चीनी जाल में फंसा विश्व: विकेश कुमार बडोला, लेखक, विचारक, ब्लॉगर

विकेश कुमार बडोला

लेखक, विचारक, ब्लॉगर

यद्यपि इन दिवसों में भारत में कोरोना मृतकों और संक्रमितों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, परंतु भारत के शासन और लोगों का सर्वाधिक ध्यान अब चीन को सीमा विवाद का दंडात्मक पाठ पढ़ाने पर स्थिर है। अधिसंख्य भारतीय चीन के प्रति अब इसलिए आक्रोशित नहीं कि उसने कोरोना बनाया व फैलाया, अपितु इसलिए हैं कि उसने हमारे सैनिकों पर कायरतापूर्ण आक्रमण किया। कोरोना अपराधी के रूप में स्वयं पर से अमरीकी आक्रोश को विखंडित करने के बाद चीन ने अपने प्रति उभरे कोरोना संबंधी भारतीय आवेश को भी दोनों राष्ट्रों के सीमा-क्षेत्रों के विवादों की ओर उन्मुख कर दिया है। कोरोना से विश्व के लोगों का संकेंद्रण हटाकर और अन्य समस्याएं उत्पन्न कर वह उनकी भावी चिंताओं को उन समस्याओं की ओर आकृष्ट कर देगा, जिनके लिए वे चीन पर मात्र क्रोधित होंगे…

चीन जैसा चाहता था, वैसा करने में सफल हो चुका है। अमरीका से लेकर भारत तक सभी राष्ट्र उसके छल-कपट में फंस चुके हैं। अब विश्व के जीवित लोग कोरोना किसने बनाया, कहां बना, किसने क्यों फैलाया इत्यादि प्रश्नों से क्रोधोन्मुखी नहीं हैं। अब विश्व के लोगों का रक्त शीत पड़ चुका है। इस समय अमरीका, भारत से लेकर वे सभी राष्ट्र जो चीन को उसके किए का दंड दिलाने में अग्रिम भूमिका का निर्वहन कर सकते थे, सभी अपने-अपने राष्ट्रों की उन अन्य समस्याओं के समाधान की दिशा में अग्रसर हो चुके हैं जो कोरोना से सभी का ध्यान हटाने के लिए येन-केन-प्रकारेण चीन ने ही निर्मित की हैं। विगत अप्रैल तक अमरीका और भारत सहित विश्व के सभी राष्ट्र कोरोना से अस्त-व्यस्त अपने लोगों, समाज, राष्ट्र, अर्थव्यवस्था व भविष्य के संबंध में असुरक्षा से घिरकर कोरोना-निर्माता चीन को दंड देने के लिए व्याकुल थे। अप्रैल तक प्रतिदिन ही चीन की घेरेबंदी के समाचार प्रकाशित-प्रसारित हो रहे थे। विश्व का कोई न कोई राष्ट्र चीन के विरुद्ध कोई न कोई दंडात्मक कार्रवाई करने के लिए आतुर था। कुछ राष्ट्रों की गुटसापेक्षता भी आकार लेने लगी थी ताकि चीन को उसके अनोखे अपराध के लिए उचित दंड देने की कार्यनीति बन सके। परंतु मई के आरंभ से लेकर अब तक कोरोना उत्सर्जक और प्रसारक चीन के बारे में अखिल वैश्विक बातें, चिंताएं, प्रतिशोधजनित भावनाएं और अन्य क्रोधजन्य प्रतिक्रियाएं सुषुप्त पड़ चुकी हैं। पता नहीं क्या हुआ, जो लोग मई के बाद कोरोना के संकट के प्रति दुस्साहसी बन गए हैं। यद्यपि विश्व में कोरोना से मृत व संक्रमित लोगों का आंकड़ा प्रतिदिन बढ़ ही रहा है और सामान्य नहीं बल्कि तीव्र गति से बढ़ रहा है, तब भी लोग निश्चिंत हो गए हैं। मृतकों और संक्रमितों के बारे में सोचना छोड जीवित बचे लोगों का ध्यान अपने उन सामान्य जीवन संबंधी खटकर्मों पर आ टिका है जो चीन जैसे देश के शासक अपने उत्पादों के विक्रय के लिए उनसे करवाना चाहते हैं। अमरीका का ध्यान कोरोना से विभाजित करने चीन ने वहां पुलिस अभिरक्षा में हुई अश्वेत की मृत्यु को रंगभेद से जोड़ अमरीका में हिंसक प्रदर्शन करवाया।

अमरीका में अश्वेतों का हिंसक प्रदर्शन पूरे एक माह तक चला। इस समयावधि में राष्ट्रपति ट्रंप से लेकर अमरीका के हर प्रमुख नेता, शासक, प्रशासक और कोरोना से आक्रांत लोगों की भावनाएं चीन से कोरोना का प्रतिशोध लेने के बिंदु से सरक स्वराष्ट्र के हिंसक प्रदर्शन पर आ टिकीं। इस समयावधि में चीन ने अमरीका के साथ कोरोना के संदर्भ में जो डेमेज कंट्रोल अपने पक्ष में करवाना था, उसे करवाने की युक्तियां व नीतियां खोज लीं और उन्हें सफलतापूर्वक क्रियान्वित भी कर दिया। अमरीकी विपक्षियों और राष्ट्रपति ट्रंप के कोप का लक्ष्य बने व सत्ता से निकाले गए नेताओं के बड़े लालच की पूर्ति करके चीन ने इन सभी को ट्रंप के विरोध में ऐसे वक्तव्य देने के लिए उकसाया है ताकि आगामी राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप पराजित हो जाएं। विपक्षी नेतागण तो ये तक कह रहे हैं कि ट्रंप ने आगामी नवंबर में अनुसूचित राष्ट्रपति चुनाव में विजयी होने के लिए चीन व शी जिनपिंग से सहायता की याचना की है। कहां अमरीकी शासन के पक्ष-विपक्ष के सभी नेताओं और लोगों को एकतापूर्वक अपने नेतृत्व में विश्व के लिए कोरोना उत्सर्जक चीन के विरुद्ध परिणोमान्मुखी अभियान चला कर उसे दंड का अधिकारी बनाना था और कहां अमरीका स्वयं चीन के कुटिल प्रपंच में उलझ गया है। इसी प्रकार कोरोना से भारत का ध्यान भटकाने चीन ने भारत के सीमा-क्षेत्रों में अतिक्रामक गतिविधियां बढ़ानी आरंभ कर दीं। मई के आरंभ से लेकर जब से चीन ने लद्दाख की गलवान घाटी सहित भारत की अन्य सीमाओं पर उकसावे वाली गतिविधियां प्रारंभ की हैं, तब से भारत का जनमानस कोरोना भूलता जा रहा है। मई, पूरा जून माह भारत और चीन की वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर दोनों राष्ट्रों की सैन्य-वार्ता तथा किन्हीं ंिबंदुओं पर सहमति-असहमति उभरने में ही व्यतीत हो गए, परंतु एलएसी के संबंध में कोई संतोषजनक सहमति अब तक नहीं बन पाई है। चीनी सैनिकों के अतिक्रमण और एलएसी अनुबंध के बिंदुओं के उल्लंघन के फलस्वरूप 15-16 जून की रात्रि को गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के मध्य हुई हिंसक मुठभेड़ में भारत के 20 वीर राष्ट्रभूमि पर बलिदान हो गए। इस मुठभेड़ में चीन के भी 43 सैनिक मरे। तब से लेकर भारत व चीन का सीमा विवाद प्रतिदिन नए-नए संदर्भ में उभर रहा है। चीनी कुटिलता के कारण मातृभूमि पर बलिदान हुए अपने वीरों के लिए अधिसंख्य भारतीय नागरिक गहराई तक आहत थे। विगत 15 दिनों से चीन, उसके व्यापार, व्यवसाय और सामग्रियों के बहिष्कार के लिए पूरा भारत आंदोलित है। यद्यपि इन दिवसों में भारत में कोरोना मृतकों और संक्रमितों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, परंतु भारत के शासन और लोगों का सर्वाधिक ध्यान अब चीन को सीमा विवाद का दंडात्मक पाठ पढ़ाने पर स्थिर है। अधिसंख्य भारतीय चीन के प्रति अब इसलिए आक्रोशित नहीं कि उसने कोरोना बनाया व फैलाया, अपितु इसलिए हैं कि उसने हमारे सैनिकों पर कायरतापूर्ण आक्रमण किया। कोरोना अपराधी के रूप में स्वयं पर से अमरीकी आक्रोश को विखंडित करने के बाद चीन ने अपने प्रति उभरे कोरोना संबंधी भारतीय आवेश को भी दोनों राष्ट्रों के सीमा-क्षेत्रों के विवादों की ओर उन्मुख कर दिया है। चीन को ज्ञात है कि विश्व का अधिसंख्य लघु, मध्यम और सूक्ष्म व्यवसाय उसके उत्पादों व निर्यात पर निर्भर है, अतः कोरोना से विश्व के लोगों का संकेंद्रण हटाकर और अन्य समस्याएं उत्पन्न कर वह उनकी भावी चिंताओं को उन समस्याओं की ओर आकृष्ट कर देगा, जिनके लिए वे चीन पर क्रोधित तो होंगे परंतु उसके व्यवसाय का बहिष्कार करने का अटूट संकल्प नहीं गढ़ सकेंगे। चीन के अर्थ साम्राज्य विस्तार में जो राष्ट्र प्रमुख बाधा हैं, वे अमरीका और भारत ही हैं। जहां अमरीका अपनी समृद्धि, उन्नति और प्रौद्योगिकी के बल पर चीन के लिए बाधक है, वहीं भारत जनसंख्या में चीन के बाद दूसरी श्रेणी में है। इन परिस्थितियों में विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रों से एक ही प्रश्न है कि क्या वे एक होकर शताब्दी की महामारी कोरोना के निर्माता और प्रसारणकर्ता चीन को कठोर से भी कठोर दंड देने के लिए कुछ करेंगे या नहीं?

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