Saturday, January 23, 2021 03:42 AM

वैराग्य का अर्थ भागना नहीं

जब सिकंदर भारत आया, तो उसे लोगों ने सलाह दी कि अगर कोई साधु संयासी मिले, तो उसे यहां पकड़ ले आना। वहां के साधु बहुत कीमती हैं।  उसने आदेश दिया कि साधु उसके समक्ष आए। उसने कहा पंडितो अगर तुम नहीं आए, तो मैं तुम्हारा सिर कलम कर दूंगा। जब लोग इस पर भी सहमत नहीं हुए, तो उसने कहा अगर तुम लोग नहीं आए, तो मैं तुम्हारी सारी किताबें, सारे वेद ले लूंगा…

जब आप वैराग्य में नहीं होते हैं तो क्या होता है? आप अतीत या भविष्य से जुड़े होते हैं इसलिए आप वर्तमान से शत-प्रतिशत जुड़े नहीं होते हैं। इसलिए आप अधिक विभाजित होते हैं। क्या आपको यह समझ आया, इसलिए जब आपका दिमाग भविष्य में किसी चीज की उम्मीद कर रहा हो या अतीत पर पछतावा कर रहा हो, तो यह उस पल के साथ शत-प्रतिशत नहीं है, जिसका अर्थ है कि यह पहले से ही विभाजित है। जब आप पूरी तरह से केंद्रित होते हैं और आप दुनिया में कुछ भी कर रहे होते हैं तो आप हर पल शत-प्रतिशत होते हैं। वैराग्य आपको वह आनंद देता है जो कहीं और से नहीं मिल सकता। ऐसा कौन सा सुख है जो वैराग्य से नहीं मिलता। इससे सारे सुख मिलते हैं, क्योंकि आप प्रत्येक क्षण वर्तमान में हैं।

ये आपको शत-प्रतिशत वर्तमान में रखता है। हर क्षण परम आनंद है। संसार में तथाकथित वैराग्य बड़ा शुष्क लगता है। जो लोग सोचते हैं कि वे बहुत ही प्रताडि़त हैं, उदासीन हैं, दुखी हैं, वे दुनिया से भाग जाते हैं और फिर वे कहते हैं, मैंने दुनिया को त्याग दिया है, यह कोई त्याग नहीं है। लोग असफलताओं से, दुःख से, पीड़ा से बचने के लिए भाग खड़े होते हैं और स्वयं को कहते हैं कि वैराग्य में आ गए। वैराग्य बहुत बहुमूल्य है यदि आप वैरागी हैं, तो आप बहुत केंद्रित होंगे आनंद से परिपूर्ण, पूरी तरह से संतुष्ट। हर व्यक्ति वैसा होना चाहेगा। जब सिकंदर भारत आया तो उसे लोगों ने सलाह दी कि अगर कोई साधु संयासी मिले, तो उसे यहां पकड़ ले आना। वहां के साधु बहुत कीमती हैं। तो उसने आदेश दिया कि साधु उसके समक्ष आए। उसने कहा पंडितो अगर तुम नहीं आए, तो मैं तुम्हारा सिर कलम कर दूंगा। जब लोग इस पर भी सहमत नहीं हुए, तो उसने कहा अगर तुम लोग नहीं आए, तो मैं तुम्हारी सारी किताबें, सारे वेद ले लूंगा। इस पर साधुओं ने कहा ठीक है, कल शाम को ले जाना।

 तो इन पंडितों ने क्या किया कि अपने शिष्यों को रात भर में सभी वेद कंठस्थ करवा दिए और पांडुलिपियां उठाकर सिकंदर को दे दीं और कहा कि ले जाओ अब हमें इसकी आवश्यकता नहीं है। वह तो एक संन्यासी को पकड़ना चाहता था और संन्यासी आया ही नहीं। अंत में उसे उसके पास जाना पड़ा और उसने कहा, ठीक है, तुम आ रहे हो या नहीं? अगर तुम मेरे साथ नहीं आए, तो मैं तुम्हारे सिर को काट दूंगा। संन्यासी ने कहा, मेरे सिर को काट दो, मैं देख लूंगा और फिर उसके बाद सिकंदर उस संन्यासी की आंखों में नहीं देख नहीं पाया। वह वैराग्य की शक्ति को बर्दाश्त नहीं कर पाया। यहां सिकंदर के सामने एक ऐसा व्यक्ति था, जिसने पहली बार एक सम्राट की कोई परवाह नहीं की।

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