Saturday, January 23, 2021 07:15 PM

चक्की खड्ड में कब रुकेगा अवैध खनन: सुखदेव सिंह, लेखक नूरपुर से हैं

खनन विभाग ने इतनी बड़ी चक्की खड्ड में इस माफिया पर लगाम लगाने के लिए सिर्फ  एक अधिकारी तैनात किया था। गुंडागर्दी के सहारे स्टोन क्रशर चलाने वालों से फिर कौन पंगा लेकर इस खड्ड को बचा सकता था। खनन विभाग के अनुसार खड्डों में जेसीबी मशीन लगाए जाने पर पूर्णतया प्रतिबंध है। खड्डों में बेलचे से करीब तीन फुट तक रेत, बजरी और पत्थर तो निकाला जा सकता है, मगर जेसीबी मशीनों से गहरे गड्ढे नहीं किए जा सकते हैं…

प्रकृति से जब भी खिलवाड़ किया गया, उसका खामियाजा इनसान को भुगतना पड़ा है। कहने को अवैध खनन पर लगाम लगाई जा रही है, मगर हकीकत यह है कि हमारे नालों व खड्डों में दिन-रात अवैध खनन जोरों पर चल रहा है। जमीनों का इस तरह दोहन होने की वजह से जल स्रोत भी प्रभावित हुए हैं। यही नहीं, अवैध भूमि कटाव से किसानों की कीमती जमीनें भी पानी में बहना शुरू हो चुकी हैं। हिमाचल और पंजाब राज्य को जोड़ने वाली चक्की खड्ड भविष्य में नदी बनने की ओर अग्रसर हो चुकी है। रेलवे पुल के समीप करीब तीस फुट गहरी और ठीक इससे भी कहीं अधिक गहरी, चौड़ी व लंबी खाई बनती जा रही है जो औद्योगिक क्षेत्र डमटाल के आसपास गांवों के लिए किसी खतरे से कम नहीं है। एक दशक पहले आई भारी बाढ़ का पानी पुल को बहाकर अपने साथ ले गया। नतीजतन एक साल तक वाहन चालकों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। दो राज्यों की सीमाओं के साथ लगती चक्की खड्ड के आसपास की उपजाऊ जमीनें हर साल पानी में बहती जा रही हैं। राज्यों की सरकारें आज दिन तक यह तय नहीं कर पाईं कि कौनसा हिस्सा किस राज्य के अधीन पड़ता है? हिमाचल प्रदेश की पूर्व सरकार ने चक्की खड्ड की एक बार हदबंदी करवाकर अवैध खनन रोकने का प्रयास किया था, मगर पंजाब के खनन माफिया ने इस हदबंदी को तहस-नहस करके इसका सीना एक बार फिर से छलनी करना शुरू कर दिया। इस खड्ड में अवैध खनन किए जाने का सिलसिला वर्षों से चल रहा है।

 सर्वोच्च न्यायालय ने किसान संघ की याचिका पर सुनवाई करते हुए चक्की खड्ड में अवैध खनन किए जाने पर प्रतिबंध लगाया था। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की पालना स्थानीय प्रशासन करने में नाकाम रहा और नतीजा सबके सामने एक गहरी बनती खाई के रूप में देखा जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की ओर से चक्की खड्ड में अवैध खनन पर प्रतिबंध लगाए जाने के समय आईपीएच विभाग से भी कुछ जवाब तलब किया गया था। विभाग ने क्या न्यायालय के आदेशों की पालना की होगी, यह तो आला अधिकारी ही बता सकते हैं। न्यायालय का तर्क था कि जिस समय इस खड्ड में अवैध खनन नहीं किया जाता था, तो उस समय आसपास के जलस्रोतों में पानी का स्तर कितना था? वर्तमान समय में इस खड्ड में इतना अवैध खनन हो चुका है तो अब उस जल स्तर में कितनी गिरावट आई है? सच्चाई तो यह है कि खंनी, बाड़ी खड्ड और हरियाल क्षेत्रों में जेसीबी मशीनों से कई फुट गहरे गड्ढे खोदकर उनमें से रेत, बजरी और पत्थर निकाल कर उन्हें खुला छोड़ रखा हुआ है। बरसात के समय इन्हीं खड्डों का पानी गलत दिशा में मुड़कर तबाही मचाता है। पानी के तेज बहाव के कारण पुल पत्तों की तरह गिरकर बहते पानी में जलमग्न हो चुके हैं। चक्की खड्ड में अवैध खनन पर लगाम न कसे जाने की वजह से किसानों की उपजाऊ भूमि पर भी यह खनन माफिया नजरें टिकाए हुए है। खड्ड का इस तरह बेतहाशा दोहन किए जाने से जल स्रोत भी प्रभावित होकर रह गए हैं। हिमाचल प्रदेश सरकार खनन माफिया पर नकेल कसने के लिए प्रयासरत चल रही है। उद्योग मंत्री कुछेक स्टोन क्रशरों का औचक निरीक्षण करके उन पर भारी-भरकम जुर्माना लगाकर मीडिया में सुर्खियां बटोर चुके हैं। स्थानीय प्रशासन एक बार फिर से चक्की खड्ड की हदबंदी किए जाने को लेकर तैयारियों में जुट गया है। चक्की खड्ड का अस्तित्व बरकरार रहे, इसलिए बीस फुट लंबे पिल्लर खड्ड के आरपार लगाए जाने का प्रपोजल बना है।

 पिल्लरों के ऊपर सोलर लाइट लगाई जाएगी जिससे रात के अंधेरे में अवैध खनन करने वालों को दबोचा जा सके। नूरपुर के साथ लगते चार उपमंडलों में करीब 70 स्टोन क्रशर लगाए गए हैं। मौजूदा समय में पचास स्टोन क्रशर सरकार की सख्ती के बावजूद राजनीतिक संरक्षण प्राप्त लोग चलाए हुए हैं। कुछेक स्टोन क्रशर मालिक विद्युत विभाग की मिलीभगत से वर्षों से बिजली के अवैध कनेक्शन के सहारे अपना गोरखधंधा चलाते रहे हैं। चक्की खड्ड के स्टोन क्रशरों से विद्युत विभाग को कितना राजस्व मिलता रहा है, यह जानने की जरूरत है। चप्पे-चप्पे पर स्टोन क्रशर लगाए जाने की अनुमति दिए जाने के पीछे सरकारों की ओर से अपने चहेतों को रेवडि़यां बांटने की कोशिश ही कही जा सकती है। आम आदमी को लघु उद्योग लगाने के लिए उद्योग विभाग की कई औपचारिकताओं से होकर गुजरना पड़ता है। फाइल बनकर जब कर्जा पास करने के लिए बैंक प्रबंधन के पास पहुंचती है तो भी कोई गारंटी नहीं होती कि उसके सपने साकार भी हो सकते हैं या नहीं? मगर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त लोगों को इतने झमेलों में नहीं पड़ना पड़ता और उद्योग विभाग तथा बैंक प्रबंधन की मंजूरी आसानी से मिल जाती है। अवैध खनन की रोकथाम के लिए प्रशासन भी जनता को बेवकूफ बनाता रहा है। सच बात यह कि बगैर प्रशासन की मिलीभगत से अवैध खनन आम व्यक्ति की ओर से किया जाना असंभव सा लगता है।

 प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी जब भी तहसील कार्यालयों से अवैध खनन माफिया पर कार्रवाई करने के लिए निकलते हैं तो इसकी भनक खड्ड में लगी जेसीबी मशीनों के चालकों को लग जाती है। अधिकारी जब तक चक्की खड्ड में पहुंचते हैं तो उन्हें सिवाय गहरे गड्ढों के कुछ नजर नहीं आता है। खनन विभाग ने इतनी बड़ी चक्की खड्ड में इस माफिया पर लगाम लगाने के लिए सिर्फ  एक अधिकारी तैनात किया था। गुंडागर्दी के सहारे स्टोन क्रशर चलाने वालों से फिर कौन पंगा लेकर इस खड्ड को बचा सकता था। खनन विभाग के अनुसार खड्डों में जेसीबी मशीन लगाए जाने पर पूर्णतया प्रतिबंध है। खड्डों में बेलचे से करीब तीन फुट तक रेत, बजरी और पत्थर तो निकाला जा सकता है, मगर जेसीबी मशीनों से गहरे गड्ढे नहीं किए जा सकते हैं। सवाल यह भी उठता है कि प्रशासन ने आखिर क्या सोचकर जेसीबी मशीनों की आरसी जारी की होगी? क्या प्रशासन के पास यह पुख्ता जानकारी नहीं थी कि कितनी जेसीबी मशीनें आजकल खड्डों और नालों में अवैध खनन करने में लगी हैं। ऐसी स्थिति में अवैध खनन पर पाबंदी लगने की संभावना नहीं है।

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