Monday, November 30, 2020 04:18 AM

भाजपा की नई सोशल इंजीनियरिंग

सुजय कपिल

पत्रकारिता शोधकर्ता

सभी को चकित करते हुए एक नई सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत भाजपा ने कर दी। राजपूत-दलित वोट बैंक को पक्का करने के लिए की गई राजनीति में भाजपा ने हिमाचल की लगभग 58 फीसदी आबादी को अपने साथ लाने की कोशिश की है। यदि यह प्रयास सफल रहा तो ऐसा अभेद्य वोट बैंक बनेगा कि 2022 में पुनः भाजपा सत्ता में आकर एक नया इतिहास रच देगी। कांग्रेस भी राजपूत समुदाय को अपने साथ जोड़े रखने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही…

हिमाचल प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में दोनों राजनीतिक दल, जो बारी-बारी से सत्तासीन होते रहे हैं, उन्होंने अपने-अपने जातिगत और क्षेत्रीय समीकरण बांधे हैं। हिमाचल की राजनीति में जाति से अधिक क्षेत्र की राजनीति का महत्त्व रहा है। फिर भी ‘बिन जाति न राजनीति’ वाली बात भी हिमाचल पर सटीक बैठती है। प्रदेश की राजनीति में यदि पीछे मुड़कर देखें तो यहां पर हमेशा राजपूत समुदाय का वर्चस्व रहा है। 1952 में हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बनने वाले डा. यशवंत सिंह परमार राजपूत ही थे। इनके उपरांत वीरभद्र सिंह तथा ठाकुर रामलाल मुख्यमंत्री बने जो इसी समुदाय से थे। भारतीय जनता पार्टी से दो बार ब्राह्मण समुदाय के शांता कुमार मुख्यमंत्री बने, परंतु कभी भी अपना कार्यकाल पूरा न कर सके। भाजपा के प्रेम कुमार धूमल हमीरपुर जिला से ताल्लुक रखने वाले क्षत्रिय हैं तथा दो बार मुख्यमंत्री बने और अपना कार्यकाल पूरा करने में सफल भी रहे। तीसरी बार भी धूमल मुख्यमंत्री बनते, परंतु 2017 के विधानसभा चुनावों में अपनी परंपरागत सीट हमीरपुर की जगह सुजानपुर से चुनाव लड़ा और कांग्रेस के राजेंद्र राणा से हार गए। भाजपा ने चुनावी जीत के बाद जयराम ठाकुर को मुख्यमंत्री चुना जो राजपूत समुदाय से हैं। हिमाचल में राजपूत समुदाय लगभग पूरे प्रदेश में पाया जाता है।  चाहे पहाड़ी क्षेत्र हो या मैदानी क्षेत्र, राजपूतों की संख्या हर क्षेत्र में है। चुनावों में नेतृत्व की भूमिका कांग्रेस-भाजपा दोनों में यही निभाते हैं।

अन्य पिछड़ा वर्ग प्रदेश के सबसे अधिक जनसंख्या तथा 15 विधानसभा सीटों वाले जिला कांगड़ा के चुनावी समीकरण में निर्णायक भूमिका निभाता है। जिस तरफ  अन्य पिछड़ा वर्ग का वोट जाता है, वही कांगड़ा जीतता है और कहते हैं कि ओकओवर का  रास्ता कांगड़ा से ही होकर जाता है। कांगड़ा के अतिरिक्त जिला ऊना तथा हमीरपुर में भी अन्य पिछड़ा वर्ग चुनावी गणित का अहम हिस्सा है।

अनुसूचित जनजाति के लिए किन्नौर, लाहौल-स्पीति तथा भरमौर की सीटें आरक्षित हैं। परंतु गद्दी जनजातीय समुदाय चुनावी दृष्टि से कांगड़ा-चंबा जिलों में लगभग दस सीटों पर एक साथ जिस ओर वोट देगा, जीत का परचम वहीं लहराएगा। एक तबका जिसे साधने की कोशिश भाजपा-कांग्रेस कर रहे हैं, वह हिमाचल प्रदेश का दलित समुदाय है। प्रदेश की जनसंख्या में 25.22 फीसदी हिस्सेदारी होने के बावजूद दलित राजनीति हाशिए पर रही। आज तक हिमाचल प्रदेश को इस समुदाय से मुख्यमंत्री नहीं मिला। कांग्रेस पार्टी में सिरमौर से एक समय दिग्गज नेता गंगूराम मुसाफिर, डा. प्रेम तथा मंडी के रंगीला राम राव दलित वर्ग का प्रतिनिधत्व करते थे। पर समय का फेर ऐसा हुआ कि गंगूराम मुसाफिर और रंगीला राम राव लगातार विधानसभा चुनाव हारकर अब अपनी राजनीतिक पारी के अंत की ओर पहुंच चुके हैं। वहीं रेणुका जी से सात बार विधायक रहे डा. प्रेम की मृत्यु हो चुकी है। अब उनके पुत्र विनय कुमार रेणुका जी से विधायक हैं। भाजपा में दलित वर्ग का नेतृत्व पूर्व मंत्री स्वर्गीय ईश्वर दास धीमान करते थे। इस समय भाजपा का दलित वर्ग को लुभाने वाला चेहरा हैं शिमला लोकसभा सीट से सांसद सुरेश कश्यप जो प्रदेशाध्यक्ष भी हैं। सरकार में स्वास्थ्य मंत्री डा. राजीव सहजल इस समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। ब्राह्मण समुदाय जो कुल जनसंख्या का 18 फीसदी है, वह अब तक  प्रदेश  को शांता कुमार के रूप में एक असरदार नेतृत्व दे चुका है। जब हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तब दो बार (1977 तथा 1992) शांता कुमार मुख्यमंत्री बने। इसके अतिरिक्त शांता कुमार कांगड़ा-चंबा लोकसभा सीट से सांसद, राज्यसभा सांसद और केंद्रीय मंत्री भी रहे हैं। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में वर्ष 1998 में ज्वालामुखी में भाजपा की अंदरूनी लड़ाई खुले में आने का सबसे बड़ा नुकसान शांता कुमार को हुआ। वर्ष 1998 में जब हिमाचल विकास कांग्रेस के साथ भाजपा ने गठबंधन सरकार बनाई, तब मुख्यमंत्री की कुर्सी प्रेम कुमार धूमल को मिली। इसके बाद शांता कुमार प्रदेश की राजनीति में अस्त की ओर बढ़ गए। शांता कुमार फिर कभी मुख्यमंत्री नहीं बने। साथ ही ब्राह्मण समुदाय के लिए भी एक तगड़ा राजनीतिक झटका था। जयराम ठाकुर का मुख्यमंत्री बनना राजपूत समुदाय के प्रभाव को दर्शाता है।

2017 के विधानसभा चुनावों में 48 सामान्य श्रेणी की सीटों पर 33 विधायक राजपूत हैं। पार्टी के अंदर और विपक्ष के अपने विरोधियों को मात देते हुए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर तथा भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए एक नई सोशल इंजीनियरिंग कर दी। राजनीतिक विश्लेषकों की सोच के विपरीत शिमला से लोकसभा सांसद  सुरेश कश्यप को भाजपा प्रदेशाध्यक्ष बना दिया। उम्मीद जताई जा रही थी कि भाजपा राजपूत चेहरा और ब्राह्मण परछाई यानी राजपूत मुख्यमंत्री तथा ब्राह्मण प्रदेशाध्यक्ष का गठजोड़ करेगी। इससे पूर्व हिमाचल भाजपा अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती भी राजपूत ही थे, इसलिए नैनादेवी से पूर्व विधायक रणधीर शर्मा और राज्यसभा सांसद इंदु गोस्वामी इस बार प्रबल दावेदार माने जा रहे थे। इसके अतिरिक्त डा. राजीव बिंदल को पुनः प्रदेशाध्यक्ष बनाए जाने की उम्मीद भी की जा रही थी। परंतु सभी को चकित करते हुए एक नई सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत भाजपा ने कर दी। राजपूत-दलित वोट बैंक को पक्का करने के लिए की गई राजनीति में भाजपा ने हिमाचल की लगभग 58 फीसदी आबादी को अपने साथ लाने की कोशिश की है। यदि यह प्रयास सफल रहा तो ऐसा अभेद्य वोट बैंक बनेगा कि 2022 में पुनः भाजपा सत्ता में आकर एक नया इतिहास रच देगी। कांग्रेस भी राजपूत समुदाय को अपने साथ जोड़े रखने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही। एक ओर कांग्रेस में छह बार के मुख्यमंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री वीरभद्र सिंह तथा प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप राठौर भी राजपूत ही हैं। ब्राह्मण चेहरे के रूप में नेता विपक्ष मुकेश अग्निहोत्री हैं। परंतु शांता कुमार और सुखराम की पारी समाप्ति के बाद यह ब्राह्मण समुदाय के लिए सांत्वना मात्र प्रतीत होता है।

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