बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर

धर्मनगरी हरिद्वार के मंदिरों में सावन शुरू होते ही भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। जगह-जगह भोले के भक्त जलाभिषेक करते हैं। हरिद्वार के बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर को आदिकाल से ही भोलेनाथ धाम के रूप में जाना जाता है। भगवान शिव के जीवन से जुड़ी कई कथाओं में हरिद्वार का जिक्र प्रमुखता से होता है। बाबा भोलेनाथ ने समुद्र मंथन से निकला विष पीकर हमें अमृत प्रदान किया है। उसी प्रकार श्रावण का महीना भी रस से भरा है, जो हमें वर्षा की बूंदों के रूप में जल देकर हमारे भीतर जीवन का संचार करता है।

इस मास में प्रकृति का अलग ही नजारा देखने को मिलता है। भू-मंडल में चारों ओर हरे-भरे पत्ते, नई कोपलें आती हैं। नदी, नाले, कूपों में जल भर जाता है। मानो पृथ्वी भी तृप्त होकर हरी ओढ़नी ओढ़ आनंद से झूमने लगती है। ऐसा ही भगवान शिव का प्रिय रमणीय स्थल है हरिद्वार के पास स्थित बिल्व पर्वत। यहां मां पार्वती ने कठोर तप के बल पर भगवान शिव को पति रूप में पाया था। भोले बाबा को एक नहीं दो बार इस पवित्र स्थल पर अपनी अर्द्धांगिनी की प्राप्ति हुई थी। प्रथम बार दक्षेश्वर के राजा दक्ष की पुत्री सती के रूप में और दूसरी बार हिमालय राज के घर पार्वती के रूप में। देव ऋषि नारद के कहने पर हरिद्वार से पश्चिम में हर की पौड़ी से कुछ दूरी पर स्थित बिल्व पर्वत पर आकर देवी पार्वती ने कठोर तप किया था।

आज इस स्थान पर बिल्वकेश्वर महादेव का प्रतिष्ठित मंदिर स्थित है। भोले बाबा शेषनाग के नीचे लिंग रूप में विराजते हैं। मान्यता है कि देवी पार्वती इस स्थान पर बेलपत्र खाकर अपनी भूख शांत करती थी। उनकी प्यास को बुझाने के लिए ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से गंगा की जलधारा प्रकट की थी। आज के समय में यह स्थान बिल्वकेश्वर मंदिर से करीब 50 कदम की दूरी पर गौरी कुंड के नाम से विख्यात है। जानकार कहते हैं कि मां पार्वती तप के दौरान इसी गौरी कुंड में स्नान करती थीं और इसी कुंड के जल को ग्रहण करती थीं। आज गौरी कुंड में स्नान करने के लिए भक्त दूर-दूर से आते हैं। सावन और मकर संक्रांति पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। इस स्थल पर आने वाला भोलेभंडारी से मुंह मांगा वर प्राप्त करता है। कुंवारी कन्याएं अभिषेक करने के बाद बेलपत्र चढ़ाएं तो उन्हें मन पसंद जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। जो भी जातक प्रेम और श्रद्धा भाव से बिल्वकेश्वर महादेव पर केवल बेलपत्र अर्पित कर दे, उसे 1 करोड़ साल तक मिलता है स्वर्ग के ऐश्वर्य भोगने का सुख। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर में दो बार होता है भोले बाबा का पूजन। प्रातः 5 बजे गौरी कुंड से पवित्र जल लाकर शिवलिंग का जलाभिषेक किया जाता है। फिर उनके गले के हार नाग देवता को प्रतिष्ठित कर शृंगार किया जाता है।  बिल्व पर्वत का सारा वातावरण सदा शिवमय रहता है। इस बार कोरोना संक्रमण के कारण सभी मंदिरों में श्रद्धालुओं को जाने की अनुमति नहीं है।

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