Sunday, January 24, 2021 05:08 AM

बहाने मुखर हैं-2

देहरा का प्रसंग न तो नया है और न ही यहां रुकेगा। देहरा में दीवार खड़ी करके सियासी निशान चस्पां करते-करते एक केंद्रीय विश्व विद्यालय शहीद हो गया। शिक्षा में गुरु के बजाय राजनीतिक गुरूर टकरा गया और अब इसकी असलियत सामने आ रही है। राजनीतिक शेखियों के बीच केंद्रीय विश्वविद्यालय की हैसियत का जनाजा पहले भी कई बार उठा और अब तो छात्र समुदाय भी इससे परहेज करने लगे हैं। यह परिणामों की फेहरिस्त और पाठ्यक्रमों के प्रति घट रही छात्र अभिरुचि  का अवलोकन भी तो हो सकता है। खैर जहां राजनीति को ऐसे संस्थानों से भी अपने हक, स्वाभिमान, अस्तित्व व वर्चस्च बटोरने की आदत व आवश्यकता दिखाई दे, वहां शिक्षण संस्थान की दुगर्ति तय है। दूसरी ओर सत्ता में समर्थन पाने व सामर्थ्य दिखाने का जो नजारा देहरा में पेश हुआ, उससे भाजपा के पाये हिलते हैं। कौन किसे निर्देश दे रहा या कौन किसे संदेश दे रहा, इसका हिसाब लगाते-लगाते हिमाचल अपने अगले चुनाव की दहलीज पर खड़ा होगा।

भले ही सांसद ने गुस्से में कहा होगा, लेकिन केंद्र बनाम हिमाचल के रिश्तों पर गुब्बार पसर गया। तमाम सड़क परियोजनाओं पर केंद्र की प्राथमिकताएं इस कद्र फिसलीं कि शिमला-धर्मशला फोरलेन का नामोनिशान ही मिट गया। भले ही पठानकोट-मंडी फोरलेन की फिर से डुगडुगी पीटते हुए सांसद किशन कपूर बाहर निकले हैं, लेकिन बहुत सारी अन्य परियोजनाओं-योजनाओं पर सिर मुंडवाते ही ओले पड़े हैं। केंद्र बनाम हिमाचल के नए ऊर्जा स्रोत के रूप में संसदीय क्षेत्रों पर केंद्रित राजनीति हावी हो रही है। ये नए फासले हैं जिनके ऊपर प्रदेश सरकार का सत्ता संतुलन देखा व महसूस किया जा रहा है। यह इसलिए भी कि वीरभद्र सिंह तथा प्रेम कुमार धूमल के राजनीतिक प्रभाव का क्षेत्र संसदीय परिपाटी से निकल कर व्यापक और इसके मायने संगठित हुए। इसके विपरीत शांता कुमार ने अपनी मुख्यमंत्री पद की पारी का विस्तार बेशक सांसद बन कर किया, लेकिन वह बतौर मंत्री भी पछाड़े गए तो अंतर स्पष्ट है। बतौर सांसद शांता कुमार एक भी ड्रीम प्रोजेक्ट पूरा न कर पाए, तो इसे सूबे की सियासी मिलकीयत में कैसे देखें। इसका अर्थ यह भी कि प्रदेश के चार लोकसभा सांसदों में इस वक्त अनुराग ठाकुर ही विशिष्ट हैं या वह सीधे मुख्यमंत्री से सवाल करने की ताकत रखते हैं। कुछ तो रहा होगा तेरे अरामानों में कि सामने बैठी हस्ती का गिरेबां पकड़ लिया। कम से कम देहरा का वाक युद्ध ऐसे शब्द चुन रहा है कि कौन कितना भारी या दम रखता है।

 चुनौती देते अनुराग ठाकुर के अल्फाज हिमाचल की सत्ता की चोटी पकड़ रहे हैं, तो राष्ट्रीय भाजपाध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा की एंट्री स्वाभाविक है। यहां मसला अगर दो सरकारों के बीच है, तो भी नड्डा का पलड़ा देखा जाएगा। यहां कौन सी सत्ता सही और कौन सी दोषी है, इस पर बहाने मुखर हैं। क्या एक संस्थान की स्थापना का पेंच इतना सख्त है कि विश्वविद्यालय की फाइल अब बिखरने लगी है और यहां दोनों ही पक्ष क्या कह रहे हैं, इसे समझना इतना आसान है कि तालियां बराबर बजेंगी। अगर ऐसे ही किसी मंच पर सत्ता का सामना विपक्ष से हो जाए या आरोपों की संवेदना समझी जाए, तो हिमाचल की हकीकत का पता लगाया जा सकता है। न तो एक संस्थान को विषय बनाकर प्रदेश की सत्ता अकालग्रस्त होगी और न ही हिमाचल की राजनीतिक संस्कृति में तर्कशील, स्वतंत्र व मौलिक विचारों की नुमाइंदगी हो रही है। यह विडंबना है कि केंद्रीय विश्वविद्यालय को तरसते सांसद के सामने शिक्षा की लाचारी को समझने का वक्त नहीं। प्रदेश को शिक्षा का हब बनाने चले थे, लेकिन इक्का-दुक्का निजी विश्वविद्यालयों को छोड़कर बाकी संस्थानों का क्या हुआ, कौन गौर करेगा। स्कूल-कालेजों की तादाद में नेताओं की गर्दनें मजबूत हो गईं, लेकिन शिक्षा बीमार पड़ गई। आश्चर्य यह कि हिमाचल का हर मंच राजनीतिक चर्चाओं में नेताओं का ग्रॉफ देख रहा है, जबकि सार्वजनिक विवेचन में प्रदेश की काबिलीयत ही क्षीण है।

 दुर्भाग्यवश कोई अर्थशास्त्री, शिक्षाविद, प्रोफेशनल या विभिन्न विषयों के अनुभवी दक्ष लोगों को राज्य का अहम हिस्सा नहीं माना गया। हिमाचल की नीतियों-कार्यक्रमों में या तो नौकरशाही-अफसरशाही हावी है या नेताओं के स्वार्थ की चाकरी को तरजीह मिलती है। जो प्रदेश ढंग से बस स्टैंड या पर्यटक सुविधाएं जुटाने के बजाय इन्हें राजनीतिक प्राथमिकताओं के तहत देखता हो, वहां गुणवत्ता, न्यायोचित या निष्पक्षता के आधार पर विकास ही नहीं, तो संस्थान कैसे बनेंगे। हिमाचल के तमाम विश्वविद्यालयों के योगदान पर चर्चा के बजाय राजनीतिक महफिलें केवल नए शिलान्यासों तथा इमारतों के उद्घाटनों पर चाहे प्रसन्न होती रहें, लेकिन हकीकत यह है कि शिक्षा के न तो प्रदेश के प्रति और न ही छात्रों के प्रति सरोकार रहे हैं। विडंबना यह है कि नेताओं के अहंकार व स्वार्थ की वजह से प्रदेश के संसाधन जाया हो रहे हैं, लेकिन इस सारी प्रक्रिया में जनता ताली बजा रही है। क्या देहरा में अनुराग या मुख्यमंत्री के प्रति बजी तालियों में भिन्नता के सुर थे या राजनीति का यही सुरूर हमें रास आ चुका है।

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