Sunday, July 25, 2021 07:50 AM

शिक्षा की चुनौतियां और संभावनाएं

ऐसी नीतियां बनाई जानी चाहिए जो काम करने वाले बच्चों और उनके परिवारों को विभिन्न अनुभवों और इससे निपटने में मदद कर सकें। सरकारों ने कुछ पहल तो शुरू की है, लेकिन यह समय है जबकि केंद्रित पहल शुरू की जानी चाहिए। समेकित बाल संरक्षण योजना (आईसीपीएस) के माध्यम से संभावित परिवारों का चयन कर उन्हें आर्थिक मदद उपलब्ध कराई जाए ताकि बच्चों को बाल मजदूरी में जाने से बचाया जा सके...

भोपाल के ऐशबाग क्षेत्र में ‘फकीरी’ और पन्नी बीनने वाले समुदाय के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का काम कर रही एक सामाजिक संस्था ने दो साल की पुरजोर कोशिशों के बाद आखिरकार 40 बच्चों को स्कूल भेजना शुरू किया। भारत में आज भी ऐसे कई समुदाय हैं जिनकी कोई भी पीढ़ी कभी, किसी स्कूल की ड्योढ़ी नहीं चढ़ पाई है। लिहाजा यह बहुत ही अनिवार्य हस्तक्षेप बनकर उभरा। इसी बीच कोरोना महामारी आई और मार्च 2020 से स्कूल पूरी तरह से बंद हो गए। निजी स्कूलों में तो ऑनलाइन पढ़ाई शुरू हो गई और बच्चे व्यस्त होते गए। सरकारी स्कूलों में भी बच्चों तक पहुंचने के कई जतन शुरू हुए जिनमें मोहल्ला कक्षाएं और दूरदर्शन-मोबाइल के माध्यम से पढ़ाना आदि शामिल था। पर यह प्रयोग उस हद तक सफल नहीं हुए जैसा अपेक्षित थे। उसके पीछे कई वाजिब कारण भी थे, घरों में एक मोबाइल होना और वह भी किसी वयस्क के पास होना, एनड्रायड मोबाइल का न होना तथा परिवार जनों और स्वयं इन बच्चों की भी शिक्षा के प्रति उदासीनता आदि।

 इस तरह की स्थितियों के चलते बच्चों की शिक्षा से दूरी बढ़ती गई। कोरोना तालाबंदी ने इस तरह के परिवारों के समक्ष भुखमरी के हालात भी पैदा किए और इससे उपजे आर्थिक दवाब से ‘फकीरी’ समुदाय के इन 40 बच्चों में से अभी 30 बच्चे पन्नी बीनने का अपना पुराना काम करने लगे। कोरोना की दूसरी लहर की तालाबंदी में भी लाखों लोग बेरोजगार हुए हैं जिससे महिलाओं और बच्चों पर दवाब बढ़ रहा है। बेरोजगार होने का तत्काल नुकसान यह है कि परिवारों के सामने भोजन, पानी, चिकित्सा सहित अन्य मूल आवश्यकताओं को पूरा करने का यक्ष प्रश्न खड़ा होता है। हम यह भी जानते हैं कि जब भी परिवार की आय प्रभावित होती है तो बच्चों का बचपन दांव पर लगने लगता है। ऐसे में बच्चे अधिक मेहनत तथा शोषण वाले काम करने को मजबूर हो रहे हैं। इससे लैंगिक असमानता और विकट होने लगती है तथा घरेलू काम और कृषि में लड़कियों का शोषण और बढ़ने की आशंका होने लगती है। स्कूलों के अस्थायी तौर पर बंद होने से न केवल भारत, बल्कि 130 से अधिक देशों में एक अरब से अधिक बच्चे प्रभावित हो रहे हैं। अब जबकि स्कूल खुलेंगे तो भी शायद कुछ पालक, उनकी शिक्षा का खर्चा उठाने में सक्षम नहीं होने के कारण बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाएंगे। जाहिर है, जब बच्चे स्कूल नहीं जाएंगे तो उनके बाल मजदूरी में धकेले जाने की आशंका बढ़ जाएगी।

 इसी बात की तस्दीक करती एक रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) और यूनिसेफ ने विगत वर्ष (2020) जारी की थी जिसका शीर्षक था ‘कोविड-19 तथा बाल श्रम ः संकट का समय, काम करने का वक्त।’ इस रिपोर्ट में आशंका व्यक्त की गई थी कि कोविड-19 संकट के कारण लाखों बच्चों को बाल श्रम में धकेले जाने की आशंका है। जो बच्चे पहले से बाल श्रमिक हैं, उन्हें और लंबे वक्त तक या और अधिक खराब परिस्थतियों में काम करना पड़ सकता है। आज इस रिपोर्ट की अधिकांश आशंकाएं सच साबित होने लगी हैं। अभी भोपाल के शहरी क्षेत्रों में किशोरी लड़कियों का अपनी मां के साथ घरेलू काम-काज में जाना बढ़ने लगा है। लड़के सब्जी-फल बेचने में अपने पिता-भाई के साथ सड़कों पर आसानी से दिखने लगे हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि से जुड़े कामों में तथा बंधुआ की तरह काम करने का चलन बढ़ा है। एक तरफ तो बच्चे काम करने को मजबूर हो रहे हैं, दूसरी तरफ कानूनी विसंगतियां भी इन हालात को बदतर बनाती हैं। भारत के मौजूदा बाल श्रम कानून के अनुसार 14 वर्ष से नीचे का बच्चा यदि अपने परिवार को छोड़ अन्य कहीं पर काम करता है तो उसे मजदूर की श्रेणी में माना जाएगा, लेकिन जैसे ही वह बच्चा अपने पारिवारिक (विस्तारित) प्रतिष्ठान-व्यवसाय में हाथ बंटाता है तो उसे बाल मजदूर नहीं माना जाएगा। इसी प्रकार 14 वर्ष से ऊपर, किंतु 18 वर्ष से कम उम्र का किशोर यदि किसी खतरनाक उद्योग में काम करता है तो ही उसे बाल मजदूर की श्रेणी में रखा जा सकता है।

कानून के इस प्रावधान के विपरीत बाल श्रम विरोधी अभियान (सीएसीएल) का एक अलग ही दृष्टिकोण है। सीएसीएल के मध्यप्रदेश राज्य संयोजक राजीव भार्गव कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुरूप हमारा मानना है कि 18 वर्ष से नीचे किसी भी बच्चे से काम नहीं कराया जाना चाहिए। सामान्य तौर पर परिस्थितियां ऐसी बनाई जाएं कि उन्हें काम ही न करना पड़े। भार्गव कहते हैं कि कोरोना महामारी के चलते बच्चों के काम में जाने की दर पिछली साल भी बढ़ी थी और इस साल ऐसी आशंका है कि यह बहुत तेजी से बढ़ेगी। वे बताते हैं कि सीएसीएल के 23 जिलों (मध्यप्रदेश-21 जिले, छत्तीसगढ़-2 जिले) में किए गए अध्ययन के नतीजों के मुताबिक 86 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी तरह की आर्थिक गतिविधि में संलग्न रहे हैं। सीएसीएल की हाल ही में हुई प्रदेश स्तरीय संगोष्ठी में बच्चों ने काम करने की स्थितियों पर चिंता जताते हुए बहुत ही स्पष्ट रूप से कहा कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों का किसी भी रूप में काम करना ठीक नहीं है। यह बच्चों को उसके अधिकारों और तमाम तरह के अवसरों से वंचित रखता है और उन्हें असमय बड़ा बनाता है। बच्चों का काम स्कूल जाना है, न कि मजदूरी करना। बाल मजदूरी बच्चों से स्कूल जाने का अधिकार छीन लेती है और वे पीढ़ी दर पीढ़ी गरीबी के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाते हैं। बाल मजदूरी शिक्षा में बहुत बड़ी रुकावट है, जिससे बच्चों के स्कूल जाने में उनकी उपस्थिति और प्रदर्शन पर खराब प्रभाव पड़ता है।

 बच्चों ने इस संगोष्ठी में यह सवाल भी पूछा कि बच्चों के काम करने को कोई भी कैसे न्यायसंगत बता सकता है! उपरोक्त स्थितियों के मद्देनज़र वर्ष 2025 तक बाल श्रम पर रोक लगाने का लक्ष्य वैश्विक वास्तविकताओं से परे नजर आता है। संकट के समय सामाजिक सुरक्षा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे सबसे अधिक कमजोर लोगों को मदद मिलती है। ऐसी नीतियां बनाई जानी चाहिए जो काम करने वाले बच्चों और उनके परिवारों को विभिन्न अनुभवों और इससे निपटने में मदद कर सकें। सरकारों ने कुछ पहल तो शुरू की है, लेकिन यह समय है जबकि केंद्रित पहल शुरू की जानी चाहिए। समेकित बाल संरक्षण योजना (आईसीपीएस) के माध्यम से संभावित परिवारों का चयन कर उन्हें आर्थिक मदद उपलब्ध कराई जाए ताकि बच्चों को बाल मजदूरी में जाने से बचाया जा सके। इस पूरी प्रक्रिया में शिक्षक भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे बच्चों को उदार रवैया अपना कर फिर से शिक्षा की तरफ  मोड़ सकते हैं। शनिवार को अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस पर पूरी दुनिया से एक आह्वान होना ही चाहिए कि हमें बच्चों को मजदूरी से बाहर निकालना है।

प्रशांत कुमार दुबे

स्वतंत्र लेखक

यदि कोविड-19 की महामारी लंबी भी चलती है तो समय की मांग है कि ऑनलाइन शिक्षा को और सुदृढ़ किया जाए। ऑनलाइन शिक्षण को व्यवस्थित करने की जरूरत है...

लगभग सदी के पश्चात कोरोना जैसी महामारी ने पूरे विश्व के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक ढांचे को पूरी तरह उथल-पुथल कर दिया है, जिसमें शिक्षा का क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा है। मार्च 2020 में ही इस महामारी के कारण सभी स्कूलों के दरवाजे बंद करने पड़े और आज लगभग सवा साल तक अध्यापकों को बच्चों की कक्षा से दूर रखा है। इस आपदा के कारण जहां शिक्षा के क्षेत्र का पूरा ढांचा अस्त-व्यस्त होकर चरमरा गया है, वहीं इस काल में व्यापक सुधार करके शिक्षा प्रदान करने की संभावनाएं देखी जा रही हैं। इस बात को कतई नहीं नकारा जा सकता कि हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में इस दौरान बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त करने में जहां कई क्षेत्रों में इंटरनेट के सिग्नल की समस्या है, लोगों के पास स्मार्टफोन नहीं हैं, कई लोग स्मार्ट फोन का उपयोग नहीं कर पाते हैं, ‘हर घर पाठशाला’ में  बच्चों को कार्य करवाने के लिए सभी अभिभावक जागरूक नहीं हैं, दिहाड़ीदार लोगों के पास बच्चों के लिए दूसरा मोबाइल नहीं है, कक्षा कक्ष की गतिविधियां रुक गई थीं, बच्चों के साथ अध्यापकों का सीधा संवाद नहीं हो सका, ऑनलाइन पठन-पाठन  के शिक्षण के लिए विद्यार्थियों व अध्यापकों की अधूरी तैयारी, विद्यार्थियों को दोपहर का पौष्टिक भोजन न मिल पाना जैसे कारणों से शिक्षा का क्षेत्र प्रभावित हुआ है। हाल ही में एक सोशल मीडिया में तस्वीर आई जिसमें शिमला जिला की हिमरी पंचायत व आसपास के क्षेत्रों में  नेट सिग्नल नहीं होने कारण सभी बच्चे एक पहाड़ी पर जहां सिग्नल था, वहां अधिक संख्या में बच्चे अपनी ऑनलाइन पढ़ाई करते हुए देखे गए। इस काल में हिमाचल प्रदेश में कई गरीब परिवारों ने अपना पेट बांधकर बच्चों की पढ़ाई करवाने के लिए स्मार्टफोन खरीदे। कोरोना की इस महामारी ने पूरे विश्व के दैनिक क्रियाकलाप से लेकर लंबे समय तक पूरी न होने वाली योजनाओं को तहस-नहस कर दिया है।

 संपूर्ण विश्व के साथ-साथ भारत में भी संपूर्ण लॉकडाउन से सभी शिक्षण संस्थान बंद करने पड़े, जिसके कारण करोड़ों बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ा, लेकिन अगर यह महामारी 10 साल पहले फैलती तो नुकसान वर्ष 2020 की अपेक्षा कई गुना अधिक बढ़ जाता। 18 मार्च 2020 को पूरे भारत में संपूर्ण शैक्षणिक संस्थान बंद कर दिए गए। 29 जून 2020 को छठा लॉकडाउन लगा, जिसकी अवधि 1 जुलाई से 30 जुलाई 2020 तक थी। कुछ क्षेत्रों में थोड़ी राहत दी गई लेकिन शिक्षण संस्थान फिर भी नहीं खुले। इस दौरान मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने ऑनलाइन पोर्टल के साथ डायरेक्ट टू होम टीवी सेवा, सतत अधिगम के लिए रेडियो प्रोग्राम चलाए। इसके साथ सोशल मीडिया जैसे व्हाट्सएप, जूम, टेलीग्राम, यूट्यूब लाइव, फेसबुक लाइव, गूगल मीट आदि माध्यमों के तहत बच्चों तक अपनी पहुंच बनाई। इसके अतिरिक्त एमएचआरडी के विभाग ने माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा के लिए दीक्षा पोर्टल शुरू किया, जिसमें बच्चों, अध्यापकों, अभिभावकों के लिए पाठ्य सामग्री व वीडियो तैयार कर डाले। एनसीईआरटी ने कक्षा पहली से जमा दो के लिए ऑनलाइन लर्निंग के तहत ई-पाठशाला ऐप शुरू किया जिसमें सभी पुस्तकें, दृश्य-श्रव्य सामग्री, जो सभी विषयों पर कई भाषाओं में पढ़ने और पढ़ाने के लिए अपलोड की। इस समय के दौरान हिमाचल प्रदेश पूरे भारत में पहला राज्य बना जिसने कोरोना के लंबे समय तक चलने के खतरे को शुरू में ही भांप लिया।

 हिमाचल सरकार ने लॉकडाउन के एक सप्ताह के अंदर ही सभी स्तर के बच्चों के लिए ऑनलाइन औपचारिक शिक्षा ‘हर घर पाठशाला’ कार्यक्रम शुरू करके प्रदेश की सभी पाठशालाओं को ऑनलाइन शिक्षा से जोड़ दिया। शिक्षा विभाग ने इस कार्यक्रम  को बहुत ही साधारण तकनीक द्वारा शिक्षा जगत के क्षेत्र से जुड़े सभी अध्यापकों, विद्यार्थियों और अभिभावकों तक पहुंचाया है। कोरोना काल के शुरुआत के  पहले सप्ताह के अंत में ही प्रदेश के 95 फीसदी (लगभग 15000) स्कूलों को व्हाट्सएप से जोड़ा, जिसमें 70 फीसदी (लगभग 800000) विद्यार्थियों को उनके अध्यापकों से जोड़ दिया। यही नहीं, सौ से अधिक अध्यापकों का सहयोग लेकर कक्षा प्रथम से कक्षा बारहवीं तक के सभी छात्रों के लिए विषयवार ऑनलाइन शिक्षण सामग्री तैयार की। ‘हर घर पाठशाला’ कार्यक्रम में प्रतिदिन सुबह 8.30 से 9.30 के बीच बच्चों को दैनिक शिक्षण सामग्री व्हाट्सएप के माध्यम से भेजी जाती है। दिन के समय अध्यापकों ने उस शिक्षण सामग्री को पढ़ाया व बच्चों की समस्याओं का समाधान ऑनलाइन ही किया। इस कार्य को ऑनलाइन ही मॉनिटर भी किया गया और प्रारंभ के दूसरे सप्ताह तक राज्य के 60 फीसदी से अधिक सरकारी छात्रों ने प्रतिदिन वेबसाइट खोली।

 बच्चों के साथ किए कार्य की प्रतिदिन बयालीस हजार के करीब अध्यापकों ने अपनी रिपोर्ट भी जमा करवाई। इस कार्यकाल में न केवल छात्रों के लिए, बल्कि अध्यापकों के पढ़ाने के कौशल में सुधार, बच्चों के साथ संवाद स्तर की गुणवत्ता में सुधारने के लिए ऑनलाइन अध्यापकों को प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की गई। इसमें 5300 अध्यापकों ने प्रशिक्षण सत्र में भाग लिया और 28000 कोर्स पूर्ण कर लिए। प्रारंभिक इन सब प्रयासों के बावजूद जो प्रारंभिक स्तर के सरकारी स्कूलों के छात्र जो अधिकतर गरीब व अनपढ़ परिवार पृष्ठभूमि से हैं, जिनमें कुछ परिवार इस पेंडेमिक काल में अपने कार्य स्थल पर कार्य छूट जाने के कारण स्थान बदला है, उन्हें घर पर पढ़ाने की सुविधा नहीं मिल पाई। उनमें से कई परिवारों के पास स्मार्टफोन नहीं था। इंटरनेट में रिचार्ज नहीं करवा पाए या नेट का सिग्नल नहीं होने के कारण अपनी पहले की पढ़ाई को भी भूल रहे हैं। लिखने का अभ्यास कार्य, जो अध्यापकों द्वारा लगातार करवाया जाता था, उसमें गिरावट आई है।

 पेंडेमिक के इस काल के गुजर जाने के बाद भी  इस तरह से हुई खाली परिपाटी को पूरा करने के लिए लंबे समय तक प्रयास करने होंगे। जहां कोविड-19 महामारी ने देश की शिक्षा व्यवस्थाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है, वहीं इस दौरान शिक्षा के क्षेत्र में ऑनलाइन शिक्षण प्रशिक्षण की बहुत सी संभावनाओं को जन्म भी दिया है। इस दौरान विभिन्न डिजिटल तकनीक के उपयोग ने सरकार और शिक्षा के क्षेत्र के हिस्सेदारों को मुक्त और दूरस्थ शिक्षा के दरवाजे खोले हैं। यदि कोविड-19 की महामारी लंबी भी चलती है तो समय की मांग है कि ऑनलाइन शिक्षा को और सुदृढ़ किया जाए, ऑनलाइन शिक्षण  को प्रभावशाली ढंग से व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। सभी बच्चों तक  शिक्षण के साधन संपन्न संसाधनों से सुलभ पहुंच बनानी होगी, जिससे बच्चे न केवल अपनी डिग्री ही हासिल कर सकें, अपितु उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, ऐसे प्रबंधन की आवश्यकता है।

जोगिंद्र सिंह

लेखक धर्मशाला से हैं