Tuesday, August 11, 2020 07:02 AM

पूर्व सैनिक लीग के प्रदेश अध्यक्ष मेजर मनकोटिया बोले, भारत को ग्लोबल मिलिट्री पावर बनाने की जरूरत

धर्मशाला – पूर्व मंत्री और भारतीय पूर्व सैनिक लीग के प्रदेश अध्यक्ष मेजर विजय सिंह मनकोटिया ने कहा कि चीन को केवल शसक्त सैन्य ताकत से ही मात दी जा सकती है। उन्होंने कहा 1962 में जो गलतियां नेहरू सरकार ने की थीं, उसमें वर्तमान सरकारें कोई विशेष सुधार नहीं कर पाई हैं। धर्मशाला में शुक्रवार को श्री मनकोटिया ने कहा कि उन्होंने चीन के साथ निपटने के लिए एक सात पेज का खुला पत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम भेजा है, जिसमें अनेक सुझाव दिए गए हैं। विजय सिंह मानकोटिया ने कहा कि आखिर क्या कारण है कि 60 साल में हम चीन का पूर्ण रूप से मुकाबला करने को तैयार नहीं हो पाए। हम छतों पर चढ़कर अपने आप को ग्लोबल इक्नोमिक पावर कहते हैं। दुनिया में हम आर्थिक शक्ति के रूप में तो उभरे हैं, लेकिन अभी तक ग्लोबल मिलिट्री पावर नहीं बन पाए हैं। हमें ग्लोबल मिलिट्री पावर बनना बहुत जरूरी है। मेजर मनकोटिया जो 1962 में चीन के साथ लड़ाई लड़ चुके हैं, ने कहा कि 1962 की लड़ाई में भारतीय सैनिकों का कोई सुखद अनुभव नहीं रहा था। चीन ने जवाहरलाल नेहरू के समय हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा देकर बाद में पीठ पर छूरा घोंपा था, लेकिन उसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मानकर जो गलती की, उसे हम आज तक नही सुधार पाए हैं। वर्तमान प्रधानमंत्री ने भी उनके साथ संबंध बनाने के प्रयास किए, लेकिन चीन ने फिर उसी  इतिहास को दोहाराया और भारत की जमीन को हथियाने का असफल प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि अगर नेहरू के समय से ही और उसके बाद भारत सरकारें तिब्बत को एक स्वतंत्र राष्ट्र कहने की हिमाकत करतीं, तो चीन की आज यह हिम्मत न होती। उन्होंने कहा कि सबसे पहले हमें अपनी सेना को इतना मजबूत बनाना होगा कि कोई इसके सामने हमारी जमीन पर नजर डालने की हिम्मत न कर सके। श्री मनकोटिया ने कहा कि ब्यूरोक्रेसी को भी एक साल कंपल्सरी आर्मी ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। गलवान घाटी में जो हुआ, वह वास्तव में दुखद है। यह सही है कि जानवरों व चीनियों में कोई फर्क नहीं है। इस झड़प के दौरान जो हमारे देश के जवान शहीद हुए हैं, उनको हम नमन करते हैं। हमारे सैनिकों ने चीनियों को माकूल जवाब दिया। अपनी जान पर खेल कर उनको आगे बढ़ने नहीं दिया। मेजर ने कहा पहले देश का रक्षा बजट भारी भरकम होता था, लेकिन वह राशि वास्तव में इस दिशा में खर्च ही नहीं हो पाती थी। यूपीए सरकार में तो रक्षा सौदों में दलाली तक हुई है। इसमें बड़े-बड़े नाम शामिल रहे हैं।

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