आजाद तोते की रामकहानी

पूरन सरमा

स्वतंत्र लेखक

मैंने ही क्या, उस तोते को मेरे पिताजी ने ही पाल रखा था। मेरे घर के पिंजरे में तोता चने की दाल चुगता और पानी पीकर वर्षों से मेरा प्रिय तोता हो गया था। तोता पालने का मुझे शौक भी था और उससे मिलने वाली सूचनाओं से मैं चौकस भी रहता था। तोता भी खुश था, उसे किसी प्रकार की परेशानी नहीं थी। एक दिन कुछ पर्यावरण प्रेमी मेरे घर के बाहर आए और नारेबाजी करने लगे। मैं और मेरी पत्नी घबराए से बाहर आए। देखा तो पंद्रह-बीस लोग हाथों में तख्ती थामे तोते की आजादी के लिए मुझसे मांग कर रहे थे। मैंने छद्म पर्यावरण प्रेमियों से कहा भी कि तोता मेरे पुरखों ने पाला है और वह मेरे यहां आराम में है। लेकिन उन्होंने तोते को नहीं छोड़ने पर कानूनी कार्रवाई करने की धमकी दी। पत्नी और मैं दोनों भौंचक्के रह गए।

मैंने पत्नी से पूछा -‘बोलो, क्या करें?’ पत्नी ने मुझे आंख मारकर कहा -‘जनमत का सम्मान करते हुए हम तोते को छोड़ देते हैं।’ पर्यावरण प्रेमी खुश हो गए और बोले, ‘हमारे सामने ही पिंजरे को खोलो और तोते को आजाद करो।’ मैं पिंजरा बाहर ले आया और उसका दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खोलने के बाद भी तोता पिंजरे से बाहर नहीं निकला और पिंजरे में ही शोर मचाने लगा। मैंने पर्यावरण प्रेमियों को विवशता से देखा तो उनमें से एक बोला -‘हम आजाद करते हैं इसे।’ उसने आगे बढ़कर तोता हाथ में पकड़ा और हवा में उछाल दिया। वर्षों से पिंजरे में रहने के कारण तोता भली प्रकार से उड़ नहीं पा रहा था और वह पास के ही एक मकान की छत पर हांफकर बैठ गया। हम और पर्यावरण प्रेमी उसकी अगली उड़ान की प्रतीक्षा करने लगे। दस-पंद्रह मिनट बाद तोते ने पंख फैलाए और आसमान में गायब हो गया। पर्यावरण प्रेमी खुश होकर चले गए। लेकिन हमारा मन अवसाद से भर गया। रह-रह कर तोते की याद सता रही थी।

उसकी उपयोगिता पर हम इतने निर्भर हो गए थे कि हमें लगा कि अब हमारा जीवन कैसे चलेगा। आखिर में पत्नी ने कहा -‘चलो देखते हैं, आगे का जीवन कैसे चलता है। चिंता मत करो, कोई न कोई रास्ता अवश्य निकल आएगा, इसी भावना से हम अपना रहा-सहा समय निकालने लगे। सौभाग्य से मैंने वह पिंजरा फेंका नहीं था और उसका दरवाजा खोल रखा था। अचानक एक दिन तोता उड़ता-उड़ता आया और पुनः पिंजरे में आ बैठा। मैं और मेरी पत्नी बहुत खुश हुए कि हमारा तोता हमारे पास वापस लौट आया है। तोते से मिलने वाली सूचनाओं से हम फिर चौकस होने लगे। तोते ने फिर से अपनी उपयोगिता सिद्ध कर दी। हम भी पूरी सतर्कता के साथ उसकी देखभाल करने लगे। पहले भी हम ऐसी ही देखभाल उसकी करते थे। शायद इसी कारण वह फिर से हमारे पिंजरे में चला आया। अब तोता पालने का हमारा शौक फिर से पूरा हो गया। हम खुशी-खुशी तोते के साथ जीने लगे।

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