलन। तब से इस घातक बीमारी से ज्यादातर देश मुक्त हो चुके हैं, जबकि दुनिया के दूसरे देशों में इसकी जागरूकता का स्तर बढ़ा है। विभिन्न जगहों जैसे स्कूलों, कालेजों और दूसरी भीड़ वाली जगहों पर दूसरे संबंधित स्वास्थ्य संगठनों और डब्ल्यूएचओ के द्वारा सालाना विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। विभिन्न विकसित देशों से अपने स्थापना के समय से इसने कुष्ठरोग, टीबी, पोलियो, चेचक और छोटी माता आदि सहित कई गंभीर स्वास्थ्य मुद्दे को उठाया है। एक स्वस्थ विश्व बनाने के लक्ष्य के लिए इसने एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वैश्विक स्वास्थ्य रिपोर्ट के बारे में इसके पास सभी आंकड़े मौजूद हैं। जिस तरह पेट, हृदय, आंख, कान, नाक संबंधी बीमारियों के प्रति लोग जागरूकता रखते हैं, अब समय है कि लोग मौखिक स्वास्थ्य के प्रति भी जागरूक हो जाएं। आज भी कई सारे लोग ऐसे हैं जो अपने मुंह की सफाई नहीं करते हैं, चिकित्सक के पास नहीं जाते हैं और दिन-प्रतिदिन अपने मौखिक स्वास्थ्य को खराब कर लेते हैं। मुंह से आने वाली दुर्गंध के प्रति भी लोग जागरूक नहीं हैं। मौखिक सेहत के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए ही इस दिन की शुरुआत की गई। विश्व मौखिक स्वास्थ्य दिवस को मनाने की शुरुआत 20 मार्च 2013 को एफडीआई वर्ल्ड डेंटल फेडरेशन ने की थी। तब से लेकर आज तक हर साल यह दिन मनाया जाता है। वर्ष 2021 के लिए विश्व मौखिक स्वास्थ्य दिवस का विषय ‘बी प्राउड ऑफ  योर माउथ’ है, क्योंकि मौखिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति के अन्य अंग भी प्रभावित होते हैं।

 दैनिक जीवन के तनाव और खराब जीवनशैली ने सबसे ज्यादा हमारी नींद को प्रभावित किया है। आलम यह हो गया है कि दिनभर की थकान के बाद भी बिस्तर में जाने के बाद लंबे समय तक नींद नहीं आती है। नींद पूरी न हो पाने का असर हमारे अगले दिन के कामकाज पर पड़ता है और यही सिलसिला लगातार चलता रहता है। धीरे-धीरे यह समस्या इस कदर गंभीर हो जाती है कि व्यक्ति का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। आज के दौर में लाइफ फास्ट हो चुकी है। जीवन में गुणवत्ता की ओर बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि स्वास्थ्य से समझौता किया जाए। आप अपनी जिंदगी में व्यस्त रहते हैं, जीवन में सब कुछ सही चल रहा होता है। अचानक से एक ब्रेक लगता है और जिंदगी दवाओं की मोहताज हो जाती है। हमारा ध्यान इस ओर जाना चाहिए कि कैसे बीमारियों से दूर रहा जा सकता है। आज के दौर में घरेलू नुस्खों पर भी जोर दिया जाने लगा है। ये चीजें मौसम के हिसाब से स्वस्थ रखने में मददगार साबित होती हैं। इसके अलावा स्वस्थ रहना है तो नियमित रूप से योग, एक्सरसाइज, वॉकिंग और जॉगिंग करनी चाहिए। इससे स्ट्रेस कम होता है। इसके अलावा हेल्दी डायट लें, अपने खाने में ताजी सब्जियों और फाइबर युक्त भोजन को शामिल करें। साथ ही मौसमी फलों का सेवन जरूर करना चाहिए। याद रहे- ‘खुशहाली उस घर जरूर आनी, जहां सब लोगों ने स्वस्थ होने की ठानी।’

अशोक गौतम

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कल अपने प्रभु वैक्सीन की दूसरी डोज लगवाने आए थे। है तो छोटे मुंह बड़ी बात, पर मैं ही उनके और अस्पताल के बीच बिचौलिए की भूमिका निभाई है। तब मरता क्या न करता! प्रभु वैक्सीन लगवाने को अड़ गए तो बस, अड़ गए। तब मैंने उन्हें बहुत समझाया भी, ‘प्रभु! पहले अपने वैक्सीन से डरने वाले भक्तों को वैक्सीन लगने दो। आप तो अजर अमर हैं। पर जो कल को आपके भक्तों को कुछ हो गया तो आपको पूछने वाला कोई न होगा।’ पर वे नहीं माने तो नहीं माने। जनाब के खासों और इन अजर अमर बंदों के साथ यही सबसे बड़ा पंगा होता है। जो अड़ गए तो बस, अड़ गए।

 तब जैसे कैसे अटा पटा डॉक्टर साहब से निवेदन किया था, ‘डॉक्टर साहब! मेरे आधार कार्ड से इन्हें रजिस्टर्ड कर मेरे जाली नाम से मेरे प्रभु को वैक्सीन लगा दीजिए। महामारी को मुझसे महामारी हो जाए तो हो जाए। पर मुझे पूरा अंधविश्वास है कि इस महामारी से मुझे कुछ नहीं होने वाला।’ ‘तुम्हारा मतलब?’ उन्हें मैं तब कोई नया वायरस लगा। ‘शायद अभी आपने देखी नहीं होंगी। कल ही नई गाइड लाइंस जारी हुई हैं कि जिन्हें अपनी बीवी के साथ रहते सफल तीस साल हो गए हैं, उन्हें वैक्सीन की कतई जरूरत नहीं।’ ‘क्यों?’ सुन डॉक्टर साहब एब्नार्मल हुए तो मैंने उन्हें नार्मल करते कहा, ‘इतने सालों में बीवी को मौन सुनते सुनते उनकी इम्यूनिटी इतनी बूस्ट हो चुकी होती है कि उन्हें कोई वायरस बेरस नहीं कर सकता। देखिए डॉक्टर साहब! दिवंगत होने के बाद अपनी जान पहचान वाली लैब में मरीज को जरूरत न होते हुए भी केवल अपनी कमीशन हेतु टेस्ट करवाने भेजना, किसी खास कंपनी की ही दवाइयां हर रोगी के रोग को कमीशन के वशीभूत हो लिखना काम न आएगा, हमारे धर्म के अनुसार यही काम आएंगे।’ डॉक्टर साहब कुछ धर्मभीरु थे, सो मान गए।

 शुक्र है, उन्हें इसी लोक की ही चिंता न थी। परलोक की भी चिंता थी। अबके वे आए तो शहर में सन्नाटा देख चौंके। नाश्ता पानी कर उन्होंने बड़ा सा डकार लेने के बाद मुझसे पूछा, ‘यार! एक बात तो बताना।’ ‘एक क्या, हजार पूछो भगवन्!’ ‘जो पिछली दफा मैं वैक्सीन की पहली डोज लेने आया था तो तुम्हारे शहर का हर तीसरा मुंह कर्मठ, ईमानदार, जुझारू, समाजसेवक, जनता का सच्चा हितैषी के शोर से धधक रहा था। पर अब यहां वैसा कुछ नहीं।’ ‘तब चुनाव थे प्रभु! इसलिए हर तीसरे आदमी ने अपनी जुबान पर निष्पक्षता, कर्मठता, ईमानदारी, जुझारूपने की चाशनी चिपका रखी थी। किसी भी चुनाव में वोटर को सच्चे जनसेवक का चुनावी चोला पहने बिना उल्लू तो बनाया नहीं जा सकता न! उल्लू से सच बोलकर आजकल उल्लू भी उल्लू बनने से रहा। इसलिए खुले मन से गंभीर हो गप्पें मारकर ही जनता का उल्लू बनाया जा सकता है।

 अब चुनाव संपन्न हो गए हैं।’ ‘तो क्या शहर से ईमानदारी, कर्मठता, जनसेवा की बास भी उठ गई?’ ‘हां प्रभु! जिस तरह कोरोना की दूसरी डोज लेकर तुम अपने लोक चले जाओगे और अगली महामारी में ही वैक्सीन लगवाने आओगे, उसी तरह चुनाव खत्म होते ही प्रत्याशी ईमानदारी, कर्मठता, समाजसेवा को क्षमा याचना सहित उनके लोक भेज देते हैं ताकि अगले चुनाव में उन्हें फिर अपनी जुबान पर सादर आमंत्रित किया जा सके। या कि वे उन्हें बहला फुसलाकर उनके लोक भेज देते हैं ताकि वहां वे अगले चुनाव तक बिल्कुल सुरक्षित रहें।’ ‘उन्हें चुनाव के बाद भी ये अपने पास क्यों नहीं रखते?’ प्रभु ने बच्चों वाला सा प्रश्न पूछा तो हंसी भी आई उन पर! हद है यार प्रभु! अपने बनाए स्वार्थी जीव के स्वभाव के बारे में इतना भी नहीं जानते?