Saturday, January 23, 2021 05:36 PM

कांग्रेस में चुनाव की संस्कृति नहीं: प्रो. एनके सिंह, अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

इसके बावजूद इसके नाम कमजोर लोकतांत्रिक कार्यशैली का कमजोर रिकार्ड है। वे 23 नेता, जो पार्टी संगठन के चुनाव की मांग कर रहे हैं, पार्टी के शत्रु नहीं हैं। वास्तव में वे मुरझाती हुई पार्टी की आत्मा को फिर से जगाने के लिए लड़ रहे हैं। यह भी स्पष्ट है कि वे उन चुनावों की मांग कर रहे हैं, जिसका प्रावधान पार्टी संविधान में है। फिर भी चुनाव नहीं हो पा रहे हैं और अगर होते हैं तो लोकतांत्रिक तरीके से नहीं हो पाते हैं। लगता है कि कांग्रेस टीम वर्क की भावना अथवा विजन के साथ नेतृत्व के बजाय शक्तिशाली व्यक्तित्व द्वारा निर्देशित है। उदाहरण के रूप में महात्मा गांधी का मामला लेते हैं। वह कभी भी लोकतांत्रिक नहीं थे क्योंकि उन्होंने ऐसे तरीके प्रयोग में लाए जिससे चुनावी संस्कृति नष्ट हो गई। सुभाष चंद्र बोस को पार्टी तथा देश को छोड़ना पड़ा…

इंडियन नेशनल कांग्रेस अपना रास्ता भूल गई है। पार्टी के भीतर और बाहर कोई भी नहीं जानता कि वे किस दिशा में जाएंगे और किन लक्ष्यों का अनुसरण करेंगे। यही कारण है कि पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष गोवा चली गई हैं तथा युवा नेता राहुल गांधी व प्रियंका गांधी शिमला में छुट्टियां बिता रहे हैं। और यह सब बिहार चुनाव के परिणाम घोषित होने से पहले हुआ है, वे चुनाव जो सभी दलों के लिए निर्णायक हैं। बिहार के चुनाव का कांग्रेस के लिए स्पष्ट संदेश है। पहला सबक यह है कि कांग्रेस किस प्रकार तेजस्वी यादव से स्पर्धा कर सकती है जो युवा और व्यक्तिगत रूप से सक्रिय होने के कारण बिहार में सबसे ज्यादा सीटें जीतने में सफल रहे हैं। आठवीं कक्षा पास एक व्यक्ति बिहार के जन नेता के रूप में उभरा है। हो सकता है, ऐसा लंबे समय तक न चले, लेकिन फिलहाल तेजस्वी भीड़ को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे हैं। उधर राहुल गांधी ने आर्थिकी या विज्ञान पर प्रवचन जारी रखे हुए हैं, जो ‘ऑफ दि मार्क’ थे। कांग्रेस को नेतृत्व के प्रश्न को गंभीरता से लेना चाहिए तथा इसे बिना किसी तैयारी और विफलता के विश्लेषण के ‘फैमिली सिंड्रोम’ पर नहीं छोड़ना चाहिए। कांग्रेस के लिए दूसरा सबक यह है कि केवल जमीनी स्तर पर नजदीकी रिश्ते ही किसी राजनीतिक दल की मदद कर सकते हैं, न कि पंचतारा संस्कृति, जैसे कि गुलाम नबी आजाद ने कहा भी है।

गुलाम नबी आजाद पहली बार अपनी ‘मानसिक गुलामी’ को छोड़ते हुए ‘आजाद’ नजर आए हैं और उन्होंने पार्टी संगठन में चुनाव की मांग कर डाली है। गुलाम नबी आजाद जानते हैं कि पार्टी चुनाव को एक प्रहसन की तरह लेती है तथा वास्तविक रूप में वहां चुनाव की संस्कृति न होने के कारण यह सही रूप में नहीं हो पाते हैं। पार्टी के नेताओं ने जब यह देखा कि बिहार के घटनाक्रम को लेकर कोई चिंतित नहीं है, तो उन्होंने आम फार्मूला प्रयोग में लाया। पार्टी के 23 नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष को पत्र लिखकर संगठन के चुनाव की मांग की। बिहार चुनाव से कांग्रेस ने कुछ आशाएं लगाई हुई थीं, परंतु इसके परिणामों को जिस तरह उसने गंभीरता से नहीं लिया, वह सचमुच ही हैरान करने वाला है। पार्टी के अध्यक्ष या किसी बड़े नेता ने इस परिणाम पर कोई टिप्पणी नहीं की, न ही कोई विश्लेषण अथवा विचार-विनिमय हुआ।

अपने नेताओं को व्यस्त रखने के लिए सोनिया गांधी ने केवल यह किया कि तीन कमेटियों का गठन कर दिया। वह दिल्ली छोड़कर गोवा चली गईं तथा वहां दिल्ली के प्रदूषण से राहत पाने की कोशिश कर रही हैं। पार्टी, जो कभी सबसे बड़ा दल हुआ करती थी तथा पूरे भारत में शासन करती थी, एक के बाद एक चुनाव हार रही है तथा इसके बड़े नेता चिंतित नजर नहीं आ रहे हैं। समस्या यह है कि पार्टी वंशवादी तरीके से चल रही है तथा परिवार के पार वह देख नहीं पा रही है। पार्टी में कार्य व उत्तरदायित्व के लिए किसी की जवाबदेही तय नहीं की जा रही है। इससे संदेश यह जा रहा है कि जो तुम चाहते हो, उसे करो, तुम्हें कोई नुकसान नहीं होगा। इस तरह की कार्यप्रणाली राजतंत्र अथवा तानाशाही सरकार में अपनाई जाती है।

लोकतंत्र में पार्टी निर्वाचकों के प्रति जवाबदेह होती है तथा वह जनता की इच्छाओं के विरुद्ध न तो काम कर सकती है और न ही उसकी इच्छाओं की उपेक्षा कर सकती है। ऐसा ‘ओनरशिप कंपनी’ में भी संभव है, जहां परिणामों को वही झेलता है जो कंपनी में निवेश करता है। जो दल लोकतांत्रिक होने का दावा करता है अथवा जनता की सहभागिता से चलता है, वह जनता की इच्छाओं की उपेक्षा नहीं कर सकता। एक राजनीतिक पार्टी के रूप में, जो देश की आजादी के लिए लड़ी तथा संघर्ष किया, इसे लोकतंत्र और लोक दायित्व के उच्च आदर्श को अनिवार्य रूप से प्रतिष्ठापित करना चाहिए। इसे सबसे बढि़या दिमाग तथा ऐसे नेताओं का मार्गदर्शन मिलता रहा है, जिन्होंने देश की रक्षा के लिए कुर्बानियां दीं।

इसके बावजूद इसके नाम कमजोर लोकतांत्रिक कार्यशैली का कमजोर रिकार्ड है। वे 23 नेता, जो पार्टी संगठन के चुनाव की मांग कर रहे हैं, पार्टी के शत्रु नहीं हैं। वास्तव में वे मुरझाती हुई पार्टी की आत्मा को फिर से जगाने के लिए लड़ रहे हैं। यह भी स्पष्ट है कि वे उन चुनावों की मांग कर रहे हैं, जिसका प्रावधान पार्टी संविधान में है। फिर भी चुनाव नहीं हो पा रहे हैं और अगर होते हैं तो लोकतांत्रिक तरीके से नहीं हो पाते हैं। लगता है कि कांग्रेस टीम वर्क की भावना अथवा विजन के साथ नेतृत्व के बजाय शक्तिशाली व्यक्तित्व द्वारा निर्देशित है। उदाहरण के रूप में महात्मा गांधी का मामला लेते हैं। वह कभी भी लोकतांत्रिक नहीं थे क्योंकि उन्होंने ऐसे तरीके प्रयोग में लाए जिससे चुनावी संस्कृति नष्ट हो गई। सुभाष चंद्र बोस को पार्टी तथा देश को छोड़ना पड़ा। सरदार वल्लभ भाई पटेल को जवाहर लाल नेहरू का प्रधानमंत्रित्व स्वीकार करने के लिए अपनी पद-स्थिति का त्याग करना पड़ा। इंदिरा गांधी शक्तिशाली नेता थीं तथा विपक्ष को मात देने के लिए वह अपनी क्षमता के बल पर जीत सकती थीं। सोनिया गांधी भी शक्तिशाली नेता हैं, किंतु वह कमजोर सहभागिता वाली व्यवस्था में संचालन नहीं कर सकती हैं। उन्होंने परोक्ष स्थिति में पृष्ठभूमि से संचालन करना चुना है।

मेरा पार्टी द्वारा कराए गए जाली चुनावों को लेकर निजी अनुभव है, जबकि कोई चुनाव नहीं हुआ, किंतु सभी ने हस्ताक्षर किए तथा परिणाम घोषित किए गए। उस स्थिति में यहां तक कि पर्यवेक्षक ने सूचित किया कि कोई चुनाव नहीं हुए, किंतु चुनाव घोषित किए गए। अगर पार्टी संगठन के इसी तरह चुनाव होते रहे तो यह सही नेतृत्व को विकसित करने में मदद नहीं करेगा। यह बिल्कुल उचित समय है जब पार्टी को सही तरीके से रचनात्मक आत्मावलोकन करना चाहिए। इसी से पार्टी का कैडर तथा नेतृत्व फिर से जीवित हो पाएगा। पार्टी को अगर सही अर्थों में उभरना है तो उसे अपनी लोकतांत्रिक छवि बनानी होगी। देश की जनता का विश्वास जीतने के लिए ऐसा करना जरूरी है। ऐसा करके ही वह चुनाव में दूसरे दलों से स्पर्धा भी कर पाएगी। जन संगठन बनकर ही कांग्रेस का अपना तथा देश का कल्याण होगा।

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