Tuesday, April 13, 2021 10:03 AM

आइए, टिकिट हम देते हैं

पूरन सरमा

स्वतंत्र लेखक

चुनाव टिकिटार्थियों में मारा-मारी मची हुई है। चुनाव में खड़े होने वाले को पार्टी के नए कायदे-कानून समझाए जा रहे हैं। भीड़ कम करने के लिए स्वच्छ छवि की दुहाई दी जा रही है। जनता में उत्तम छवि तथा सही चरित्र वाले को टिकिट देने की पार्टियां आए दिन घोषणाएं कर रही हैं। लेकिन उत्तम छवि और उत्तम चरित्र वाले घरों में दुबके पड़े हैं। सारे लुच्चे, लफंगे और छंटे हुए असामाजिक तत्व व आपराधिक दागी लाइन में लगे हुए हैं। गबन-घोटाले तथा सरकारी पूंजी में सेंध लगाने वाले भी इसी भीड़ में हैं। लेकिन मैं इन सबसे बेखबर हूं। मुझे पता है पार्टी हाईकमान टिकिट फेयर रूप में ऑफर नहीं करेगा तो मैं चुनाव का टिकिट ब्लैक में खरीद लूंगा। उसके दो कारण हैं, एक तो मैं काली कमाई का मालिक हूं। मैंने अकूत संपत्ति जा-बेजा तरीके से इकट्ठी कर रखी है और आजकल चुनाव पैसा खर्च करके जीता जाता है। छवियों से चुनाव जीतने का चलन होता तो पता नहीं राजनीति में बेईमान होते भी या नहीं?

 चुनाव में मैं अपना काला धन पार्टी को देता हूं और चुनाव के समय चुनाव सीमा से हजार गुना धन खर्च करूंगा तो मैं नहीं तो क्या ‘आप’ का उम्मीदवार जीतेगा। बल्कि मैं तो बिचौलिया भी हूं, पार्टी कार्यालय में बायोडाटा लेकर घूमने के बजाय मुझसे मिलें-टिकिट मैं दिलवाऊंगा। मेरे पास दागी से दागी उम्मीदवार भी टिकिट के लिए संपर्क कर सकता है। पार्टी हाईकमान मेरी शक्तियों से भली प्रकार से परिचित है। अपने क्षेत्र का नामी-गिरामी लफंगा हूं। पता नहीं कितने मेरे ऊपर अदालत में मामले लंबित हैं और कितनी बार जेल यात्रा कर आया हूं, लेकिन सबमें रिश्वत-कमीशन के बूते पर निर्दोष साबित हुआ हूं। राजनीति में मैंने कोई कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं।

 चुनाव कोई मिशन तो है नहीं, यह तो एक स्टंट है, जिसे अपना कर पंद्रह-बीस दिन की भाग-दौड़ से जीता जा सकता है। मेरे एक उम्मीदवार मित्र पिछले दो-तीन माह से बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों से अपना बायोडाटा बनवा रहे हैं। मैंने कहा भी कि इन काजगी पुर्जों के चक्कर के बजाय मेरे चक्कर लगाओ, मैं दिलवाऊंगा चुनाव का टिकिट। लेकिन उनके थोड़ा अन्ना का भूत सवार है, अतः वे छवि से टिकिट लेने व चुनाव में जीतने में विश्वास रखते हैं। उन्हें पता नहीं है, यह अन्नाओं का या केजरीवालों का युग नहीं है। यह राजनीति विशुद्ध बदमाशों और लफंगों की रणभूमि है, जिसमें यही पैंतरेबाजी काम आती है। पार्टियों के हाईकमान कौनसे दूध के धुले हैं। वे कौनसे नेहरू, गांधी या पटेल हैं? वे भी हमारे वाले ग्रास रूट से होकर पार्टी में पोजीशन ले सके हैं। उन्हें सब पता है वोटर को कैसे और कौन लुभा सकता है। यह भी पता है कि ये परिवर्तन की बातें करने वाले मतदान करने ही नहीं आते। मतदान के लिए तो भौतिक आडम्बर अपनाकर वोटर को पोलिंग बूथ तक मनुहारपूर्वक ले जाया जाता है और बूथ से निकलते ही सौ जूते और हुक्के पानी पेश किया जाता है। क्योंकि पांच वर्ष तक उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है। अभी जो मारा-मारी मची हुई है, उसमें तो मुझे मेरे अकेले दोस्त के सिवा कोई उम्मीदवार दिखाई नहीं दे रहा।