Thursday, September 24, 2020 02:51 PM

बुद्धि का सिलेबस बदला

निर्मल असो

स्वतंत्र लेखक

जो बुद्धिजीवी कभी बैलेट बॉक्स के करीब दिखाई नहीं देते थे, वे भी अब कमेंट बॉक्स में रहते हैं। दरअसल अब बुद्धिमान होना भी एक कला है और यह हर दिन के हिसाब की चुनौती भी। इनसान दरअसल अपने होने का प्रमाण सोशल मीडिया में ढूंढने लगा है। इसलिए अगर जीवन एक दौड़ है, तो तमाम चैंपियन व्हाट्स ऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर पर मिल जाएंगे। बुद्धि का अब अध्ययन से कोई ताल्लुक नहीं, जब चाहें अपनी टिप्पणी से सारी राय बदल दें। अब तो हर किसी को गुरु टक्कर दे रहा है, बुद्धि का हर दिन सिलेबस बदल रहा है।

इस दौर में हमने भी ठान लिया कि किसी बहाने बुद्धिमान बन जाएं। किसी ने कहा आसानी से राहुल गांधी को सुना दो, दुनिया हमारी बुद्धि का लोहा मान लेगी। हमने किया भी यही और अगर आज हमारा यही ज्ञान हमें चर्चित करता है तो मान लीजिए कि हमारे अंदर भी एक संबित पात्रा है। हमारे भीतर के संबित पात्रा की खासियत यही है कि यह अपने सामने हर तथ्य और कथ्य को परास्त कर सकता है। मजाल है कोई हमसे आज की वास्तविकताओं पर बहस कर ले। हम इतिहास के पन्नों पर ही धूल चटाते हैं। दरअसल आजकल बुद्धि और चुटकले में कोई फर्क नहीं रहा, बल्कि तमाम बुद्धिमान अब कॉमेडियन हो चुके हैं। इसलिए जो हमें हंसाए, वही बुद्धिमान है।

ट्विटर जैसा मनोरंजन और फेसबुक जैसी शिक्षा और कहां मिलेगी। सोशल मीडिया में जितना दायरा, उतना ही साम्राज्य बन सकता है। इसलिए यहां सब कुछ बिकता है। अब तो लेखक से संपादक तक अपने विचारों की प्यास बुझाने के लिए फेसबुकिया बुद्धिमान बन गए हैं। कुछ दिन भर अपने ज्ञान का घड़ा भरते हुए दिखाई देते हैं, तो कुछ अन्य इसी कोशिश में अपना ठीकरा फोड़ते रहते हैं। किसी ने बताया कि अब बुद्धि का भी एक पक्ष और कक्ष होता है, इसलिए जहां ज्यादा मेंढक टर्राते हैं, हम भी उधर हो लेते हैं। बुद्धि का कक्ष तो राज दरबार है, इसलिए चाहे पंचायत प्रधान हो या अपना एमएलए, हम तो गौण होकर उनसे सीखते हैं। वे कहते हैं कि सारा दोष आजादी के पिछले 70 सालों का है, हमारी बुद्धि मान जाती है।

हमारी बुद्धि तो घर से ही मान कर चलती है, क्योंकि यहां नॉलेज और टेक्नालोजी हावी है। अब तो हमारी बुद्धि ने भी फॉलो करना शुरू कर दिया है। मौसम विभाग की भविष्यवाणी चाहे गलत हो, हम मान लेते हैं कि पूरे विश्व में कहीं न कहीं बादल बरस रहे होंगे। डर यही है कि जिस रफ्तार से हमारी बुद्धि आगे निकल रही है, कहीं हम ही पीछे न रह जाएं। इसलिए बुद्धि को रोकते हैं कि देश में इतना भी न भागे कि कहीं संसदीय बहस से कुछ अर्थ न निकाल ले या इस पर मेहनत करना न शुरू कर दे कि राज्यपाल बिना बुद्धि लगाए कैसे-कैसे काम कर लेते हैं। दरअसल लोकतंत्र को समझना है, तो भारत को बुद्धि-विवेक से अलग करके ही देखें वरना पता चल जाएगा कि हर कोई छोटा-बड़ा नेता हमें बुद्धू मानकर ही चल रहा है।

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