Sunday, August 09, 2020 05:05 PM

बरसात के लिए कितना तैयार हिमाचल

बरसात शुरू हो चुकी है और आने वाले कुछ ही दिनों में यह परवान चढ़ जाएगी। मानसून हिमाचल को हर साल गहरे जख्म देकर जाता है। किन्नौर-कुल्लू-मंडी-चंबा और सिरमौर के ऊपरी इलाकों में बादल फटने का खौफ हमेशा बना रहता है। हिमाचल में इस कहर से निपटने की क्या हैं तैयारियां? कितना सतर्क है आपदा प्रबंधन विभाग? एनडीआरएफ की क्या है प्लानिंग? इन सभी प्रश्नों के जवाब इस बार के दखल में टेकचंद वर्मा के मार्फत….

हिमाचल प्रदेश में मानसून शुरू हो चुका है। इस बार समय पर मानसून आया है। हालांकि बारिश का दौर यहां इससे पहले भी चलता रहा है, मगर बरसात की बारिशें अब शुरू हुई हैं। पहाड़ी प्रदेश में मानसून हर साल कहर बरपाता है। करोड़ों रुपए का नुकसान यहां होता है। इसमें निजी व सरकारी संपत्ति शामिल रहती है। इसकी एवज केंद्र सरकार राहत कार्यों के लिए हिमाचल को नाममात्र मदद देती है। हर बार हिमाचल प्रदेश को मानसून बड़े जख्म देता है। पिछले साल की बात करें, तो हिमाचल में इससे सबसे अधिक नुकसान चंबा, कांगड़ा, कुल्लू, शिमला व सिरमौर जिलों में देखने को मिला है। किन्नौर भी प्रभावित काफी हुआ था। इस साल मानसून की शुरुआत में सरकार ने भी अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मानसून को लेकर समीक्षा की थी। मानसून शुरू होने से पहले मौसम विभाग व आपदा प्रबंधन अथॉरिटी के साथ बातचीत हुई थी, जिसके बाद सभी जिलाधीशों को सतर्क रहने को कहा गया। जिलाधीशों ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अपनी तैयारियां बताईं। बरसात के दिनों में राहत कार्यों के लिए लोक निर्माण विभाग ने भी अपने चीफ इंजीनियर्स व संबंधित ज़ोन के एसई को नोडल अधिकारी बनाया है, जिनके अधीन आने वाले अधिकारी आगे क्रमवार काम करेंगे।

किन्नौर-कुल्लू-चंबा-सिरमौर में कहर मचाती है बारिश

हिमाचल में बरसात से सबसे अधिक नुकसान किन्नौर, कुल्लू, मंडी, चंबा, सिरमौर में होता है और आपदा रिस्पांस फोर्स की भर्तियां हो जाने के बाद सरकार इन्हें ऐसे ही क्षेत्रों में तैनात करेगी, जहां अधिक खतरा रहता है। इन जिलों से ज्यादा मामले सामने आते हैं। यहां डिजास्टर रिस्पांस फोर्स तैनात होगी, जो कि पहले एक्शन में आएगी, जिसके बाद एनडीआरएफ व पुलिस की मदद ली जा सकेगी। इस तरह आपदा के दौरान त्वरित कार्रवाई में हिमाचल काम करेगा। माना जा रहा है कि इस तरह के कदम उठाकर हिमाचल राहत कार्यों में पहले से अधिक प्रभावशाली कदम उठा सकता है। हालांकि कितनी ज्यादा राहत प्रदेश को मिलेगी और कितनी सफलता सरकार इसमें हासिल कर पाएगी, यह आने वाला समय बताएगा।

गांव स्तर पर टास्क फोर्स तैयार, 50 हजार से ज्यादा वॉलंटियर ट्रेंड

आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने गांव स्तर पर अपनी टास्क फोर्स बना दी है। हजारों की संख्या में इसमें युवाओं को रखा गया है, जिन्हें प्रशिक्षित किया गया है। 50 हजार से ज्यादा ऐसे वालंटियर को ट्रेनिंग दी गई है, जो आपदा के समय में गांव स्तर पर काम करेंगे। ऐसी समितियों का गठन किया गया है, जो बादल फटने या फिर दूसरी घटनाओं के समय में हरकत में आएंगी और जिला प्रशासन के माध्यम से अपनी सूचनाएं देंगे। सबसे अहम बात यही है कि तुरंत सूचना मिलने पर राहत कार्य शुरू किए जाएं, इस पर जोर दिया जा रहा है। इनकी अहम मदद यहां ली जाएगी।

नदी बेसिन पर लगातार बजेंगे हूटर

सरकार की तैयारियों के तहत जिलाधीशों ने अपने जिलों में मौजूद बिजली प्रोजेक्ट्स के प्रबंधकों को कहा है कि वे बेसिन पर लोगों को जाने से रोकें और समय-समय पर वहां हूटर बजाते रहें। पूरे बेसिन पर अलग टीमें यहां तैनात रहेंगी। ये निर्देश सभी को दिए गए हैं कि नदी बेसिन पर रहने वाले लोगों को सचेत किया जाए। बरसात के दौरान जब काफी ज्यादा बारिश होती है, तो उस दौरान जलस्तर बढ़ जाता है। ऐसे में वहां आसपास रहने वाले लोगों को वहां से किस तरह से रेस्क्यू करना है, इसके बारे में भी बताया गया है। यहां हूटर बजाकर लोगों को जलस्तर बढ़ने की सूचना दी जाती रहेगी।

केंद्र से मंजूर है एनडीआरएफ बटालियन, मंडी के सिराज में ढूंढ रहे हैं 800 एकड़ जमीन

हिमाचल में आपदाओं को लेकर सरकार संजीदा है, जिसने केंद्र सरकार से यहां एनडीआरएफ की बटालियन बिठाने की मांग रखी है। केंद्र सरकार ने इसकी मंजूरी भी दी है, मगर अभी तक इन्हें स्थापित करने के लिए यहां जमीन का इंतज़ाम नहीं हो सका है। मंडी जिला के सिराज में एनडीआरएफ की बटालियन को रखा जाएगा, जहां इनका बेस कैंप बनाने की सोची है, लेकिन अभी तक जमीन को लेकर आगे काम नहीं हो सका है। बताते हैं कि 800 एकड़ से ज्यादा जमीन यहां देख तो ली गई है, मगर फोरेस्ट क्लीयरेंस का एक पेंच इसमें है। राजस्व विभाग ने मामला आपदा प्रबंधन को भेजकर कहा है कि अधिकारी देखें कि इसमें फोरेस्ट लैंड कितनी है। क्योंकि जमीन के हस्तांतरण से पहले वन विभाग की मंजूरी लेनी जरूरी होगी। इस कारण से मामला फंसा हुआ है। मंडी जिला में पहले किसी अन्य स्थान पर जमीन देखी थी, मगर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर चाहते  हैं कि सिराज में इसे स्थापित किया जाए। इस पर तेजी के साथ काम चल रहा है और जल्दी ही बटालियन का बेस कैंप यहां स्थापित कर दिया जाएगा। यह बटालियन उस तरह की होगी, जैसे पठानकोट में है। अभी हिमाचल पठानकोट में तैनात बटालियन की मदद मांगता है।

1070 पर दें आपदा सूचना

मानसून जहां कहर बरपाता है, इसकी तुरंत सूचना के लिए आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के टोल फ्री नंबर 1070 पर फोन किया जा सकता है। यह नंबर सभी जिलों के लिए है, जिसमें सूचना देने के बाद तुरंत जिला कार्यालयों को सूचना दी जाएगी और आपदा प्रबंधन टीमें वहां से रवाना होंगी। इस दौरान सूचना के आदान प्रदान के तंत्र को अधिक सुदृढ़ बनाए जाने पर जोर दिया जा रहा है। जिलाधीशों ने आगे तहसील स्तर पर तहसीदारों व उपमंडल स्तर पर एसडीएम को जिम्मेदारी दी है कि जैसे ही कोई सूचना मिले, वहां तुरंत प्रशासन हरकत में आए। कहीं रोड बंद होते हैं, तो इनका संपर्क पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों के साथ रहेगा। सूचना मिलते ही पुलिस व होमगार्ड को भी हरकत में आना होगा।

यहां पठानकोट से आता है आपदा राहत दल, नूरपुर में भी कंपनी

आपदा के समय में पठानकोट से आपदा राहत दल आते हैं, वहीं नूरपुर में भी इनकी कंपनी है। इसके अलावा इनकी एक कंपनी शिमला जिला के सतलुज बेसिन पर है, जो कि सुन्नी में तैनात है। यहां सतलुज पर भी ज्यादा खतरा रहता है, जहां बाढ़ आने के बाद इनकी तैनाती की गई थी। बरसात के दिनों में सतलुज अपने उफान पर रहती है और आपदा के समय में यह टीम हरकत करती रहती है। इन्हें भी सरकार ने तैयार रहने को कहा है, क्योंकि बरसात के दौरान हिमाचल को बड़े जख्म मिलते हैं। इस दौरान राहत कार्यों के लिए ऐसे आपदा दलों का होना बेहद जरूरी है।

कर्मचारियों की छुट्टियां रद्द

अबकी बरसात में सड़कें खुला रखने के लिए लोक निर्माण विभाग ने अपनी पूरी मशीनरी तैनात कर दी है। हर मुख्य मार्ग पर जेसीबी मशीनों को तैनात रहने के लिए कहा गया है, ताकि सड़क बंद होते ही उसे चालू कर दिया जाए। जिलाधीशों के अधीन लोक निर्माण विभाग के अधिकारी इस दौरान राहत कार्य करेंगे। आपदा राहत में काम करने वाले कर्मचारियों को इस दौरान छुट्टियां भी नहीं मिलेंगी। सभी ज़ोन के चीफ इंजीनियर संपर्क में रहेंगे और अधिकारियों को कहा गया है कि उनके फोन बंद नहीं रहेंगे।

पुलिस बटालियन की तरह होगी डिजास्टर रिस्पांस फोर्स, नियुक्त होंगे 400 कर्मी

हिमाचल सरकार ने आपदा राहत कार्यों को ध्यान में रखते हुए अपनी डिजास्टर रिस्पांस फोर्स गठित करने का निर्णय लिया है। यहां पुलिस बटालियन की तरह डिजास्टर रिस्पांस फोर्स होगी। इनकी भर्ती के लिए मामला पुलिस विभाग को भेजा गया है, लेकिन कोविड के कारण यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। इस पर राजस्व विभाग ने पुलिस विभाग को कहा है कि वह जल्द आपदा रिस्पांस फोर्स की भर्ती शुरू करें। पुलिस की तर्ज पर ही ये भर्तियां की जाएंगी, जिसमें सबसे पहले 400 लोगों को नियुक्त किया जाएगा। इसमें पुलिस की ही तरह कर्मचारियों को पद दिए जाएंगे, जिसमें आला अधिकारियों की भी तैनाती होगी। चरणबद्ध ढंग से इस फोर्स को यहां बढ़ाया जाएगा। प्रदेश सरकार को इससे बड़ी मदद मिलेगी, वहीं आपदाओं से जुड़े सभी मसलों में यही फोर्स आगे कदम उठाएगी। इस तरह स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फोर्स और एनडीआरएफ की बटालियन यहां काम करेगी, ताकि बरसात में राहत कार्यों के दौरान ज्यादा नुकसान न हो और लोगों की जान माल की हिफाजत की जा सके।

लोगों को करेंगे जागरूक

आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने बरसात के मौसम में आपदा से बचाव के लिए लोगों को जागरूक करने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। जिलाधीशों के माध्यम से लोगों को इस तरह की प्रचार सामग्री का वितरण किया जा रहा है और बताया जा रहा है कि आपदा के समय में वे क्या करें, इसके लिए गांव स्तर पर जो समितियां बनी हैं, वे जन प्रतिनिधियों के माध्यम से लोगों को समझा रहे हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए।

उफनती नदियां निगल जाती हैं कई जिंदगियां

बरसात के दिनों में नदियां उफान पर रहती हैं और परियोजनाओं के साथ लगते क्षेत्रों में पानी ज्यादा बढ़ जाता है। इन परिस्थितियों में कई हादसे पूर्व में हो चुके हैं। लोग नदियों के किनारे सेल्फी लेने के लिए चले रहते हैं, जिस वजह से कई हादसे हुए हैं। नदी बेसिन पर ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में जाने की पूरी तरह से मनाही बरसात के दिनों में होगी। इतना ही नहीं, परियोजना प्रबंधक वहां चेतावनी बोर्ड भी स्थापित करेंगे, जिसके लिए गाइडलाइन जारी की जा चुकी है। नदी बेसिन में पुलिस अलर्ट वैन आदि भी चलाएगी, ताकि लोगों को सूचना मिलती रहे और वे सतर्क हो जाएं। बरसात के दिनों में कम से कम नुकसान हो, इसके लिए सभी उपाय सरकारी तंत्र अपनाने की तैयारी में है। देखना यह है कि इस बार बरसात का क्या रूप रहता है। इसका रौद्र रूप  हमेशा डराता रहा है। बादल फटने के समय में हिमाचल को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा है।

सोलन में गिर गया था आर्मी के जवानों से भरा होटल

सोलन जिला में भी एक बड़ा भवन जमींदोज हो गया था। वहां ढाबे में आर्मी के लोग बैठे थे। हर साल बरसात अपना रौद्र रूप दिखाती है और लगातार इसका कहर जारी है।

पिछले साल लगी थी 1994 करोड़ की चपत

प्रदेश में बरसात से नुकसान की बात करें, तो हिमाचल को पिछले साल ही 1994 करोड़ रुपए का नुकसान आंका गया था। इससे पहले 1712 करोड़ और उससे पूर्व 1863 करोड़ रुपए का नुकसान आंका गया। ये आंकड़े राजस्व विभाग ने जिलाधीशों के माध्यम से जुटाए हैं। इसी तरह से इनसे पूर्व के सालों में भी प्रदेश को नुकसान होता रहा है। कभी 800 करोड़ तो कभी एक हजार करोड़ रुपए से ऊपर का नुकसान प्रदेश को हुआ।

कोई नहीं भूला कोटरूपी हादसा

यह भी याद करवा दें कि मंडी जिला में कोटरूपी नामक स्थान पर एक बड़ा हिस्सा मलबे में तबदील होकर बह गया था, जिससे वहां हादसा भी हुआ। इसे लेकर अभी तक अध्ययन चल रहा है, जिसका कोई नतीजा सामने नहीं आया। इस हादसे को कोई भुला नहीं सकता। इसी तरह के हादसे रामपुर के पास ऊरनी ढांक में भी सामने आते रहे हैं, जहां किन्नौर को जाने वाली सड़क कई दिन तक बंद हो गई थी। इस तरह सड़कों को खासा नुकसान यहां होता है, लिहाजा लोक निर्माण विभाग के सामने एक बड़ी चुनौती रहती है।

केंद्र की राहत राशि नाकाफी

हिमाचल सरकार ने यह आंकड़े अपने प्रबंधन से जुटाए हैं और इसी आधार पर केंद्र सरकार से पैसा मांगा जाता रहा है, मगर केंद सरकार ने कभी भी इन आंकड़ों के अनुसार हिमाचल को वित्तीय मदद नहीं दी। केंद्र सरकार हिमाचल के दावे देखते हुए बरसात के बाद यहां नुकसान का जायजा लेने के लिए अपनी टीम को भेजती है। यह टीम अधिक प्रभावित होने वाले क्षेत्रों का दौरा करती है। जो आकलन इस केंद्रीय टीम के माध्यम से किया जाता है, उसी आधार पर केंद्र सरकार हिमाचल को आपदा राहत कोष से राहत राशि प्रदान करता है। बता दें कि यह राहत राशि कभी भी 300 से 400 करोड़ रुपए से ज्यादा की नहीं हुई। पिछले कुछ सालों में 100 से 150 करोड़ रुपए भी हिमाचल को मिलते रहे हैं। ऐसे में यह राशि न के बराबर है।

200 करोड़ तक अपने खाते से देती है हिमाचल सरकार

पहाड़ी प्रदेश में इस नुकसान का आकलन जो किया जाता है, उसकी पूरी भरपाई नहीं होती। राज्य सरकार को इसका बोझ खुद पर लेना पड़ता है। करीब 100 से 200 करोड़ रुपए इस त्रासदी पर सरकार अपने खाते से खर्च करती है। पिछले साल की बात करें, तो बिलासपुर जिला में बरसात ने एक गांव को तबाह कर दिया था, जहां रहने वाले लोगों को सरकार ने दो-दो बीघा जमीन दी है। हालांकि यह जमीन देने के लिए लंबी प्रक्रिया से दो-चार होना पड़ा, मगर इन्हें अब बसाया जा रहा है।

आपदा से निपटने के लिए पूरी तैयार है सरकार…

ओंकार शर्मा, प्रधान सचिव राजस्व एवं आपदा

प्रधान सचिव ओंकार शर्मा से बातचीत के मुख्य अंश

बरसात के लिए सरकार की किस तरह की तैयारियां हैं?

ओंकार शर्माः बरसात आने से पहले ही विस्तृत बैठक मुख्य सचिव की अध्यक्षता में करवाई गई है, जिसमें संबंधित विभागों के अधिकारी मौजूद रहे। एक वृहद कार्ययोजना बनाई गई है, ताकि बरसात से होने वाला नुकसान कम किया जा सके। यातायात को सुचारू बनाए रखने के लिए जरूरी निर्देश दिए हैं और जिलाधीश पूरी कमान संभालेंगे।

किस तरह की व्यवस्था की गई है?

ओंकार शर्मा : सभी टेलिकॉम कंपनियों के साथ बातचीत हुई है, उन्हें बैठक में बुलाया गया था। रणनीति बनी है, कहीं भी संचार व्यवस्था ठप नहीं होगी। भारी बरसात के दिनों से निपटने के लिए कई दूसरे इंतजाम किए गए हैं। लोक निर्माण विभाग की मशीनरी को तैनात करने को कहा गया है, जहां भी सेंसेटिव एरिया है, वहां पहले से ज्यादा इंतजाम होंगे।

नुकसान पर हिमाचल को हमेशा केंद्र से कम राहत क्यों मिलती है?

प्रदेश सरकार अपना आकलन करती है, लेकिन केंद्र सरकार विशेष टीम को भेजती है। उस टीम का अपना आकलन रहता है और उसके मुताबिक वह लोग राहत प्रदान करते हैं। वैसे पिछले सालों की अपेक्षा अब केंद्र सरकार ज्यादा मदद करती है।

त्वरित आपदा प्रबंधन किस तरह से किया जाएगा?

आपदा में त्वरित कार्रवाई के लिए कदम उठाए जाएंगे। यहां एनडीआरएफ की टुकडि़यां पहले से तैनात हैं, जिनकी मदद ली जाएगी। केंद्र से एनडीआरएफ की बटालियन यहां मंडी में स्थापित होगी। इसके अलावा गांव स्तर पर वॉलंटियर तैयार किए गए हैं, वहीं फोर्स का गठन भी आने वाले दिनों में हो जाएगा।

सड़कों पर पड़ती है सबसे ज्यादा मार

बरसात के दिनों में सबसे अधिक कहर सड़कों पर टूटता है। सड़कें जगह-जगह उखड़ती हैं और कई जगह मलबा आ जाता है। पिछले साल कई नेशनल हाई-वे समेत छोटी-बड़ी 300 से ज्यादा सड़कें राज्य में बरसात के दिनों में प्रभावित हुई थीं, जिन्हें खोला जाना आसान काम नहीं था और इसमें खासा समय लगा था।

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