Tuesday, June 15, 2021 11:20 AM

महामारी के बीच कालाबाजारी पर रोक लगे

बिल गेट्स और मिलिंडा गेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट जैसी दैत्याकार कंपनी का नेतृत्व किया है। लोगों को समझना और उन्हें अपनी बात समझाना उन्हें खूब आता है। इसके बावजूद वे अपने जीवन साथी को ही अपनी बात नहीं समझा पाए। इसका एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण है। जब हम अपने किसी कर्मचारी से बात करते हैं तो हम औपचारिकता का ध्यान रखते हैं। आपसी रिश्तों में इसकी जरूरत नहीं महसूस होती और अक्सर हम जाने-अनजाने अपने साथी की भावनाएं आहत कर बैठते हैं...

हम सब इस बात के गवाह हैं कि ब्रिटेन के राजकुमार प्रिंस चार्ल्स से शादी करके शाही घराने की बहू बन जाने के बाद भी डायना खुश नहीं रहीं और न केवल उनका तलाक हुआ बल्कि विवाद भी दुनिया के सामने आया। कुछ साल पहले संपत्ति के बंटवारे को लेकर रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के मालिक दो सगे भाइयों मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी का तमाशा भी अखबारों की सुर्खियां बना रहा। एमेजॉन के मालिक जेफ बोजेस ने कस्टमर रिलेशनशिप पर बड़े-बड़े लेख लिखे जो दुनिया भर में सराहे गए। रिलेशनशिप की बातें करने वाले इस महागुरू का अपना वैवाहिक जीवन दो साल पहले टूट गया, वह भी तब जब जेफ बोजेस दुनिया के सर्वाधिक अमीर व्यक्ति हैं। दुनिया भर में अमीरी की पायदान में दूसरे स्थान पर एलेन मस्क और तीसरे स्थान पर बर्नाड अर्नाल्ट हैं। इस सप्ताह के पहले ही दिन, यानी सोमवार 3 मई को दुनिया के चौथे सबसे अमीर व्यक्ति बिल गेट्स के तलाक की घोषणा हुई है। बिल गेट्स और मिलिंडा गेट्स ने अलग-अलग ट्वीट करके दुनिया को अपने इस फैसले की जानकारी दी। अलगाव की इन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का क्या मतलब है? एक, पैसा खुशी नहीं दे सकता, सुख दे सकता है, सुविधा दे सकता है, खुशी नहीं दे सकता। दो, पैसा होने के बावजूद दसियों नौकरों और हजारों कर्मचारियों के बावजूद, सभी संपर्कों और अथाह धन के बावजूद हमारे रिश्तों में दरार आ सकती है। क्या इसका कोई इलाज है? जी हां, है। बिलकुल है। इसे कारपोरेट भाषा में सहृदय पूंजीवाद कहा गया, व्यक्तिगत जीवन में मैं इसे सहृदय समृद्धिवाद कहता हूं।

 कंपैशनेट वैल्दीनेस, यानी वो समृद्धि जो दुनिया का भला करने के बारे में सोचे, वो समृद्धि जो अपने आसपास के लोगों के दुख-दर्द में शामिल हो, वो समृद्धि जो अपने आसपास के लोगों के प्रति संवेदनशील हो। सहृदय समृद्धिवाद या कंपैशनेट वैल्दीनेस से मेरा मतलब यह है कि व्यक्ति को इतना हुनरमंद होना चाहिए कि वह अपनी जरूरतें पूरी कर सके, अपनी सुख-सुविधाओं का इंतज़ाम कर सके और उसके बावजूद समाज के भले के लिए भी उसके पास साधन हो। पैसा बुरा नहीं है। पैसा जीवन की सच्चाई है। पैसे से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। हमें इतना शिक्षित होना, इतना हुनरमंद होना ही चाहिए कि हम गरीबी और अभावों से परेशान न हों। सांस अंदर लेंगे तभी तो सांस बाहर छोड़ेंगे। धन होगा तभी तो किसी दूसरे को दे सकेंगे, उसके लिए पहले खुद समृद्ध होना आवश्यक है। ध्यान सिर्फ यह रखना है कि जीवन में हमारा उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना ही न रह जाए, जीवन उससे पहले आए, परिवार उससे पहले आए, हम खुद उससे पहले आएं। लेकिन यह सिर्फ  एक पहलू है। एक दूसरा पहलू इससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। एक लड़की जब किशोरी होती है तो उसकी सोच शिक्षा और अपने माता-पिता और भाई-बहनों तक सीमित होती है। युवा हो जाने पर वह करिअर के बारे में भी सोचने लगती है। शादी हो जाने पर वही लड़की जब बहू बनती है तो उसकी विचारधारा में बड़े परिवर्तन आते हैं। पहली बार मां बनने के बाद उसके विचार कुछ और बदलते हैं। चालीस-पैंतालीस की उम्र पर विचारों में फिर परिवर्तन आता है और सास बन जाने पर सोच एक बार फिर बदलती है। एक ही लड़की के जीवन में अलग-अलग स्थितियों में विचारधारा में परिवर्तन होता है। जरूरतें बदल जाती हैं तो सोच भी बदल जाती है। अक्सर हम यह नहीं समझ पाते कि एक ही व्यक्ति इतना क्यों बदल गया, क्योंकि हम इस बात पर ध्यान नहीं देते कि समय के साथ-साथ जरूरतें बदली हैं तो सोच भी बदलेगी ही। रिश्तों में गड़बड़ी की शुरुआत यहीं से होती है। बिल गेट्स और मिलिंडा गेट्स का तलाक मशीनी सोच की असफलता का जीता-जागता प्रमाण है।

 बिल गेट्स माइक्रसॉफ्ट के सह-संस्थापक हैं। मिलिंडा गेट्स उन्हीं की कंपनी में मैनेजर थीं। काम के सिलसिले में एक मीटिंग के दौरान बिल गेट्स को मिलिंडा पसंद आ गईं और फिर दोनों में इस विषय पर बातचीत हुई। दोनों ने अपने-अपने सपनों की बात की और यह पाया कि उनके सोचने का तरीका, भविष्य के जीवन के बारे में सोचने का तरीका मिलता-जुलता है और वे आदर्श दंपत्ति हो सकते हैं। इस मनोवैज्ञानिक और मैनेजीरियल एक्सरसाइज़ के बाद दोनों विवाह बंधन में बंध गए। उनका विवाह 27 साल चला और 27 साल के बाद जब उन्हें यह महसूस हुआ कि अब दोनों की जरूरतें बदल गई हैं, सोचने का तरीका बदल गया है, सपने बदल गए हैं तो दोनों ने अलग होने का निर्णय ले लिया। यह कोई अचानक नहीं हो गया है। दुनिया को इसकी खबर अचानक लगी है, पर रिश्ते एक रात में नहीं सूख जाते। उनमें धीरे-धीरे गर्माहट कम होती चलती है और आरामदायक गर्माहट के बजाय निराशा, हताशा और गुस्से की आग भरनी शुरू हो जाती है। परिणाम यह होता है कि एक दिन दोनों यह समझ जाते हैं कि उनका रिश्ता अब उन पर बोझ है। बिल गेट्स और मिलिंडा गेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट जैसी दैत्याकार कंपनी का नेतृत्व किया है। लोगों को समझना और उन्हें अपनी बात समझाना उन्हें खूब आता है। इसके बावजूद वे अपने जीवन साथी को ही अपनी बात नहीं समझा पाए। इसका एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण है। जब हम अपने किसी कर्मचारी से बात करते हैं, वरिष्ठ अधिकारी से बात करते हैं, ग्राहक से बात करते हैं या किसी अनजान व्यक्ति से बात करते हैं तो हम औपचारिकता का ध्यान रखते हैं। आपसी रिश्तों में औपचारिकता की आवश्यकता नहीं महसूस होती और अक्सर हम जाने-अनजाने अपने साथी की भावनाएं आहत कर बैठते हैं।

 और ऐसा जब लंबे समय तक चलता है तो कहानी तलाक पर जाकर खत्म होती है। अक्सर हम यह नहीं समझ पाते कि सामने वाले को हमारे शब्दों से भी ज्यादा चोट हमारी टोन और हमारे हाव-भाव ने पहुंचाई है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि हमारे शब्दों का असर होता है, शब्दों के चुनाव से फर्क पड़ता है, पड़ता ही है, पर उससे कहीं ज्यादा फर्क इस बात से पड़ता है कि बोलते समय हमारी टोन कैसी थी, उसमें व्यंग्य था, गुस्सा था, हिकारत थी या प्यार था। इसी तरह बोले गए शब्दों से भी ज्यादा फर्क इस बात से पड़ता है कि जो कह रहे हैं, उसे कहते हुए हमारे हाव-भाव कैसे थे। हमारी बॉडी लैंग्वेज और हमारी टोन, इनका असर बहुत गहरा है। शब्दों से भी ज्यादा। अफसोस की बात यह है कि आपसी रिश्तों में हम इसी बात का ध्यान नहीं रखते और स्थिति विस्फोटक होती चलती है, परिणामस्वरूप जब ज्वालामुखी फटता है तो सारा लावा जब बाहर निकलता है रिश्ते चटक जाते हैं। तोल-मोल के बोल का महत्त्व इसीलिए है। यहां कोई गुणा-भाग नहीं चलता, गणित नहीं चलता, भावनाएं चलती हैं। इसलिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि हम तोल-मोल कर बोलें ताकि रिश्तों की गर्मी बरकरार रहे और जीवन शांतिपूर्ण बना रहे।

संपर्क :

पी. के. खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

 ईमेलः [email protected]

आज यदि भारत का हर व्यक्ति कालाबाज़ारी और जमाखोरी छोड़ दिल से अपने देशवासियों की कोरोना से जान बचाने  में अपना सहयोग देगा तो मात्र 2 से 3 महीनों में पूरा देश कोरोना मुक्त हो जाएगा...

कोरोना महामारी के दूसरे कहर ने पूरे देश को झकझोर दिया है। हर तरफ  डर का साया फैला हुआ है। आदमी आदमी से दूर हो गया है। इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि यहां जीने के लिए भी सांसें खरीदनी पड़ रही हैं। हमारे इस देश के हर शहर व कस्बे में ऑक्सीजन की भी कमी का शोरोगुल मचा है। चारों तरफ  ऑक्सीजन के लिए मारामारी इतनी बढ़ गई है कि हर कोई सरकार को सवालों के घेरे में लेना चाहता है। देश में ऑक्सीजन की समस्या को लेकर अपने देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी भारत को इस किल्लत को लेकर खरी-खोटी सुनाई जा रही है। पहले जहां वैक्सीन को लेकर भारत की हर जगह तारीफ  हो रही थी, वहीं आज न्यूयॉर्क टाइम्स में भी ऑक्सीजन की कमी से हो रही भारतीयों की दयनीय दशा पूरे विश्व को दिखाई जा रही है जिससे सरकार ही नहीं, अपितु पूरे देश और देशवासियों को विदेशी जिल्लत का सामना करना पड़ रहा है। हमारे देश के राज्यों दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तर प्रदेश या हिमाचल, सभी को भीतर से झकझोरने वाली खबरें मिल रही हैं। इस संबंध में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने भी साफ-साफ शब्दों में कहा कि भारत में ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है और प्रत्येक राज्य को ऑक्सीजन की भरपूर पूर्ति की जा रही है। इन सारी स्थितियों और परिस्थितियों के अंतर्गत सवाल यह उठता है कि अब सरकार पर विश्वास किया जाए तो समस्या कहां से उत्पन्न हो रही है? इसका उत्तर जानने के लिए कुछ परिचित व्यक्तियों के कुछ अनुभव आपके समक्ष रखूंगी जिसके बाद मुझे विश्वास है कि आपकी अंतरात्मा ही आपको सब सवालों के जवाब दे देगी।

 अभी जनवरी में एक परिचित बड़े व्यवसायी की पत्नी को कोरोना हो गया जिनके फेफड़ों में ज्यादा संक्रमण की वजह से उनकी जान चली गई। उनके सभी मित्रों ने उनकी पत्नी की मृत्यु से प्रभावित होकर ऑक्सीजन सिलेंडर अपने घर रख लिए ताकि भविष्य में ऐसी समस्या उनके साथ पेश न आए। यह एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक बड़े तबके की बात है जिन्होंने पैसे के दम पर 1-2 नहीं, बल्कि 4-5 ऑक्सीजन सिलेंडर अपने घर पर खरीद कर रख लिए हैं। सोचने का विषय यह है कि ऐसा अगर पांच से आठ लाख लोगों ने भी किया होगा तो कितनी जमाखोरी हो गई होगी? ऐसे में ऑक्सीजन सिलेंडर के उपलब्ध न होने पर केवल सरकार जिम्मेदार है या इन व्यक्तियों का स्वार्थ भी जिम्मेदार है जिन्हें केवल अपनी और अपने परिवार की चिंता है। यह सोचना सहज़ भी है क्योंकि पहले लॉकडाउन में भी इन लोगों ने केवल सालभर का राशन घर में भर कर गरीब को भूखा मरने के लिए छोड़ दिया था। दूसरा अनुभव एक मित्र ने साझा किया था जिसका कोई परिचित प्राइवेट अस्पताल में भर्ती था क्योंकि सरकारी अस्पताल में जगह नहीं थी। उसे भी ऑक्सीजन की जरूरत थी और साथ में डॉक्टर ने किसी टीके का नाम लिखा था जिनमें से दोनों चीज़ें अस्पताल में उपलब्ध नहीं थी। एक तरफ  समय के साथ-साथ व्यक्ति की तबीयत ख़राब हो रही है जिससे उस व्यक्ति के परिवार के साथ-साथ वहां के मरीज़ भी घबराने शुरू हो गए हैं। जो ठीक होने की कगार पर है, वह डर कर ही जान गंवा रहा है। ऐसी स्थिति में अस्पताल का ही कोई कर्मचारी मरीज के भाई के पास आकर उसे विश्वास दिलाता है कि वह ये दोनों चीज़ें उन्हें उपलब्ध करवा सकता है, पर कीमत असली कीमत से कई गुना ज्यादा होगी।

 एक तरफ  मौत की तरफ  बढ़ता भाई और एक तरफ यह कालाबाजारी, आखिर एक आम आदमी किसे चुनेगा। 1200 रुपए का टीका वह व्यक्ति 30 हजार रुपए में उपलब्ध करवाता है। एक ऑक्सीजन सिलेंडर 65 हजार रुपए में। अब एक प्रश्न जो मैं आप सबसे पूछना चाहती हूं, उस व्यक्ति के पास ऑक्सीजन सिलेंडर और वह इंजेक्शन कहां से आया जो अस्पताल प्रशासन के पास भी उपलब्ध नहीं है? क्या इसके पीछे केवल वो व्यक्ति है या हर वो डॉक्टर, हर वो केमिस्ट या हर वो अस्पताल प्रशासन भी है जो इस महामारी में लोगों की जान खरीदने और बेचने का खेल खेलने में लगे हैं। क्या ये व्यक्तिगत स्वार्थ भी इन व्यक्तियों की मौत का जिम्मेदार नहीं? हमारे देश में अक्सर कहा जाता है ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत।।’ और एक तरफ  ये स्वार्थ सिद्धि हेतु जमाखोरी और कालाबाजारी! हम भारतीयों की सबसे बड़ी समस्या ये दोगला रवैया है। यहां हर व्यक्ति चाहता तो है कि घर-घर से भगतसिंह निकले, पर मन ही मन उम्मीद की जाती है कि वो भगतसिंह अपने नहीं, पड़ोसी के घर से निकले। इसी तरह जब बात खुद पर या अपने परिवार पर आती है तो लोगों को बड़ी संख्या में ऑक्सीजन सिलेंडर की जमाखोरी करना गलत नहीं लगता, पर जब बात दूसरे के घर की हो तो इसे सरकार का कमजोर रवैया घोषित कर दिया जाता है और जम कर सोशल मीडिया पर इसकी आलोचना शुरू हो जाती है। पिछले एक साल से बहुत से व्यक्तियों को करोड़ों दान करते देखा, समाजसेवा करते देखा और कोरोना को ठीक होते हुए भी देखा।

 इस समय तो इस महामारी कोरोना ने  इतना भयानक रूप धारण कर लिया है कि लोग अपनों से ही डर रहे हैं, लेकिन इस बीमारी का पूरा लाभ निजी अस्पतालों के कर्मचारी, जमाखोरी करने वाले केमिस्ट या ये दोगले लोग ले रहे हैं जिन्होंने अपना स्वार्थ तो सिद्ध कर लिया, पर अपने हर देशवासी भाई को संसाधनों के अभाव का नाटक कर मरने के लिए छोड़ दिया है। इससे साफ  होता है कि इन व्यक्तियों की वजह से कोरोना और ज्यादा विशाल रूप धारण कर रहा है। आज यदि भारत का हर व्यक्ति कालाबाज़ारी और जमाखोरी छोड़ दिल से अपने देशवासियों की कोरोना से जान बचाने  में अपना सहयोग देगा तो मैं दावे से कह सकती हूं कि मात्र 2 से 3 महीनों में पूरा देश कोरोना मुक्त हो जाएगा और हम सभी अपने खुशहाल जीवन में फिर से लौट आएंगे। आज के समय में आपकी ईमानदारी ही देश के लिए सबसे बड़ी समाजसेवा होगी। मैं उन सब कालाबाजारियों व जमाखोरों से कहना चाहती हूं कि आप कोई दान न करें, किसी की सहायता भी न करें, पर आपसे निवेदन है कि देश को बचाने और यहां की गरीब जनता को इस बीमारी से मुक्त करवाने के लिए जो उपकरण, जो दवाई और ऑक्सीजन जिस पर आम व्यक्ति से लेकर हर तबके के व्यक्ति का हक है, उन्हें बिना किसी स्वार्थ के उन तक पहुंचने दें। इस संकट की घड़ी में यही आपका सबसे बड़ा योगदान होगा। इसी के साथ सभी राजनीतिक दलों को अपने स्वार्थ किनारे रखकर जनता के मन से संसाधनों की कमी का डर निकालने व कालाबाजारी रोकने की कोशिश करनी चाहिए।

साक्षी शर्मा

लेखिका शिमला से हैं