Thursday, January 21, 2021 10:48 PM

सद्गुरु की महिमा

गुरु का वचन क्या है? इस निराकार-दातार का इशारा, इस प्रभु-दातार का ज्ञान। जो गुरु के इस वचन पर एतबार करके, इस पर चलता है, गुरु से यह ज्ञान रूपी रोशनी प्राप्त करता है और जीवन में अपनाता है, वही इससे लाभ प्राप्त कर सकता है। कहीं बहुत अंधकार है और एक इनसान आवाजें दे कि कोई रोशनी करो, अंधेरे में बहुत ठोकरें लग रही हैं। उसकी आवाजें सुनकर कोई उसकी हथेली पर दीया जलाकर रख देता है। अब चारों तरफ रोशनी हो जाती है, लेकिन रोशनी-रोशनी चिल्लाने वाला इनसान अगर अपनी आंखें बंद कर ले, तो चारों ओर रोशनी होने के बावजूद भी रास्ते में पत्थर आने पर उनसे ठोकरें ही खाता है। कहने का भाव हमें साधु की कृपा से जो ज्ञान रूपी रोशनी प्राप्त होती है, उससे लाभ लें।

 उस शिक्षा को हम अपने जीवन में उतारें, अमल में लाएं, तब ही उससे सुख प्राप्त कर सकते हैं। जब साधु से हमें यह ज्ञान प्राप्त होता है और हम अपने आप को इस संत के आगे अर्पण कर देते हैं, तब ही यह अमोलक वस्तु हमारे मन में टिक सकती है, लेकिन अगर यह मन हील-हुज्जत ही करता रहे, तो फिर यह ज्ञान इसमें नहीं ठहरता, क्योंकि हुज्जती मन हमेशा अभिमानी होता है।

हर जी को हंकार न भावे।

इस हरि को हंकार अच्छा नहीं लगता। अवतार बाणी में बाबा जी फरमाते हैं।

जिस गुरसिख नूं निवणा भुल्ले, उत्थे गुरु खलोंणा नहीं।

अगर यह मन निमाणा नहीं बनता, नम्र भाव में नहीं आता, तो वहां पर न गुरु है और न गुरु का ज्ञान है। अगर गुरु के आदेशों-उपदेशों को हम अपने जीवन में नहीं उतारते, तो हमें वास्तविक आनंद प्राप्त नहीं हो सकता। दास, दातार के चरणों में यही अरदास करता है कि दातार ऐसी मेहर करे, ऐसी कृपा करे कि आप संतजन महापुरुष ज्ञान के साथ कर्म जोड़कर  इस संसार का भला मांगते रहें, भला करते रहें। ऐसी कामना ज्ञानवान महापुरुष ही कर सकते हैं। इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए जहां गुरु की कृपा आवश्यक है, वहां जिज्ञासु की तीव्र जिज्ञासा भी जरूरी है।

 स्वामी रामकृष्ण परमहंस के अनुसार जिज्ञासा इतनी तीव्र होनी चाहिए यदि कोई इनसान डूब रहा हो, पानी में उनके श्वास जा रहे हों, जिस तरह से उसको उस वक्त पानी से बाहर निकलने की इच्छा होती है, जिस तरह से उसकी एकाग्रता होती है कि मैं इस पानी से बाहर आ जाऊं और खुली सांस ले, सकूं मेरा मुख पानी से बाहर आ जाए। उसकी तड़प जो उस वक्त होती है, उसी तरह इनसान की तड़प इस प्रभु दातार के लिए होनी चाहिए। इस भवसागर से पार उतरने की इच्छा होनी चाहिए। आत्मा को परमात्मा की जो प्यास है, उस तरफ इनसान कोई ध्यान नहीं देता।

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