Tuesday, April 13, 2021 10:48 AM

जलवायु परिवर्तन और हिमनद के खतरे

हमें देश हित में अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर पॉजिटिव रहना होगा। यकीनन हमारी आर्थिकी मंदी से जीतेगी। सुझाव है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी सेक्टर की नीतिगत समस्याओं को दूर करना होगा और उसे प्राइवेट प्लेयरों के लिए दिलचस्प बनाना होगा। सरकार को सार्वजनिक सुविधाओं के क्षेत्र में निवेश करना चाहिए...

कोरोना वायरस महामारी की अमावस से चांदनी की तरफ  बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था की अक्तूबर-दिसंबर तिमाही में वृद्धि दर 0.4 प्रतिशत रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों में कहा गया है कि लगातार दो तिमाहियों में नकारात्मक रहने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था तीसरी तिमाही में सकारात्मक हो गई है। 2019-20 की समान तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 3.3 प्रतिशत थी। चालू वित्त वर्ष की दिसंबर में समाप्त तिमाही के दौरान भारत की जीडीपी सकारात्मक दौर में पहुंच गई है। इससे पहले की दो तिमाहियों के दौरान कोरोना वायरस महामारी के फैलने के कारण इसमें बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी। एनएसओ के राष्ट्रीय लेखा के दूसरे अग्रिम अनुमान में 2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद में 8 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान जताया गया है। जनवरी में एनएसओ ने चालू वित्त वर्ष 2020-21 में अर्थव्यवस्था में 7.7 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान जताया था। एक साल पहले 2019-20 में जीडीपी में 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। कोरोना वायरस महामारी और उसकी रोकथाम के लिए लगाए गए लॉकडाउन के कारण चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था में 24.4 प्रतिशत की गिरावट आई थी। वहीं दूसरी तिमाही जुलाई-सितंबर में जीडीपी में 7.3 प्रतिशत की गिरावट आई थी। देश में कोविड-19 की स्थिति में तेजी से सुधार आने और लोगों के खर्च में तेजी से वृद्धि होना दो ऐसे कारक रहे हैं जो दिसंबर 2020 तिमाही के लिए बेहतर रहे। भारत की जीडीपी में पहली तिमाही के दौरान 24 प्रतिशत और दूसरी तिमाही में 7.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। अक्तूबर-दिसंबर 2020 तिमाही में चीन की अर्थव्यवस्था में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई, इससे पहले वहां जुलाई-सितंबर 2020 में जीडीपी वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत रही थी। जीडीपी के दिसंबर तिमाही के आंकड़े बहुत ही काबिलेगौर हैं क्योंकि 2020-21 में जीडीपी में करीब 8 फीसदी गिरावट का अनुमान लगाया जा रहा है। जीडीपी के आंकड़ों का इंतजार इसलिए भी है क्योंकि इस वित्त वर्ष की जून तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था 23.9 फीसदी गिरी थी।

 इसकी सबसे बड़ी वजह थी देश भर में लगाया गया सख्त लॉकडाउन, जिसके चलते इकोनॉमी पूरी तरह ठप पड़ गई थी। इसके बाद दूसरी यानी सितंबर तिमाही में अर्थव्यवस्था में 7.5 फीसदी की गिरावट आई। वैसे कई एजेंसियां पहले से ही इस बात की आशंका जता रही थीं कि तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था पॉजिटिव रह सकती है। रिजर्व बैंक की तरफ  से दिसंबर में जारी ‘स्टेट ऑफ दि इकोनॉमी’ बुलेटिन में भी कहा गया था इकोनॉमी के गहरी खाई से बाहर निकलने के संकेत मिल रहे हैं। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक 1722 कंपनियों के तिमाही नतीजों के आधार पर कहा गया था कि इकोनॉमी में सुधार हो रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोना की वजह से इतिहास में पहली बार तकनीकी रूप से मंदी के दौर में पहुंची। वैसे भी जब कोई अर्थव्यवस्था लगातार दो तिमाही में गिरावट में रहती है तो माना जाता है कि अर्थव्यवस्था तकनीकी रूप से मंदी के दौर में पहुंच चुकी है। क्या भारतीय अर्थव्यवस्था अब बूम के रास्ते पर चल पड़ी है? महामारी की भयंकर मार से नकारात्मक विकास दर के पाताल से गुज़रकर देश की अर्थव्यवस्था पिछली तिमाही में सकारात्मक विकास दर तक पहुंची और फिलहाल आखिरी तिमाही में इसका सकारात्मक विकास जारी है। दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में अप्रैल-जून 2020 की तिमाही में 23.9 प्रतिशत की दर की गिरावट दर्ज की गई थी। अब अनुमान है कि इस साल जनवरी-मार्च की तिमाही में 0.7 प्रतिशत के हिसाब से सकारात्मक विकास दर्ज हो सकती है, जबकि पिछली तिमाही में विकास दर 0.1 प्रतिशत थी। अप्रैल 2020 के महीने से अर्थव्यवस्था पर लॉकडाउन का बुरा असर काफी गहराई से महसूस होने लगा। अगर 2020-21 के पूरे वित्तीय साल की विकास दर को देखें तो क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज़ के अनुसार ये 11.5 फीसदी होगी। एजेंसी ने 2021-22 वित्तीय वर्ष में भारत की अर्थव्यवस्था में सकारात्मक 10.6 फीसदी का अनुमान लगाया है।

 वास्तविकता यह है कि नवंबर 2020 से क्रेडिट डिमांड में तेज़ी आई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक 15 जनवरी तक बैंकों ने क्रेडिट डिमांड में 6.1 की बढ़ोतरी बताई है। सरकारी संस्थाओं ने दावा किया है कि रिकवरी ‘वी’ शेप में हो रही है। इसका मतलब यह हुआ कि लॉकडाउन के दौरान सभी क्षेत्रों में विकास की दर नीचे गई और रिकवरी के दौरान उछाल सभी क्षेत्रों में हो रहा है। लेकिन कुछ विशेषज्ञ ये तर्क देते हैं कि रिकवरी ‘के’ शेप में हो रही है, जिसका मतलब ये हुआ कि कुछ क्षेत्रों में विकास हो रहा है, लेकिन कुछ दूसरे क्षेत्रों में या तो विकास की रफ़्तार बहुत सुस्त है या विकास नहीं हो रहा है। ये विकास की एक असमान रेखा की तरह है। संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के लिए समान तरीके से विकास नहीं हो रहा है। जीडीपी गणना में असंगठित क्षेत्र पूरी तरह से शामिल नहीं किया जाता है। कुल मिलाकर जबकि संगठित क्षेत्र में अपेक्षाकृत तेज़ी से गिरावट आई है, असंगठित क्षेत्र महामारी से बहुत अधिक प्रभावित हुआ है। रिकवरी में भी यही रुझान है। रिकवरी के मामले में चीन ने तो पूरी दुनिया को चौंका दिया है। जब पूरी दुनिया की ज्यादातर अर्थव्यवस्थाएं नकारात्मक ग्रोथ या कॉन्ट्रैक्शन (अर्थव्यवस्थाओं का संकुचन या सिकुड़ना) का सामना कर रही हैं या फिर मामूली ग्रोथ के लिए भी संघर्ष कर रही हैं, उस वक्त पर चीन ने ग्रोथ के बढि़या आंकड़ों से दुनिया को हैरत में डाल दिया है। चीन की इकोनॉमी जिस रफ्तार से बढ़ रही है वह कोरोना से जूझ रहे दूसरे देशों के लिए कल्पना से भी ज्यादा है।

 कारण साफ है कोरोना पर जल्द कंट्रोल पाने की वजह से चीन अपनी आर्थिक ग्रोथ को रिकवर करने में सफल रहा है। ऐसे में अगर हम कोविड-19 पर कंट्रोल कर सकते हैं तो हम आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ा सकते हैं। इसी वजह से केवल एक तिमाही में ही चीन की ग्रोथ नेगेटिव हुई और उसके बाद इसमें धीरे-धीरे तेजी आने लगी। हमें अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए कोरोना कंट्रोल पर पूरा फोकस देना होगा। आम आदमी भी इस पर सहयोग करे तो आर्थिक हालात को माकूल बनने में मदद हो पाएगी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी उम्मीद जताई है कि 2022-23 में धीमा होकर 6.8 प्रतिशत होने से पहले अगले साल देश की जीडीपी में 11.5 प्रतिशत की विकास दर से बढ़ोत्तरी होगी। लेकिन आलोचक कह रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आंकड़े संग्रह करने वाली कोई स्वतंत्र एजेंसी नहीं है। वह सरकार के आंकड़ों पर भरोसा करती है। वे किसी तरह से घबराहट की स्थिति को भी नहीं पैदा करना चाहते हैं, लिहाज़ा वे गुलाबी तस्वीर ही पेश करते हैं। लेकिन उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इस विरोधाभास को गलत साबित करने के लिए हमें देश हित में अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर पॉजिटिव रहना होगा। यकीनन हमारी आर्थिकी मंदी से जीतेगी। सुझाव है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नॉलॉजी सेक्टर की नीतिगत समस्याओं को दूर करना होगा और उसे प्राइवेट प्लेयरों के लिए दिलचस्प बनाना होगा। सरकार को सार्वजनिक सुविधाओं शिक्षा, हेल्थ, बेहतर पर्यावरण, सड़क, बांध के क्षेत्र में निवेश करना चाहिए।

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इन झीलों को कम खतरनाक नहीं आंका जा सकता और उत्तराखंड जैसी त्रासदी कहीं और न हो, इसके लिए इन झीलों की सतत निगरानी हो...

जलवायु परिवर्तन आज के युग की वास्तविकता बन चुकी है। प्रचलित विकास मॉडल के लिए ऊर्जा की अत्यधिक आवश्यकता है और यह जरूरत लगातार बढ़ती ही जा रही है। वही  ज्यादा विकसित माना जाता है जो ऊर्जा की खपत ज्यादा करता है। ऊर्जा पैदा करने के प्रमुख साधन कोयला, पेट्रोलियम और बांध आधारित जल विद्युत भी हरित प्रभाव गैसों का उत्सर्जन करने वाले हैं। इन गैसों का वायु मंडल में एक सीमा से ज्यादा जमा हो जाना सूर्य की गर्मी को परावर्तित नहीं होने देता है, वायु मंडल में ही पकड़ कर रखता है। इससे भूमि की सतह पर तापमान वृद्धि हो रही है। पिछली सदी के मुकाबले तापमान में एक डिग्री सेंटीग्रेड वृद्धि हो चुकी है। हिमालय सहित पर्वतीय क्षेत्रों में मुकबलतन ज्यादा वृद्धि हुई है। इसी का परिणाम है कि हिमालय के हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं। हिमरेखा लगातार पीछे हट रही है। इसी प्रक्रिया के फलस्वरूप पिघलते हिमनद टूट कर अपने साथ अन्य मलबा लेकर जब संकरी घाटियों में गिरते हैं तो उससे बर्फ  के बांध बन जाते हैं और उनमें पिघलते हिमनदों का पानी जमा होकर छोटी-छोटी झीलें बन जाती हैं। इन झीलों के बर्फानी बांध जब पिघल कर कमजोर हो जाते हैं तो टूट जाते हैं। इस तरह झीलों का अथाह जल अपने साथ बाढ़ में आसपास की मिट्टी, पत्थर बहा कर ले जाता है और भयानक बाढ़ का कारण बनता है।

 90 के दशक में सतलुज की अभूतपूर्व बाढ़ जिसमें पार्छू नदी पर बनी झील के टूटने से ही सतलुज के दोनों किनारों की आबादियों को भारी नुकसान हुआ था। 2013 की केदारनाथ त्रासदी को कौन भूल सकता है, जिसके जख्म अभी भी भरे नहीं हैं। हजारों की संख्या में जनजीवन की  हानि हुई। बस्तियां उजड़ गईं। हंसते खेलते परिवार काल के ग्रास बन कर धूल में मिल गए। राष्ट्रीय संपत्ति की भारी हानि हुई, जिसकी भरपाई आज तक करना कठिन हो रहा है। उस त्रासदी से अभी उबरे भी नहीं थे कि 7 फरवरी 2021 को चमोली जिले की ऋषिगंगा में तबाही का भयानक मंजर पेश हो गया। सैकड़ों जानें चली गईं। रास्ते, पुल, आवास, सड़कें मटियामेट हो गईं। अभी तक भी इस दुर्घटना के कारणों की सटीक जानकारी नहीं है। भू-वैज्ञानिक भी इतनी भारी मात्रा में जल प्रवाह के स्रोत का पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं।

धौली गंगा घाटी में इतनी बड़ी जल राशि का इकट्ठा होना अनुदर्शन प्रणाली से कैसे छुपा रहा? हिमालय की संवेदनशील भू-वैज्ञानिक स्थिति के समुचित अध्ययन का न होना भी चिंता का कारण है। हिमालय में विकास योजनाएं केवल इंजीनियरिंग की समझ से बना देना अधूरी वैज्ञानिकता का उदाहरण है, जबकि  हिमालय में भूकंप के खतरे और अन्य संवेदनशीलताओं के चलते बहुत सावधानी से परिस्थिति-विज्ञान के सब पहलुओं को ध्यान में रख कर योजना बनाने की जरूरत है। हिमालय जो तीसरा ध्रुव कहा जाता है, इसमें ऐसी असावधानियां न केवल हिमालयी क्षेत्रों को बल्कि पूरे भारत को महंगी पड़ने वाली हैं। देश को हिमालय से प्राप्त होने वाली पर्यावरणीय सेवाओं पर खतरा मंडरा सकता है। समय-समय पर हिमालय में पर्वत विशिष्ट विकास मॉडल की बात योजना आयोग और अब नीति आयोग में भी उठती रही है, किंतु उस पर कोई अमल होते हुए दिखाई नहीं देता है और अर्ध-वैज्ञानिक समझ से योजनाएं बनती जा रही हैं जिसका परिणाम देश भोग रहा है। योजना निर्माण कार्यों में बरती जा रही लापरवाहियों का ही उदाहरण है कि ऋषि गंगा और विष्णुगाड़ परियोजनाओं में कार्यरत कामगारों के परिवारों के पते तक नहीं हैं।

सुरंग में कितने लोग फंस गए, उनकी संख्या तक का पता नहीं है। निर्माणकर्ता कंपनियां स्थानीय लोगों के हितों और कामगारों की सुरक्षा के प्रति कितनी गंभीर हैं, इसी से पता चल जाता है। हिमाचल प्रदेश भी इन खतरों से अछूता रहने वाला नहीं है। हिमाचल प्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र द्वारा इसरो के सहयोग से किए गए अध्ययन में हिमाचल प्रदेश के सतलुज, ब्यास, रावी और चेनाब जलागमों के बारे में तकनीकी रपट जारी हुई है, जिसमें यह बात सामने आई है कि हिमनदों के आकार-प्रकार में तेजी से परिवर्तन आ रहा है, जिससे बर्फानी मलबे से बने बांधों से झीलें बन रही हैं, जो टूटने पर बड़ी तबाही का कारण बन सकती हैं। हिमालय में बड़े भूकंपों की संभावना बनी ही रहती है। ऐसी स्थिति में इन हिमनद झीलों के फटने का खतरा और भी बढ़ जाएगा। इसलिए आपदा प्रबंधन की तैयारी के लिए इन झीलों की सतत निगरानी की जरूरत है, ताकि तदनुरूप सुरक्षा की दृष्टि  से उचित व्यवस्थाएं की जा सकें। जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारक मानवीय विकास गतिविधियां हैं, जिसके कारण हरित प्रभाव गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। ये गैसें ही वैश्विक तापमान वृद्धि का कारण हैं।

 21वीं सदी में वैश्विक तापमान 1.1 डिग्री सेंटीग्रेड से 2.9 डिग्री तक बढ़ सकता है। हिमालय और इसके पड़ोस के मैदानी क्षेत्रों के विश्लेषण से यह बात सामने आई है कि मैदानी इलाकों के मुकाबले हिमालय में तापमान की वृद्धि दर अधिक है। इसलिए पर्वतीय क्षेत्रों का परिस्थिति तंत्र सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। बर्फबारी के क्रम में बदलाव, सर्दियों का देर से शुरू होना और जल्दी समाप्त होना, गर्मियों में तापमान की वृद्धि, जिसके कारण ग्लेश्यरों के पिघलने की बढ़ती दर और इसके कारण नदियों के जल बहाव का तरीका बदल गया है। उत्तर पश्चिमी हिमालय की नदियों में पानी की मात्रा में गिरावट दर्ज की गई है। 1866 से 2006 के बीच सर्दियों की बारिश में ज्यादा अंतर नहीं आया है, किंतु बरसात की बारिश में कमी की ओर बदलाव हो रहा है। बड़ा शिन्ग्री ग्लेशियर हिमाचल का सबसे बड़ा ग्लेशियर है जिसका क्षेत्रफल 137 वर्ग किलोमीटर है। इसके क्षेत्रफल में 1906 से 1995 के बीच 4.33 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है।

इस समय ग्लेशियर पिघलने की दर में 10 फीसदी वृद्धि के कारण 3.4 फीसदी अधिक पानी उपलब्ध हो रहा है, किंतु 40 वर्षों बाद तक ये ग्लेशियर समाप्त हो चुके होंगे। तब दक्षिण एशिया को जल संकट का सामना करना पड़ेगा। 2018 में किए गए एक विश्लेषण में यह सामने आया कि सतलुज जलागम में कुल 769 झीलें हैं जिनमें से अधिकांश 5 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल की हैं, जबकि 57 झीलें 5 से 10 हेक्टेयर और 49 दस हेक्टेयर से बड़ी हैं। यह संख्या 2017 के मुकाबले 127 झील ज्यादा है। चेनाब जलागम में 2018 में 254 झीलें पाई गईं जो 2015 में 192 थीं, जबकि ब्यास में 2018 में 65 झीलें पाई गईं जो 2017 के मुकाबले 8 फीसदी कम हैं। इसका कोई स्थानीय कारण हो सकता है। ग्लेशियर से बनने वाली झीलों की संख्या बढ़ रही है। अतः खतरे की दृष्टि से इन झीलों को कम खतरनाक नहीं आंका जा सकता और उत्तराखंड जैसी त्रासदी कहीं और न हो, इसके लिए इन झीलों की सतत निगरानी की सख्त जरूरत है।