Tuesday, August 11, 2020 12:12 AM

बाजार की गिरफ्त में बुक फेयर-लिट फेस्ट

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साहित्य के कितना करीब हिमाचल-6

अतिथि संपादक : डा. हेमराज कौशिक

हिमाचल साहित्य के कितना करीब है, इस विषय की पड़ताल हमने अपनी इस नई साहित्यिक सीरीज में की है। साहित्य से हिमाचल की नजदीकियां इस सीरीज में देखी जा सकती हैं। पेश है इस विषय पर सीरीज की छठी किस्त…

विमर्श के बिंदु

* हिमाचल के भाषायी सरोकार और जनता के बीच लेखक समुदाय

* हिमाचल का साहित्यिक माहौल और उत्प्रेरणा, साहित्यिक संस्थाएं, संगठन और आयोजन

* साहित्यिक अवलोकन से मूल्यांकन तक, मुख्यधारा में हिमाचली साहित्यकारों की उपस्थिति

* हिमाचल में पुस्तक मेलों से लिट फेस्ट तक भाषा विभाग या निजी प्रयास के बीच रिक्तता

* क्या हिमाचल में साहित्य का उद्देश्य सिकुड़ रहा है?

* हिमाचल में हिंदी, अंग्रेजी और लोक साहित्य में अध्ययन से अध्यापन तक की विरक्तता

* हिमाचल के बौद्धिक विकास से साहित्यिक दूरियां

* साहित्यिक समाज की हिमाचल में घटती प्रासंगिकता तथा मौलिक चिंतन का अभाव

* साहित्य से किनारा करते हिमाचली युवा, कारण-समाधान

* लेखन का हिमाचली अभिप्राय व प्रासंगिकता, पाठ्यक्रम में साहित्य की मात्रा अनुचित/उचित

* साहित्यिक आयोजनों में बदलाव की गुंजाइश, सरकारी प्रकाशनों में हिमाचली साहित्य

राजेंद्र राजन

 मो.-8219158269

ये पंक्तियां लिखते वक्त मुझे 1862 में छपी जॉन रस्किन की पुस्तक ‘अंटू दि लास्ट’ का स्मरण हो रहा है। यही वह किताब है जिसने मोहनदास को महात्मा बनाया। यानी गांधी इस पुस्तक से इस कदर अभिभूत थे कि 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद स्वाधीनता संग्राम और समाज के उत्थान के लिए उन्होंने जिस क्रांति का सूत्रपात किया था, उसकी पृष्ठभूमि में ‘अंटू दि लास्ट’ की प्रेरणा सर्वोपरि रही। इस भूमिका का तात्पर्य यह है कि 150 साल पहले जब कालजयी पुस्तकें लिखी जा रही थीं तो उनकी प्रोमोशन के लिए न तो पुस्तक मेले थे, न ही कोई लिट फेस्टिवल। तब महान लेखकों की पुस्तकें अपने-अपने देशों की सीमाएं लांघकर दुनिया भर में करोड़ों पाठकों तक पहुंच रही थीं। मौजूदा सदी की त्रासदी यह है कि बुक फेयर, गोष्ठियों, सेमिनारों, समीक्षाओं और सोशल मीडिया में ‘घोर’ प्रचार के बावजूद अच्छी किताबें न तो पढ़ी जा रही हैं, न ही उन पर अपेक्षित चर्चाएं हो रही हैं। न्यूज चैनलों की तर्ज पर अगर किसी किताब या लेखक से जुड़ा कोई विवाद या सनसनी वायरल हो जाए तो पाठक कूड़ेदान में फेंकने लायक किताब भी पढ़ने के लिए पागल से हो उठते हैं। यह तकनीक के माध्यम से प्रचार का उत्कर्ष काल है। पुस्तक मेले सरकारी हों या निजी हाथों द्वारा आयोजित, उनमें व्यापारी बड़ा बाजार खोजता रहता है। पुस्तक प्रकाशन, उसका प्रोमोशन, बिक्री टेढ़ी खीर है। दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में जब खूब सर्दी का मौसम होता है तो वहां किसी अच्छी पुस्तक पर गंभीर चर्चाएं नहीं होतीं। बल्कि भीड़ और शोरो-गुल में खरीदी पुस्तकें जूट बैग में हमारे घरों में पहुंचती हैं और सजावटी फूलों की तरह अलमारियों में कैद हो जाती हैं। हिंदी प्रकाशकों का यह हाल है कि गत 20 सालों में स्त्री विमर्श के नाम पर बेशुमार किताबें छाप-छापकर ऐसी लेखिकाओं की किताबों को चर्चा में लाया गया जिन्हें चंद सालों में भुला दिया गया।

हिमाचल की बात करूं तो शिमला, धर्मशाला, कुल्लू आदि में होने वाले मेलों में भीड़ तो बहुत होती है, लेकिन पाठकों को मनपसंद किताबें ढूंढ कर भी नहीं मिलतीं। एनबीटी एक स्वायत्त संस्था है, पर वह विशुद्ध सरकारी नियंत्रण में है। उसके यहां अफसरों और तथाकथित लेखकों का जमावड़ा तय करता है कि किस साल गर्मियों में किस पहाड़ पर शीतल हवाओं का लुत्फ  उठाना है, किन चहेते लेखकों को हवाई यात्राएं करवानी हैं, किन स्थानीय लेखकों को जोड़ना है और किन्हें तोड़ना है? हिमाचल के शहरों में लगने वाले पुस्तक मेलों के स्टॉल इतने महंगे होते हैं या गेयटी थिएटर के बड़े हाल का किराया इतना महंगा होता है कि छोटे प्रकाशक आ ही नहीं पाते। दिल्ली, कोलकाता, मुंबई आदि में बड़े प्रकाशक तो शिरकत करते हैं, हिमाचल जैसे राज्य में साल में एक या दो पुस्तक मेलों में राजकमल, वाणी, रूपा, पैंगुअन आदि नहीं आते।

हिमाचल अकादमी हो या भाषा विभाग, ये पुस्तक मेलों में सहयोग तो करते हैं, लेकिन हिमाचली लेखकों की पुस्तकों के लिए कोई एक्सक्लूसिव स्टाल मैंने कभी नहीं देखा। बुक कल्चर को छोटे शहरों, कस्बों, गांवों, स्कूलों या कालेजों में ले जाने के बारे में कोई नहीं सोचता। मैंने गत 40 सालों में हिमाचली लेखकों से सरकार, भाषा विभाग या कला व संस्कृति अकादमी की कार्यशैली को लेकर शिकायतें ही शिकायतें सुनी हैं। वे हमेशा इन विभागों से नाखुश रहे हैं। शायद यह उचित नहीं है। साहित्य, कला व संस्कृति से जुड़े विभाग भले ही पुस्तक मेलों से जुड़े हों या लिट फेस्ट से, उनके पास संसाधन सीमित हैं और कल्पनाशीलता का नितांत अभाव। सरकारी प्रतिष्ठानों से चमत्कार की अपेक्षाएं निर्मूल हैं। 1980 से 1990 के दरम्यान ‘शिखर’ संस्था की ओर से शिमला में बड़े स्तर के यादगार लिट फेस्ट हुए जिन्होंने प्रदेश में साहित्य व संस्कृति की दिशा व दशा तय की। क्रिएटिव राइटर्स फोरम ने 1996 में शिमला में एक बड़ा सम्मेलन किया तो इरावती के बैनर में साहित्य अकादमी के सहयोग से 2012 में शिमला में और हमीरपुर में 2015 व 2018 के अलावा कई अविस्मरणीय सम्मेलन हुए। प्रगतिशील लेखक संघ ने मंडी व अन्य स्थानों पर अच्छे आयोजन किए। लेकिन ये सब निजी प्रयासों से संभव हुआ। रोष इस बात को लेकर रहा कि सरकार पर ब्यूरोक्रेसी के दबाव के चलते शिमला या कसौली में होने वाले खुशवंत सिंह लिट फेस्ट और शिमला में प्राइवेट लिट फेस्ट पर लाखों के अनुदान लुटाए गए, जबकि इनके आयोजकों के पास करोड़ों की स्पांसरशिप मौजूद हैं। लेकिन हिमाचल की साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थाओं को 15 हजार रुपए की रकम देकर अकसर उनका ‘अपमान ‘ सा होता रहा। कसौली में करोड़ों के मालिक रहे खुशवंत सिंह की स्मृति में लिट फेस्ट होता है जिसमें देश-विदेश से नामचीन हस्तियां पहुंचती हैं। हिंदी लेखक तो शायद कसौली लिट फेस्ट में पहुंचने का सपना भी नहीं ले सकते। ऐसी दरियादिली हिमाचल के उन कलाकारों अथवा लेखकों के प्रति क्यों नहीं दिखती जो सीमित साधनों में साहित्य एवं संस्कृति के संवर्धन व संरक्षण के लिए दिलो-जान से प्रयासरत हैं। अतः हिमाचल के सृजन कर्मियों का रोष वाजिब है। काश, हिमाचल में भी लेखक समाज संगठित होता तो जयपुर प्रगतिशलील लेखक संघ की तरह जयपुर  लिट फेस्ट की भांति वह भी समानांतर आयोजन कर अपनी छाप छोड़ पाता। लेकिन हमें संकीर्ण मानसिकता और निंदा पुराण से फुर्सत मिले, तब न।

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