बुद्धत्व निर्माण यात्रा

अशोक गौतम

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मित्रो! ऐसा नहीं कि मैं बुद्धिराम सुपुत्र श्री बुद्धिप्रकाश अपने आरंभ से ही बुद्धुराम था। विवाह के बाद ही मैं भी बुद्धिराम से दूसरे बुद्धिरामों की तरह बुद्धुराम बना। विवाह पूर्व पूरा का पूरा, सिर से पांव तक इनकी उनकी सबकी नजरों में मैं बुद्धिराम ही था सोलह आने। इस मायागति ने मुझ बुद्धिराम से बुद्धुराम बना बुद्धुत्व की ऐसी निर्माण यात्रा करवाई कि…और आज बुद्धुत्व धारण किए जो कुछ भी हूं, आपके सामने हूं। मोतीचूर का लड्डू खाते ही मुझे मेरी मतिचूर ने बुद्धुत्व प्राप्ति के मार्ग पर चलाते हुए मेरी गुरु बन मेरा मार्ग निर्देशन करते मुझे बुद्धुत्व प्राप्ति का उपदेश देते डोली से उतरते ही कहा कि, ‘हे अब मेरे और केवल मेरे सात जन्मों के प्यारे पति बीआर जी! अब वह समय आ गया है कि तुम बीआर की अपनी पुरानी इमेज तोड़ बुद्धुत्व के मार्ग पर मेरे साथ कदम धरो। विवाह से पहले चाहे कोई कितना ही बड़ा बुद्धिराम क्यों न रहा हो। अतः अब बुद्धुत्व के मार्ग पर पहला कदम धरते अपने परिवार से पूरी तरह अलग होकर केवल अपनी डार्लिंग मतिचूर के बारे में सोचो। घरवालों के बारे में सोचोगे तो मेरी ओर से परेशान रहोगे। मेरे बारे में सोचोगे तो घरवालों की ओर से परेशान रहोगे। दुविधा में रहोगे तो न मैं मिलूंगी, न घरवाले। मेरी ओर से परेशान रहोगे तो तुम्हारी परेशानी तुम्हें तुम्हारे बुद्धुत्व होने में बाधा खड़ी करेगी। उनकी ओर से परेशान रहोगे तो तुम्हारी परेशानी तुम्हें बुद्धिराम होने में बाधा खड़ी करेगी। इसलिए अब यह हंडरेड प्रतिशत मानकर चलो कि अब मेरे साथ रहने, मेरे कहने में ही बुद्धिराम की बुद्धुत्व की निर्विघ्न निर्माण यात्रा शुरू होती है। मुझे धारण करने के बाद भी जो तुम हे मेरे बीआर! दो नावों की सवारी पूरी तरह निषेध। ऐसे निर्वाणियों को न बीवी मिलती है, न घरवाले। दुविधा बुद्धुत्व की निर्माण यात्रा में सबसे बड़ी बाधा है। अतः विवाह करने के बाद भी जो तुम अपने पुराने परिवार के साथ ही रहे तो मेरा तनिक भी भौतिक विकास नहीं होगा। मुझे राज्य, धन, ऐश्वर्य प्राप्त कराने हैं तो अपने परिवार को त्याग दो, निश्चय बुद्धुत्व की प्राप्ति होगी। विवाह के बाद से तुम्हारे जीवन का लक्ष्य परिवार, नाती, रिश्ते नहीं। मैं और मेरे मां-बाप ही अब तुम्हारे सगे हैं। संसार की सारी वस्तुएं केवल और केवल तुम्हारे थ्रू मेरे लिए हैं। इन पर केवल और केवल पहले मेरा अधिकार है। उसके बाद जो कुछ बचा तो उस पर तुम्हारा। मतिचूर चाहे तो इन वस्तुओं पर अधिकार वह अपने माता पिता को तो दे सकती है, पर वह तुम्हारे माता पिता को इन वस्तुओं पर कोई अधिकार नहीं दे सकती। मतिचूर से तुम्हारा विवाह कराके वे इन वस्तुओं पर से अपना अधिकार इस जन्म में तो खो ही चुके हैं। अब तो मैं ही तुम्हारा आहार, विचार, संस्कार, परिष्कार सब कुछ तय करूंगी ताकि तुम्हें जल्दी से जल्दी बुद्धुत्व प्राप्त हो सके।  इसलिए जो तुम बुद्धिराम रहते बुद्धुत्व प्राप्त करना चाहते हो तो जैसा मैं कहती हूं, वैसे ही करते चलो। मेरे बताए मार्ग पर चलने पर तुम्हें बुद्धुत्व की प्राप्ति अति शीघ्र होगी। सिद्धार्थ की तरह तुम्हें तब एक भी सांसारिक वस्तु को त्यागने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बल्कि तुम बुद्धुत्व की यात्रा पर निकले तब हर सांसारिक वस्तु मुझे प्राप्त करवाने को व्यग्र हो उठोगे। तब तुम्हें शहर छोड़ जंगलों में नहीं भटकना पड़ेगा। अब मेरे प्रयास से संभव हुआ तो ईएमआई पर लिए फ्लैट, कार, मेरे भोग विलास की आइटमों की कभी इधर से तो कभी उधर से उधार लेते मासिक इंस्टाल्मेंट्स देते देते तुम्हें शीघ्र ही बुद्धुत्व प्राप्त हो जाएगा।’

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