Saturday, November 28, 2020 01:51 AM

बाईस-चौबीस के अनुराग-2

हिमाचल के सियासी घटनाक्रम में सरकारों का तीसरे साल से जिक्र बदल जाता है। इसी मिजाज की खाई में कमोबेश हर सरकार का मिशन रिपीट दफन हुआ है। ऐसे में 2022 का चुनाव एक बार फिर हिमाचल से दिल्ली तक भाजपा नेतृत्व की पड़ताल करेगा, लेकिन इससे पूर्व जनता के भीतर सियासी उथल-पुथल को समझना होगा।  लगातार अपने कार्यकाल के मध्यांतर में मुख्यमंत्री तथा केंद्रीय मंत्री पद गंवा चुके शांता कुमार भाजपा के राजनीतिक प्रदूषण का जिक्र करके आगामी चुनावों की बहस के पात्र बदल देते हैं। एक तरफ भाजपा की राज्य सरकार की समीक्षा में विपक्षी कांग्रेस आक्रामक है, तो दूसरी ओर सत्ता के भीतर चमक रहे नेताओं के प्रभुत्व तथा क्षेत्रीय अपेक्षाओं के सूखेपन का हिसाब होने लगा है। ऐसे में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री का जिक्र सिर्फ सांसद होने की गिनती नहीं, बल्कि उस सियासत का द्वंद्व है जो अकसर नेताओं की महत्त्वाकांक्षाओं पर आकर टकरा जाता है।

 वर्तमान सरकार की पृष्ठभूमि में सुजानपुर विधानसभा का उलटफेर और फिर लगातार मंत्रियों का गायब होना, अब सत्ता का भी हिसाब कर रहा है। विभागीय आबंटन के तहत अगर मंत्रालयों के अधीन कर्मचारियों की संख्या देखी जाए तो गोविंद सिंह के तहत 81468 कर्मचारी आते हैं, जबकि सबसे न्यूनतम राजिंद्र गर्ग के विभागीय प्रभार के तहत मात्र 532 कर्मचारी हैं। कांगड़ा-चंबा के सभी मंत्रियों के तहत विभागीय और विपिन सिंह परमार के अधीन विधानसभा सचिवालय के कर्मचारियों को मिला लिया जाए, तो यह संख्या मात्र दस हजार पांच सौ चौंसठ है। हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में महेंद्र सिंह के विभागीय कर्मचारियों 27807 का समावेश कर लें तो संख्या 47838 बनती है। शिमला संसदीय क्षेत्र के मंत्रियों के तहत 59654 कर्मचारी काम करते हैं, जबकि मंडी संसदीय क्षेत्र में मुख्यमंत्री के अलावा गोविंद सिंह व राम लाल मार्कंडेय के मंत्रालयों के तहत एक लाख उनतालीस हजार नौ सौ सात कर्मचारी आते हैं। यानी कांगड़ा-चंबा को मिले मंत्रालय प्रशासनिक दृष्टि से अति निम्न स्तर, इसके बाद हमीरपुर संसदीय क्षेत्र के मंत्रियों के तहत, फिर शिमला क्षेत्र और सर्वश्रेष्ठ भूमिका में मंडी संसदीय क्षेत्र है।  कांगड़ा व हमीरपुर संसदीय क्षेत्रों के तमाम मंत्रियों के तहत कर्मचारी मिला लिए जाएं, तो संख्या का आंकड़ा 58402 बनता है, जबकि मंडी व शिमला संसदीय क्षेत्रों में आबंटित मंत्रियों के अधीन दो लाख तीन हजार पांच सौ इकसठ कर्मचारी आते हैं। बड़े महकमों की दृष्टि से मुख्यमंत्री के अलावा गोविंद सिंह, महेंद्र सिंह, सुखराम, राजीव सहजल व विक्रम सिंह के मंत्रालयों में कर्मचारी हैं। क्षेत्रीय अपेक्षाओं में कर्मचारियों की तादाद का ताल्लुक जिन मंत्रालयों से है, उनमें कांगड़ा के बाद हमीरपुर संसदीय क्षेत्र का संतुलन कमजोर इसलिए भी दिखाई देता है क्योंकि महेंद्र सिंह की विभागीय क्षमता का झुकाव सांसद अनुराग ठाकुर के आड़े आता है। वर्तमान सरकार के कार्यों की समीक्षा में कुछ मंत्रालय अपने-अपने मंत्रियों के इर्द-गिर्द परिक्रमा कर रहे हैं और जिसकी वजह से राजनीतिक असंतुलन  पैदा हो रहा है। हिमाचल की महत्त्वाकांक्षी परियोजनाएं और विभागीय योजनाएं एक तरह की सियासी कैद में हैं। उदाहरण के लिए तीन साल की सरकार अगर केंद्रीय विश्वविद्यालय को तयशुदा जगह नहीं दिला पाए, तो कांगड़ा व हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में फैले असंतोष का जिक्र तो होगा ही।

इसी तरह कांगड़ा एयरपोर्ट विस्तार हो, हमीरपुर की रेल लाइन या विभागीय कार्यालयों की छीनाझपटी हो, तो मलाल झलक आता है। पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल को अटल टनल के निमंत्रण से दूर रखना सहज नहीं हो सकता या अब जिस सियासी प्रदूषण का जिक्र हुआ है, उससे प्रदेश भाजपा अछूत कैसे रहेगी। ऐसे परिदृश्य के बीच हमीरपुर के सांसद का गुजरना या उनका तसदीक होना कहीं न कहीं आगामी दो चुनावों की भूमिका लिख रहा है, बशर्ते इस युवा के केंद्र में प्रदर्शन को राज्य की शाबाशियां मिलती रहें। वित्त मंत्रालय की कोई भी फाइल अगर अपने किसी कोने से हिमाचल को छूती रहे, तो आकाशीय परिवर्तन हो सकता है। क्या अगले दो सालों में हिमाचल को वांछित हक मिल जाएगा या अनुराग ठाकुर चौबीस तक की गिनती में अपनी परियोजनाओं को साकार कर पाएंगे, इस पर काफी कुछ निर्भर करता है। राज्य की राजनीतिक उम्मीदों में जगत प्रकाश नड्डा का राष्ट्रीय कद वर्तमान प्रश्रय को जारी रखेगा या युवा मंजिलों पर खड़े सांसद अनुराग ठाकुर अपनी क्षमता को हिमाचल में भी पूरी तरह से उकेर पाते हैं, यही बाईस से चौबीस तक का प्रश्न भी होगा।

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