Sunday, July 25, 2021 08:17 AM

सिस्टम में फंसा आम नंबर

जमीन चाटती नाक ऊंची रखने के लिए उनका इंटरनेट लगवाया। इंटरनेट का कनेक्शन लगाने से पहले उनके गजब के दावे। हमारे नेट की स्पीड ये होगी, हमारे नेट की स्पीड वो होगी कि आप उसे छूते ही चार सौ बीस बोल्ट का झटका फील करेंगे। पर जो नेट लगा तो महीने बाद ही धूल चाटती नाक की परवाह किए बिना नेट कटवाने को मजबूर होना पड़ा। उनके ऑफिस चेहरे पर कटी नाक ले नेट कटवाने गया तो मैंने उनसे कहा, ‘सर! आपका नेट कटवाना चाहता हूं।’ मुझे देखने से पहले ही वे मुझे गजब के घूरे तो मैं तत्काल समझ गया नेट काटने वाले सज्जन यही हैं। न होते तो मुझे यों न घूरते। यह आम है जो किसी ऑफिस में आप कोई काम करवाने जाओ और जो कोई आपको काम बताते ही घूर जाए तो समझ लो काम इसी बंदे की सीट का है। दफ्तरों में बिना काम के कोई जनता को यों ही नहीं घूरता। ‘कहिएए क्या काम है?’ ‘नेट कटवाना चाहता हूं।’ ‘कटवाना ही था तो लगवाया ही क्यों था? देखो, आज की तारीख में नेट कटवाना नाक कटवाने से भी बुरा समझा जाता है सोसाइटी में।

 इधर लोग कटी नाक छिपाने के लिए नेट लगवा रहे हैं और एक आप हैं कि कटी नाक दिखाने के लिए नेट कटवा रहे हैं. आखिर क्यों?’ ‘बस, यों ही कुछ भी समझ लीजिए। असल में मैं सोशल मीडिया से बहुत तंग आ गया हूं।’ ‘देखो, ऐसे तो नेट कटेगा नहीं। पहले हमारा नेट का सामान हमारे ऑफिस लाइए।’ ‘पर वह लाना तो आपका काम है।’ ‘हमारे पास बंदों की कमी है।’ ‘ठीक है।’ और मैं अगले दिन उनके नेट का सारा सामान ले उनके ऑफिस पहुंच गया, ‘लीजिए साहब! आपका सामान!’ ‘अब अर्जी लिखो।’ ‘किसलिए?’ ‘नाक, सॉरी नेट कटवाने को।’ ‘मैंने उनके गुस्साते हुए उनसे कागज ले अर्जी लिखी और घर आ गया। ...पर कटे नेट का बिल फिर आया तो मैंने उनके श्रीचरणों में जा सादर पूछा, ‘साहब! नेट तो कट गया, पर बिल आ गया।’ मेरे कहने पर वे मुझे फिर सिर से पांव तक घूरे और कुछ देर तक घूरने के बाद सामने रखे सिस्टम में कुछ ढूंढते बोले, ‘तो क्या हो गया? ये कौन सी नई बात है?

नल में पानी न आने के बाद भी बिल देते हो कि नहीं?’ ‘देता हूं।’ मैंने कायर होते कहा। ‘अस्पताल में रोगी की सांसें बंद हो जाने के बाद भी उसके तीमारदार उसकी सांसों का बिल देते हैं कि नहीं?’ ‘देते हैं।’ उस वक्त मुझे वह बंदा बंदा कम, दार्शनिक अधिक लगा। हाय! बंदा गलती से किस कुर्सी पर फंस गया। ‘जब सब जगह देना पड़ता है तो यहां कटे नेट का बिल देने में आनाकानी क्यों?’ ‘पर...।’ ‘देखिए! आपका नंबर सिस्टम में फंस गया है।’ वे मुझको घूरते बोले। ‘तो?’ ‘सिस्टम फंसाने के लिए होता है या...।’ ‘ये हम नहीं जानते। हम तो बस, सिस्टम के साथ होते हैं। हमारा काम सिस्टम के साथ रह जनता की सेवा करना है चौबीसों घंटे। साहब को कई बार कहा कि सिस्टम ठीक नहीं। पर वे सुनते ही नहीं। वे बेचारे अपने सिस्टम को लेकर परेशान हैं।’ ‘तो अब ये सिस्टम कब तक ठीक होगा?’ ‘कुछ कह नहीं सकते। जब कोई सिस्टम ठीक करने वाले आएगा तब ही पता चलेगा। सिस्टम को अपने आप तो ठीक नहीं किया जा सकता न!  और जिसके हाथ में सिस्टम हो, वो सिस्टम ठीक करवा अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने से तो रहा। अब तो ये खुदा की मेहरबानी से ही ठीक हो जाए तो हो जाए।’ ‘तो मुझे कटे नेट का बिल कब तक आता रहेगा?’ ‘ये तो प्रभु ही जाने! या फिर ये सिस्टम! सिस्टम के आगे मेरी तो क्या खुदा की भी नहीं चलती।’ उन्होंने कहा और काम न होने के बाद भी निष्काम काम की मुद्रा में काम करने लग गए।

अशोक गौतम

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