Friday, September 24, 2021 07:38 AM

भाईचारे का माफिया

भागसूनाग में बदनाम हुई बारिश, दरअसल प्रकृति का आक्रोश है जिसे हम भूल रहे हैं या नजरअंदाज कर देंगे। ऐसा भागसूनाग हम सबके भीतर है, जो प्रकृति को विस्फोटक मुद्रा में आमंत्रित कर रहा है। प्राकृतिक जल निकासी को ढक्कन लगाने की कोशिश में भागसूनाग की आफत खड़ी हुई और कमोबेश चैतड़ू में खड्ड की प्रवृत्ति को झुठलाने की सजा मिली है। हद तो यह कि भागसूनाग के होटलों के बीच जल निकासी को जब अनियंत्रित विकास की हर हद शर्मिंदा कर रही थी, तो व्यवस्था क्यों अपाहिज रही। दरअसल हिमाचल में ‘भाईचारे का माफिया’ तैयार हो रहा है और आश्चर्य यह कि पूरा समाज इस प्रतियोगिता में खुद को साबित करने की कोशिश कर रहा है। इसे हम राजनीतिक उड़ान, सत्ता की पहचान, सामाजिक जुगाड़, स्वार्थ की कोशिश या कुछ भी कहें, लेकिन यह प्रदेश गाहे-बगाहे ‘भाईचारे के माफिया’ में पूरी तरह डूब चुका है। ऐसा कोई कानून या नियम नहीं जिस पर समाज पूरी तरह चले या ऐसा कोई संघर्ष नहीं, जो कानून की उत्पत्ति करे। हम देख रहे कि अगर कोई पहाड़ को सीधे काट रहा या अतिक्रमण कर रहा है, तो इससे प्रोत्साहित होकर हर कोई उस्तरा लेकर चल पड़ा है।

 अतिक्रमण अब सामाजिक रुतबे से जुड़ रहा है। यह अतीत और इतिहास से जुड़ा विषय है कि किस तरह जंगल के जंगल सेब के बागीचों में तबदील हो गए और तत्कालीन सरकार यह प्रयास करने में जुट गई कि किसी तरह अवैध कब्जों को ही वैधता की सियासी जयमाला पहना दी जाए। यहां सरकार को हमेशा सत्ता के रूप में देखा जाता है या सरकार में रहते हुए सत्ता अपना राजनीतिक उद्धार करती है। सत्ता अपनी ही सरकार के दोहन में इतनी प्रभावशाली दिखाई देती हैं कि सारा कामकाज राजनीतिक भाईचारे के अनुपात में बंटता है। इसलिए सरकारें बदलते सारे ओहदे खुद पर नया पोलिश लगाने की कोशिश करते हैं। यह पोलिश अपनी चमक से कब माफिया को चमका रहा होता है, इस पर सोचे बिना हुक्मरानों के सामने अरदास जारी रहती है। अब तो हर विकास के पीछे भाईचारे का ऐसा माफिया स्थापित हो गया है, जो अपने विधायक की संगत में ठेकेदार बनकर सफल है या सत्ता के हर विषय में लाभान्वित है। यही माफिया लीज है या आगे बढ़ने की दहलीज है। भाईचारे में लिप्त राजनीति को अंगीकार करता माफिया अब कामकाजी व्यवहार में पवित्र है। इसलिए हिमाचल में कुछ लोग अपनी क्षमता में स्थानांतरण पुरुष बन गए, तो कुछ अन्य संपर्क पाठशाला की तरह ज्ञान बढ़ाते हैं। भाईचारा सड़क से हर दोपहर तक इंतजाम करता है ताकि हिमाचल में नियमों से परे अठखेलियां हों। नीयत में धारा 118 रहे, लेकिन बिकते पहाड़ पर कोई बेचारा न रहे। यहां रेत भी ऐसे छन के आती है कि हर दौर की सत्ता को साधता माफिया बदसलूकी के बजाय कामकाजी भाईचारा पैदा करता है।

 अब तो राजनीति के दोनों छोर इतने नजदीक आ गए हैं कि हर सत्ता में हाथ मिलाकर चला जा सकता है। आरोप खेलते हैं या आरोपों के खिलौने राजनीति के बाजार में चल निकले। भाजपा के आरोपों के घोड़े रहे हों या कांग्रेसी आरोपों के हाथी, सिर्फ औपचारिक दौड़ के अलावा एक सरीखे हो गए हैं। यानी अब केवल सत्ता बदल रही है, सहयात्री नहीं। यही सत्ता के सहयात्री अपने भाईचारे की उन्नत मिसाल बनकर कर्मचारी वर्ग को वर्षों से बिना स्थानांतरण हांक रहे हैं। बेरोजगारों को अस्पष्टता के भंवर में फंसा कर सरकारी नौकरियों की कूद फांद में नित नए तरीके से ‘पैरा रोजगार’ पैदा कर रहे हैं। अब तो शिक्षा व चिकित्सा भी भाईचारे का माफिया बन गए, क्योंकि ये विभाग अब इमारतें खड़ी करने का साजो सामान हैं। कभी किसी सड़क पर बिछते कोलतार को नजदीक से देखकर सोचना कि वास्तव में सत्ता का भाईचारा हर कालिख में क्यों इतना प्रभावशाली हो जाता है। हम अपनी तरह का हिमाचल खोज रहे या बना रहे हैं जहां नियमों का विध्वंस, हमारे भाईचारे की सौगंध बनता जा रहा है। आंखें खोलकर देखो भागसूनाग में भाईचारे के माफिया ने कितना विध्वंस किया है।