Saturday, August 15, 2020 10:09 PM

बौद्धिक विलास में उलझा साहित्यिक विकास

अजय पाराशर

मो.-9418252777

साहित्य को अगर सरल शब्दों में अभिव्यक्त करना हो, कहा जा सकता है कि यह केवल समाज का पथ प्रदर्शक और निर्देशक ही नहीं बल्कि इसका प्रकाशक भी है। इतिहास साक्षी है कि किसी भी युग में कोई सत्ता चाह कर भी साहित्य की धाराओं को अपने मुताबिक मोड़ने में कभी सफल नहीं हो पाई। हर युग में भले ही राज्यपोषित साहित्यकार सत्ता के अनुकूल कुछ रचने की कोशिश करते रहे हों, लेकिन ऐसा लेखन कभी समय को नहीं लांघ पाया। सही अर्थों में सच्चा साहित्यकार समाज की गतिविधियों से रू-ब-रू होते हुए समाज के लिए जीता है और समाज के उत्थान में सहाई होता है। हो सकता है ऐसे साहित्यकारों को अपने समय विशेष में मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा हो या करना पड़े, लेकिन अपनी उत्कृष्ट रचनाओं के कारण वे अमरत्व प्राप्त करने में सफल रहते हैं। साहित्य की स्वायत्तता का आधार उसे विकासशील बनाता है, जो साहित्य की मौलिकता और निरंतरता के बिना मुमकिन नहीं। लेकिन स्वायत्तता की पहली शर्त है साहसपूर्ण लेखन और नवीन प्रयोग। लेखन जब भी साहसपूर्ण होता है तो उसे समय की चुनौती स्वीकार करनी ही पड़ती है। ऐसे में साहित्य मात्र सौंदर्यबोध तक ही सिमटा नहीं रहता, बल्कि मौलिकता के आवरण में लिपट कर सांस्कृतिक घटनाक्रम में तबदील हो जाता है। साहित्य में नूतन प्रयोगों की द्वंद्वात्मक प्रगति कलात्मक मूल्यों के विश्लेषण और आलोचनाओं के समावेश से साहित्य की सशक्त प्रस्तुति में सहायक होती है। अतः कहा जा सकता है कि साहित्य अदीबों द्वारा समाज को दिखाया गया वह आईना होता है, जिसमें सामाजिक गतिविधियों की झलक दिखाई पड़ती है। समाज साहित्य का कार्यक्षेत्र है। इसीलिए साहित्य को एक सामाजिक कर्म कहा जाता है। तत्कालीन सामाजिक वातावरण और वस्तुस्थिति समाज विशेष पर प्रभाव डालती है। साहित्यकार भी इससे अछूता नहीं रह सकता। महादेवी वर्मा के शब्दों में, साहित्य मनुष्य की पूर्ण अभिव्यक्ति का माध्यम है। अपनी अनुभूति और आस्थाओं को अभिव्यक्ति देते समय लेखकों को समाज के मंगल विधान पर भी ध्यान देना है। दूसरों की प्रेरणा से साहित्य सृजन असंभव होगा। प्रतिभा व्यक्ति की अपनी संपत्ति है, उसका विस्तार संभव है। इसमें कोई दोराय नहीं कि साहित्यिक रचनाएं अन्य वैचारिक बहसों की तुलना में काल विशेष, समाज और जिंदगी को समझने में अधिक मददगार होती हैं। वर्तमान समय का साहित्य भी आने वाली पीढि़यों को खुद को समझने में मदद करेगा। लेकिन यहां यह पूछना तर्कसंगत होगा कि हिमाचल का बौद्धिक विकास क्या वास्तव में साहित्य के विकास में सहाई हुआ है? हो सकता है कि यह प्रश्र पूछे जाने पर आम लोगों के साथ अधिकांश साहित्यकार भी अपने को असहज महसूस करें। वर्तमान संदर्भ में देखें तो लगता है कि हमारा बौद्धिक विकास तो हुआ है। हम कई अर्थों में पहले की तुलना में कथित रूप से अधिक सधे हुए हैं। अधिकांश क्षेत्रों में अभूतपूर्व विकास हुआ है। लेकिन दैनिक जीवन में इस विकसित व्यक्तित्व के जो दर्शन होते हैं, वे हमारी बौद्धिक प्रगति के सही मापदंड और मानदंड नहीं कहे जा सकते। साहित्य मानव जीवन में इस तन-मन बसा होना चाहिए कि व्यक्ति चाहे किसी भी क्षेत्र में अपना विकास करे, वह कभी यह न कहे कि उसे साहित्य के लिए कभी समय नहीं मिला या वर्तमान में उसके लिए साहित्य के सान्निध्य में रहना मुमकिन नहीं। लेकिन ऐसा तभी संभव है जब उसे बाल्यावस्था से ही ऐसा वातावरण मिल सके, जहां साहित्य को जीवन का अनिवार्य अंग माना जाता हो। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज हिमाचल प्रदेश भारत के सर्वाधिक साक्षर राज्यों की प्रथम कतार में खड़ा है। लेकिन यक्ष प्रश्न है कि हमारे प्रदेश का साहित्य वर्तमान समय की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतर रहा है? कितने साहित्यकार समय की आंख में आंख डाल कर लिखने का साहस करते हैं। कितने साहित्यकार ऐसे हैं जो वास्तव में वही लिख रहे हैं जो अनुभव कर रहे हैं। आपकी दृष्टि कितनी सक्षम और निष्पक्ष है। जब तक साहित्यकार सक्षम और निष्पक्ष नहीं होगा, वह कभी अपने लेखन से न्याय नहीं कर सकता। अगर उसकी दृष्टि में खोट है तो उसके द्वारा उठाए जाने वाले विषय बौद्धिक विलास के लिए बेहतर साबित हो सकते हैं, लेकिन विकास में कतई सहाई नहीं हो सकते। प्रश्न यह भी उठता है कि अगर हमारी शिक्षा स्तरीय है और वास्तव में हमारा बौद्धिक विकास हो रहा है तो हमारी साहित्य से दूरी क्यों बनी हुई है। हमारी साहित्यिक अभिरुचियां कहीं कागजों में सिमट कर तो नहीं रह गई हैं। पारिवारिक जीवन में साहित्य ई-प्लेटफॉर्म तक सिमट कर रह गया है। शैक्षणिक संस्थाओं में पढ़ाया जाने वाला भी स्तरीय नहीं। विगत की तरह कहानी कहने और सुनने का चलन कहीं खो चुका है। जब घरों में रहने वालों का आपस में ही संवाद न हो तो कहने, सुनने और सुनाने वाले कहां बचेंगे? सिर्फ  करियर पर नजर रहने से हो सकता है कुछ फीसदी लोग भले ही बेहतर रोजगार पा जाएं, लेकिन न ऐसे लोग और न ही वे, जो तथाकथित करियर की दौड़ में पिछड़ जाते हैं, कभी साहित्य के करीब जा पाएंगे।

साहित्य के कितना करीब हिमाचल-10

हिमाचल साहित्य के कितना करीब है, इस विषय की पड़ताल हमने अपनी इस नई साहित्यिक सीरीज में की है। साहित्य से हिमाचल की नजदीकियां इस सीरीज में देखी जा सकती हैं। पेश है इस विषय पर सीरीज की दसवीं किस्त…

अतिथि संपादक : डा. हेमराज कौशिक

विमर्श के बिंदु

* हिमाचल के भाषायी सरोकार और जनता के बीच लेखक समुदाय

* हिमाचल का साहित्यिक माहौल और उत्प्रेरणा, साहित्यिक संस्थाएं, संगठन और आयोजन

* साहित्यिक अवलोकन से मूल्यांकन तक, मुख्यधारा में हिमाचली साहित्यकारों की उपस्थिति

* हिमाचल में पुस्तक मेलों से लिट फेस्ट तक भाषा विभाग या निजी प्रयास के बीच रिक्तता

* क्या हिमाचल में साहित्य का उद्देश्य सिकुड़ रहा है?

* हिमाचल में हिंदी, अंग्रेजी और लोक साहित्य में अध्ययन से अध्यापन तक की विरक्तता

* हिमाचल के बौद्धिक विकास से साहित्यिक दूरियां

* साहित्यिक समाज की हिमाचल में घटती प्रासंगिकता तथा मौलिक चिंतन का अभाव

* साहित्य से किनारा करते हिमाचली युवा, कारण-समाधान

* लेखन का हिमाचली अभिप्राय व प्रासंगिकता, पाठ्यक्रम में साहित्य की मात्रा अनुचित/उचित

* साहित्यिक आयोजनों में बदलाव की गुंजाइश, सरकारी प्रकाशनों में हिमाचली साहित्य

हिमाचल प्रदेश की साहित्यिक संस्थाएं और आयोजन

कुलदीप चंदेल, मो.- 9318508700

 देवभूमि हिमाचल प्रदेश की पर्वत शृंखलाओं से निकलती नदियां हों या मधुर संगीत की स्वर लहरियां बिखेरते झरने हों, ये किसी को भी कवि बना देते हैं। ईश्वर ने इस छोटे से प्रदेश को जिस प्राकृतिक सुंदरता से संवारा है, उससे प्रेरणा लेकर, यहां कई साहित्यिक संस्थाएं संगठित होकर साहित्य साधना में तल्लीन हैं। ये संस्थाएं अपने-अपने क्षेत्र में साहित्य प्रेमियों को संगठित करके उनके भीतर के उद्गार सार्वजनिक करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इन साहित्यिक संस्थाओं में परिवर्तन शिमला, अर्पणा शिमला, नवल प्रयास शिमला, हिमालयन साहित्य संस्कृति पर्यावरण मंच शिमला, क्रिएटिव राइटर एसोसिएशन शिमला, सृजन कला मंच कुनिहार, चौल साहित्य कला परिषद चौल कंडाघाट, हिमोत्कर्ष ऊना, कांगड़ा लोक साहित्य परिषद कांगड़ा, यशपाल साहित्य परिषद नादौन, सर्जक ठियोग, सोम भद्रा संगम संस्कृति अंब, भुट्टिको कुल्लू, सिरमौर कला संगम, शंखनाद मीडिया सिरमौर, बागर साहित्य परिषद मंडी, मांडवां कला मंच मंडी, सुकेत साहित्य परिषद सुंदरनगर, अखिल भारतीय साहित्य परिषद कुल्लू, कहलूर सांस्कृतिक परिषद बिलासपुर, लेखक संघ बिलासपुर, रचना पालमपुर, लाडली फाउंडेशन बिलासपुर, अखिल भारतीय साहित्य संगम, आथर्ज गिल्ड्स कुल्लू, सोलन साहित्य संगम, शिखर, इरावती हमीरपुर, बिनवा साहित्य कला मंच, व्यास सृजन मंच घुमारवीं, भटियात सांस्कृतिक परिषद, इरावती साहित्य व कला मंच बनीखेत, कलम डलहौजी तथा कई अन्य संस्थाएं प्रदेश में साहित्य की भीनी-भीनी ब्यार बहाने में लगी हैं। महिला साहित्यकार संगठन भी अब अलग से सक्रिय हो चले हैं। हिमाचल प्रदेश भाषा और संस्कृति विभाग तथा भाषा कला संस्कृति अकादमी समय-समय पर राज्य स्तरीय कवि सम्मेलन व साहित्यिक संगोष्ठी आयोजित करवाते रहते हैं, जिनमें प्रदेशभर के साहित्यकार अपनी रचनाएं प्रस्तुत करते हैं। बिलासपुर जिला मुख्यालय पर लेखक संघ व कहलूर  सांस्कृतिक परिषद नियमित रूप से मासिक साहित्यिक संगोष्ठी आयोजित करते हैं। बड़े लेखकों, कवियों, गीतकारों की जयंती हो या पुण्यतिथि, ये संस्थाएं बड़ी शिद्दत से इस उपलक्ष्य में कार्यक्रम आयोजित करती हैं। वैसे हिमाचल प्रदेश में साहित्यकारों को एक मंच पर लाने का श्रेय भाषा विभाग के पूर्व निदेशक राकेश कंवर को जाता है। उन्होंने अपने कार्यकाल में सभी जिला भाषा अधिकारियों को आदेश दिए कि वे अपने-अपने क्षेत्र के सभी साहित्यकारों को बुलाकर मासिक संगोष्ठी आयोजित करें। इसका असर यह हुआ कि प्रदेश में साहित्य सृजन का वातावरण बना। नए-पुराने लेखक-कवि एक मंच पर आने लगे और संवाद होने लगा। मीडिया की कवरेज से लेखकों-कवियों की बात दूर तक पहुंचने लगी। इस तरह के साहित्यिक आयोजन लगभग हर जिला में आयोजित होते हैं। दरअसल साहित्य समाज का दर्पण है। हर व्यक्ति साहित्य प्रेमी होता है। उसे अच्छी कहानी, कविता, अच्छा गीत व ग़ज़ल सुनना पसंद है। वह अच्छी-बुरी रचना पर स्वाभाविक रूप से अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त करता है। कहीं अच्छा गीत सुनाई दे रहा हो तो वह साथ में गुनगुनाने लगता है। यदि उसे कुछ पसंद नहीं आए तो वह चुप रहता है। कई लोकप्रिय लोकगीत आम लोग कवियों ने ही रचे हैं। यह समाज का साहित्य अनुरागी होने का एक प्रतिबिंब ही तो है। रही बात प्रदेश की साहित्यिक संस्थाओं की उनके आयोजन की तो यह सब तो हो ही रहा है। कुछ संस्थाएं कभी-कभार किसी कारण यदि ढीली पड़ जाएं तो इसका मतलब यह नहीं कि साहित्य गतिविधियां बंद हो गई हैं। ये तो चलती रहती हैं। संस्थाएं नए रूप में गठित भी हो रही हैं। अपना काम कर रही हैं। भले ही पांच-सात साहित्य प्रेमी ही इकट्ठे होकर अपना लिखा एक-दूजे को सुनाएं। पर सुनाते जरूर हैं। यह एक अच्छा प्रयास है। वर्तमान दौर में जहां साहित्य की गंभीर पत्रिकाएं बाजार से विलुप्त हो गई हैं, वहीं प्रदेश में साहित्यकारों का साहित्य की लौ प्रज्वलित रखे रखना सराहनीय प्रयास है। कई स्थानों पर तो साहित्य की यह ब्यार ग्रामीण क्षेत्रों तक बहती दिखाई देती है। इसके लिए संबंधित क्षेत्र की साहित्यिक संस्थाएं साधुवाद की पात्र हैं। कई बार प्रदेश में कार्यरत महिला मंडल तथा युवक मंडल भी सांस्कृतिक आयोजनों से साहित्य सेवा करने में पीछे नहीं रहते हैं। इन आयोजनों में आसपास के कुछ कवियों को बुलाकर उनसे कविताएं सुनी जाती हैं। इस लेखक को भी कई बार ऐसे आयोजनों में कवि के रूप में जाने का अवसर मिला है। कुल मिलाकर प्रदेश की साहित्यिक संस्थाएं, उनके संगठन तथा आयोजन दिन-प्रतिदिन ख्याति बटोर रहे हैं। वे आम जनता का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, यह सराहनीय प्रयास है।

लेखन का हिमाचली अभिप्राय और प्रासंगिकता

प्रियंवदा

मो.-8219496947

हिमाचल प्रांत अन्य हिंदी भाषी प्रांतों की तुलना में लेखन कौशल में अपना परचम पूर्णरूपेण नहीं फहरा पा रहा है। हालांकि यहां लेखन साहित्य की विभिन्न धाराओं में, विधाओं में काम किया जा रहा है। कारण कई हो सकते हैं, परंतु एक कारण भाषाभिव्यक्ति को भी माना जा सकता है। वास्तव में हिमाचल में जितने जिले हैं, सबकी अपनी-अपनी बोलियां हैं। हर कोई अपनी बोली में साहित्य सृजन करना चाहता है। क्षेत्रीय भाषा के विवाद से ऊपर उठकर, सबको एक सूत्र में पिरोने वाले हिंदी को अपनाकर साहित्य के मार्ग को प्रशस्त किया जाना चाहिए। कई बार लेखकों में परस्पर सामंजस्य का अभाव देखने को मिलता है। नवोदित लेखकों को आगे बढ़ने के शुभ अवसर दिए जाने चाहिएं। लिखते तो बहुत हैं परंतु पढ़ते कितने हैं, यह विचारणीय है। तकनीकी युग के इस समय हर लेखक आत्ममुग्ध अवस्था में अपने लिखे का इतना प्रचार-प्रसार करने में जुटा है कि दूसरों को पढ़ने की आदत नहीं बना पाता। परिणामस्वरूप लेखक तो है, पर पाठक नहीं मिलते। इसके अतिरिक्त कुछ संस्थाएं ऐसी हैं जो केवल कुछ ही लोगों को मौका देती हैं। परिणामस्वरूप संस्थाओं के चहेते चेहरे ही सामने आते हैं। अन्य अच्छा लिखने के बाद भी प्रचारित नहीं हो पाते। चंद्रधर शर्मा गुलेरी व यशपाल जैसे कालजयी लेखक जिस समय थे, उस समय इतने प्रचार-प्रसार के माध्यम नहीं थे जितने आज हैं। उनका लिखा आज भी प्रासंगिक है। लेखन के इस स्तर को प्राप्त करने के लिए अभी भी गहन चिंतन, आत्ममंथन करना होगा। केवल मान-सम्मान पाने के लिए लिखना ही लेखन नहीं हो सकता। सार्थक लेखन के लिए स्वांत सुख के साथ परहित को भी ध्यान में रखा जाए तो भविष्य के लिए अच्छी संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं। इसके लिए प्रत्येक नए लेखक को लेखन संबंधी कौशल की अपेक्षित जानकारी अवश्य रखनी चाहिए। अतिरिक्त जानकारी होने के बाद उसे प्रयोग में लाने के लिए प्रयासरत होना चाहिए। चार भाषा कौशलों (सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना) में लेखन एक महत्त्वपूर्ण कौशल है। इसे जटिल प्रक्रिया और उच्चतर स्तर की क्षमता कहा जाता है। कोई भी साक्षर व्यक्ति लेखन कार्य कर सकता है। परंतु क्या वह अच्छा लेखन कर सकता है, यह विचारणीय है। इसके लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। वास्तव में लेखन चार प्रकार का माना जाता है। एक वर्णनात्मक लेखन जिसमें तथ्यों के आधार पर विषय को लिखा जाता है। दूसरा, विवरणात्मक लेखन में विषय वस्तु की यथास्थिति को स्पष्ट किया जाता है। तीसरा न्यायिक लेखन जो तर्क के आधार पर होता है। जबकि चौथा प्रकार कथा लेखन का है जिसमें कथा या कहानी में पात्रों के आधार पर विषय वस्तु को प्रस्तुत किया जाता है। एक अच्छा लेखक वह होता है जो अच्छा पाठक है। मैथ्यू अर्नाल्ड ने शायद तभी कहा था कि – ‘जिनको आप पसंद करते हैं उन्हें पढ़ें। परंतु उन्हें भी पढ़ें जिन्हें आप पसंद नहीं करते।’ लेखक को लेखन से, शब्दों से, प्रेम होना चाहिए। उसमें कल्पना की उड़ान के साथ धैर्यशीलता भी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। मन की एकाग्रता के बिना तो अच्छा लेखन संभव ही नहीं है। इन सब क्षमताओं के होने पर भी पाठक को ध्यान में रखकर ही लेखन कार्य किया जाना चाहिए। जैसे किस प्रकार के पाठक के लिए लिखा जा रहा है। बच्चों के लिए, बड़ों के लिए, किसी व्यवसाय के लिए या अन्य किसी विषय के लिए। ऐसा करना इसलिए आवश्यक है ताकि उचित शैली का प्रयोग किया जा सके। लेखन की सतत प्रक्रिया को जारी रखने के लिए भी चार सोपानों से होकर गुजरना होता है। ऐसे कितने लेखक हैं जो लेखन के उपरोक्त सोपानों को ध्यान में रखते हैं? यह विचारणीय है। यदि ऐसी गोष्ठियां की जाएं अथवा कार्यशालाएं लगाई जाएं जिसमें समय-समय पर निष्पक्ष होकर विभिन्न विधाओं पर चर्चा-परिचर्चा हो। साहित्य अकादमी तथा भाषा एवं संस्कृति विभाग व अन्य संस्थाएं निष्पक्ष होकर इस दिशा में कार्य करें और प्रत्येक लेखक के लिखे पर चर्चाएं की जाए तो निःसंदेह बेहतर परिणाम देखने को मिलेंगे। इसके अतिरिक्त जो लेखन कार्य में लगे हुए लोग हैं, वे सभी रजिस्टर्ड किए जाएं ताकि सबको मालूम हो कि कितने लोग लेखन कार्य में तत्पर हैं। उनमें से प्रत्येक लेखक को बारी-बारी से बुलाकर उनके लेखन पर चर्चा की जाए। यदि आवश्यक हो तो उनकी रचनाओं में पर्याप्त सुधार किया जाए, साथ ही उनकी रचनाओं को प्रकाशित करवाने में भी सहयोग किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त रजिस्टर्ड लेखक विभिन्न कार्यक्रमों में बारी-बारी से आमंत्रित किए जाएं। उनका यथोचित सहयोग किया जाए, उचित मार्गदर्शन किया जाए, तो लेखक समाज का भला होगा और हिमाचली लेखन के स्तर में निश्चित रूप से सुधार होगा। हिमाचली साहित्य समृद्ध होगा तथा उत्कृष्ट रचनाएं समाज को मिल पाएंगी।

पुस्तक समीक्षा :  हिमाचली संस्कृति को समर्पित काव्य नाटक

जिला कांगड़ा के प्रसिद्ध साहित्यकार पंकज कुमार कश्यप का हिमाचली पहाड़ी काव्य नाटक ‘नीर’ हिमाचली संस्कृति व परिवेश को समर्पित है। पुस्तक ‘नीर’ एक काव्य नाटक है, जिसमें भारत के गौरवमयी इतिहास का अंश, हिमाचल की संस्कृति, मंदिर तथा परिवेश का वर्णन किया गया है। साथ ही इसमें नीर, नारी, वनस्पति तथा प्राकृतिक संपदाओं के संरक्षण का संदेश भी निहित है। कई सम्मानों से सुसज्जित साहित्यकार पंकज कुमार कश्यप ने मात्र दो वर्षों के भीतर 12 किताबें अंग्रेजी, हिंदी व पहाड़ी में लिखकर साहित्य सृजन को बल दिया है। प्रस्तुत काव्य नाटक तीन खंडों में विभाजित है जिसके सूत्रधार अलग-अलग हैं। यह काव्य नाटक जल के साथ हो रहे खिलवाड़ को भी उजागर करता है। लेखक के अनुसार हिमाचली पहाड़ी भाषा में लिखना अपने आप में एक गर्व की अनुभूति के साथ-सात रोमांच भी भर देता है। यश बुक्स पब्लिशर्ज, राजा का तालाब से प्रकाशित यह काव्य नाटक पाठकों को जरूर पसंद आएगा, ऐसी आशा है। इसका मूल्य 399 रुपए है। इसमें अपनी भाषा में सामाजिक सरोकारों की बात की गई है।

दुखद है ‘हंस’ का डिजिटल में सिमट जाना

राजेंद्र राजन

मो.-8219158269

साहित्य के मर्म से

किस्त – 4

देश की शीर्ष व सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ का डिज़िटल फार्मेट में सिमट जाना उन हजारों पाठकों पर वज्रपात से कम नहीं है जो हर माह इसकी मुद्रित प्रति का बेसब्री से इंतजार करते थे। ठीक उसी तरह जैसे 50 साल पहले पाठक धर्मयुग या सारिका के लिए आंखें बिछाए रहते थे। मेरी मेल पर ‘हंस’ के अप्रैल, मई व जून के डिज़िटल अंक पहुंचे। इसलिए चूंकि मैं उसका सदस्य हूं। जून अंक में हंस की प्रबंधक रचना यादव का संपादकीय, ‘कुहासा छंटने तक’ पढ़ने के बाद मन विचलित हुआ। वे लिखती हैं, ‘1986 में शुरू हुई ‘हंस’ के 34 साल में 402 अंक छपे। लेकिन लॉकडाउन के कारण पत्रिका मुद्रित रूप में नहीं आ पाई। ‘हंस’ भी इस नई चुनौती को नहीं झेल पाई। माहौल गंभीर है। पत्रिकाओं का भविष्य धुंधला नजर आ रहा है। पाठक वर्ग सिकुड़ गया है। पाठक पत्रिका को हाथ में महसूस करना चाहता है। हम छाप भी दें तो वितरण कैसे होगा? विक्रेता अपनी दुकानें बंद करके चले गए हैं। ‘हंस’ के पंख काटना, अपनी हार को पंख देना है। हंस का मेल बाक्स हार्ड कॉपी के आग्रह से भर गया है।’ अप्रैल अंक में ‘पाखी’ के पूर्व संपादक व कथाकार प्रेम भारद्वाज के निधन के बाद उन्हें अल्पना मिश्र और गीताश्री ने याद किया। पाखी ने तो समूचा जून अंक प्रेम भारद्वाज की स्मृति में ही छाप दिया। अल्पना लिखती हैं, ‘अपने संपादकीय उन्होंने आत्मा की स्याही में उंडेल कर लिखे। प्रेम के संपादकीयों के बारे में ‘हंस’ के संपादक ने कहा था, ‘‘दुनिया मेरे संपादकीय का इंतजार करती है और मैं प्रेम के संपादकीय का इंतजार करता हूं। कमाल लिखता है।’ ‘मौत के पार होना जीवन का’ में अल्पना लिखती हैं, ‘यह हिंदी समाज का पिछड़ापन है कि वह अक्सर ही अपने बड़े लेखकों, संपादकों की कद्र नहीं कर पाता। बल्कि उन्हें अपमान, तिरस्कार, उपेक्षा, बहिष्कार के यातनागृह में ढकेलता है, उन्हें कुचल कर स्वार्थ के भवन खड़ा कर लेना चाहता है। अप्रैल अंक में ही कालम ‘मुड़-मुड़ के देख’ में भीष्म साहनी की कहानी ‘खुशबू’ पढ़ी तो जून अंक में ‘भेडि़ए’ जैसी कालजयी कहानी लिखने वाले भुवनेश्वर की कहानी ‘सूर्यापूजा’ छपी। यह प्रेमचंद के संपादन में आरंभ हुई पत्रिका ‘हंस’ (बनारस) 1939 के एक अंक में छपी थी। प्रेमचंद की ‘हंस’ को करीब 45 साल बाद 1986 में राजेंद्र यादव ने पुनर्जीवित किया था। मई अंक में अनेक बेहतरीन कहानियों का समावेश है तो युवा लेखिका प्रकृति कगरेती की कहानी ‘बेईग मशीन पर खड़ा मिस्टर जॉन’ अपने विरल से कथानक, शिल्प और भाषा के बल पर ध्यान खींचती है। मई अंक में ही जितेंद्र भाटिया का महत्त्वपूर्ण लेख है, ‘महामारी, प्रकृति और सृजन’। लोग कहते हैं महामारी के बाद हुई सफाई, मनुष्यों की तालाबंदी और प्रदूषणकारी गौंडोला नावों के थमने के बाद वेनिस की नहरों का पानी बरसों के बाद फिर से साफ दिखने लगा है, वहां मछलियां फिर से लौट आई हैं और पता नहीं, कितने दशकों बाद लोगों में वहां हंस और प्रकृति हितैषी डोलफिन तैरते और छलांगें लगाते देखे हैं। मार्को पोलो के तेरहवीं सदी के उपन्यास ‘इनविज़िवल सिटीज’ के बहाने लेखक अपने शहरों में वेनिस को तलाशने लगता है। हम ढूंढते हैं अपने सपनों का वह अप्राप्य शहर जो है भी है और नहीं भी है। यह उपन्यास वेनिस ही नहीं दुनिया के तमाम शहरों का अंतर्मन है। ‘हंस’ के जून अंक में ‘पहल’ के संपादक ज्ञानरंजन की एक कहानी छपी है, ‘मृत्यु’। कई दशकों बाद ज्ञानरंजन की कोई नई कहानी पढ़ने की मिली। राजेंद्र यादव की तरह 40-50 साल से उनका भी लिखना छूट गया था। कहानी का कथानक नेपाल के टालीगंज से होते हुए आजादी से पूर्व की दिल्ली तक पहुंचता है जहां सामबहादुर और लेखक एक गुमटी में चाय बेचने को मजबूर हैं। फटेहाल, लावारिसों सी जिंदगी जीने को मजबूर। दोनों जाड़े में एक ही फटे पुराने कंबल से हाड़ कंपा देने वाली ठंड से लड़ते-भिड़ते हैं, लेकिन सामबहादुर मर जाता है। आजादी की सुबह को देखे बगैर ही। कोरोना जैसी महामारी में भी अभावग्रस्त जिंदगी का दंश झेल रहे मजदूर भुखमरी, हताशा व अवसाद से मर रहे हैं। इसे पढ़कर मुझे प्रेमचंद की कालजयी कहानी ‘पूस की रात’ की याद हो आई। ‘हंस’ के व्यवस्थापक व संपादक जिस मानसिक यातना से गुजर रहे हैं, उससे अधिक पीड़ा उन पाठकों की है जो 34 साल से इसे सीने से लगाए हुए इसके पन्नों पर चमकते शब्दों की खुशबू को अपने भीतर महसूस करते रहे। राजेंद्र यादव ने अपने करीब 30 साल के संपादन में ‘हंस’ पत्रिका को एक बड़े और व्यापक आंदोलन के रूप में खड़ा किया। स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के माध्यम से महिलाओं व दलितों को समाज में सम्मानजनक व गरिमापूर्ण स्पेस अर्जित करने में उन्होंने अविस्मरणीय पहल की। यादव जी ने उदय प्रकाश की खूब लंबी कहानियां-‘और अंत में प्रार्थना’ और ‘दिल्ली की दीवार’ जैसी खूब लंबी-लंबी कहानियां छापकर हिंदी कथाकारों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार की जो नई कहानी आंदोलन के आदर्शवादी खोल से बाहर आकर जन सरोकारों से जुड़ी पीढ़ी। ‘हंस’ में ही मनाली की छद्म लेखिका स्नोवा वार्नो की कहानियां भी छपीं, जिसके वास्तविक लेखक कोई और थे जो बाद में बेपर्दा हुए। ‘हंस’ ने नित नए विवादों को जन्म दिया और यादव जी बार-बार अंधभक्त राष्ट्रवादियों के निशाने पर आते रहे। कड़ी आलोचनाओं के बावजूद ‘हंस’ की लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई और देशभर में उसके पाठकों की संख्या में लगातार इजाफा होता रहा।

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