Sunday, May 09, 2021 07:15 PM

परंपरागत जल स्रोतों का संरक्षण जरूरी

राजीव पठानिया

लेखक नूरपुर से हैं

मानव भोजन के बिना तो कुछ समय निकाल सकता है, लेकिन पानी के बगैर सांसें थम जाती हैं। गर्मियां आने पर हिमाचल प्रदेश में भी पेयजल समस्या खूब परेशान करती है। कई स्थानों पर तो गर्मियों के शुरू में ही हालात इस कद्र अनियंत्रित हो जाते हैं कि पेयजल आपूर्ति के लिए पानी के टैंकरों की सहायता ली जाती है। बदलते परिवेश में जल शक्ति विभाग प्रदेश के लोगों को उठाऊ पेयजल योजनाओं के माध्यम से पेयजल उपलब्ध करवा रहा है, जबकि पहले लोग बावडि़यों, कुओं, झरनों व ख़ातियों का पानी इस्तेमाल करते थे। जब से प्रदेश में जल शक्ति विभाग पेयजल उपलब्ध करा रहा है, तभी से प्रदेश के लोगों ने पारंपरिक जल स्रोतों की अनदेखी करना शुरू कर दी है।

इसी अनदेखी के कारण गर्मियां आते ही ये पारंपरिक जल स्रोत सूखने लग जाते हैं। यदि लोग प्राकृतिक जल स्रोतों की सुरक्षा के लिए सजग नहीं हुए तो गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ेगा। वास्तव में प्रकृति से जितना जल समाज को मिल रहा है, उसका सही उपयोग नहीं हो पाता है। जब पेयजल योजनाएं हांफने लगती हैं, तब लोगों को प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण की याद आती है। इसके बावजूद कई स्थानों पर जल संकट के भयावह खतरों से बेपरवाह इनसान निजी हितों के लिए प्राकृतिक जल स्रोतों को नुकसान पहुंचाने से भी नहीं कतराता। अवैध-अवैज्ञानिक खनन के जरिए भी प्राकृतिक जल संसाधनों पर कहर बरपाया जा रहा है। दूसरी ओर आधुनिक मशीनों से की जा रही नलकूप क्रांति से तबाही के मंजर को आमंत्रित किया जा रहा है। इसका तत्काल समाधान नहीं ढूंढा गया तो भविष्य में भारी जल संकट पैदा होना तय है। हिमाचल में गिर रहा भू-जल स्तर हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई बावडि़यों व कुओं का महत्त्व समझने के लिए विवश कर रहा है। आज जरूरत है कि समाज दूरदृष्टि का परिचय देते हुए जल संसाधनों के बेतरतीब उपयोग की स्वार्थी मानसिकता को छोड़े। तभी पेयजल योजनाएं हांफने पर भी हमें पेयजल संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा।