Friday, September 24, 2021 05:28 AM

अष्टभुजा माता मंदिर पांडवीं

देवभूमि हमीरपुर की ग्राम पंचायत पांडवीं में नेशनल हाई-वे हमीरपुर-शिमला मार्ग पर स्थित प्राचीन कल्याणकारी श्री अष्टभुजा माता का भव्य मंदिर अपने आप में स्वर्णिम गाथाएं समेटे हुए है। मंदिर में आने वालों की हरेक मुराद पूरी होती है। यही कारण है कि अष्टभुजा माता को कुलदेवी के नाम से भी जाना जाता है। वैसे तो इस वीरभूमि में अनेको धर्मस्थल हैं, जिनका अपना ऐतिहासिक महत्त्व लोगों की आस्थाओं से जुड़ा है, लेकिन इस अष्टभुजा माता मंदिर को न सिर्फ हमीरपुर, बल्कि बिलासपुर, मंडी, कांगड़ा के लोग भी अपनी कुलदेवी मानते हैं। पंजाब व अन्य राज्यों में बसे लोग भी अपनी मन्नतें मांगने के लिए कुलदेवी के दर पहुंचते हैं। मंदिर में सबकी मनोकामनाएं पूरी करने वाली दुख हरने वाली नीलकुंड से स्वनिर्मित माता की मूर्ति विराजमान है।

लोकगाथा के अनुसार आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व पांडवीं गांव के एक क्षत्रिय बुजुर्ग को रात में मां ने स्वप्र में दर्शन दिए और कहा कि मैं इस समय नीलकुंड, जिसे कुंजिया दी आल भी कहते हैं, में विराजमान हूं। मुझे यहां से निकालकर मेरा मंदिर बनाया जाए, अगर ऐसा नहीं किया तो गांववासियों के लिए शुभ नहीं होगा। सुबह होते ही बुजुर्ग ने यह बात अन्य ग्रामीणों को बताई। सबने उसकी बात का विश्वास किया और इक_े होकर बताए गए स्थान पर चले गए। एक बुजुर्ग ने बताए गए कुंड में डुबकी लगाई। मां अष्टभुजा की मूर्ति उसकी बाहों में आ गई। वह मूर्ति को लेकर पानी से बाहर आ गया। इस मूर्ति को देखकर तमाम एकत्रित गांववासी चकित रह गए और मां के जयकारे लगाने लगे। गांव से पालकी मंगवाई गई। माता की मूर्ति को पालकी में रखा गया और गांव की ओर चल दिए। पालकी को गांव से बाहर एक खाली स्थान पर रख दिया और विचार करने लगे कि मंदिर कहां बनाया जाए। काफी सोच विचार के बाद स्थान का चयन कर लिया गया और वहां पर स्थापित करने के लिए जब पुन: पालकी उठाने लगे, तो पालकी इतनी भारी हो गई कि उठाई ही नहीं जा सकी। लोग समझ गए कि मां यहां पर ही विराजमान होना चाहती है। बाद में इसी स्थान पर मंदिर बनाया गया जोकि आज एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल में तबदील हो गया है। मंदिर के साथ पीपल का पौधा लगाया गया। इसकी भी लोग ब्रह्मा के रूप में पूजा करते हैं। माता के पानी में प्रकट होने के कारण लोग इन्हें मां जालपा भी कहते हैं। मंदिर निर्माण के उपरांत यहां पर मेले का आयोजन किया गया था जोकि आज भी पुरानी प्रथानुसार प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ महीने में आयोजित होता है। श्रद्धालु विशेषकर प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को टोलियों में मंदिर में आते हैं। घर से ही चावल और माह की खिचड़ी व दही का भोग लगाया जाता है। कई लोग मन्नतें पूरी होने पर मंदिर में बकरे भी चढ़ाते हैं।

गांव के पूर्व सहायक कमांडेंट बलदेव शर्मा ने बताया कि इस मंदिर में बलि प्रथा पूर्णत: निषेध है। साथ ही यहां पर नशीले पदार्थ का प्रयोग, धूम्रपान करना बिलकुल वर्जित है। मंदिर परिसर में मां अष्टभुजा की मूर्ति के अलावा हनुमान, शिवजी व अन्य मूर्तियां स्थापित हैं। सुबह शाम मंदिर में निश्चित समयानुसार आरती होती है, जिसमें श्रद्धालु व ग्रामीण निरंतर सम्मिलित होते हैं। माता के दर्शनों के लिए मंदिर खुला रहता है। श्रद्धालुओं की सुविधा हेतू निशुल्क ठहरने के लिए बड़ा हाल व कमरे हैं तथा पानी की उचित व्यवस्था है। मंदिर में प्रवेश हेतू लगभग 81 फुट ऊंचा प्रवेश द्वार है जोकि वृंदावन के कारीगरों द्वारा वर्ष 2017-18 में तैयार किया गया है। इस प्रवेश द्वार से ही माता के जयकारे लगने शुरू हो जाते हैं।                                                                                                                                        -सुरेंद्र ठाकुर, हमीरपुर