Sunday, July 25, 2021 08:38 AM

बागबानी के लिए नरेंद्र बरागटा का योगदान

डॉक्टर सना की चार बहनें हैं। उनका कोई भाई नहीं है। वह कहती हैं कि उन्होंने कभी यह महसूस नहीं किया कि वह किसी पुरुष से कम हैं। उनके अनुसार ब्यूरोक्रेसी में कई महिलाएं हैं जो बहादुर हैं और अच्छा काम करती हैं, वह उन्हें ही फॉलो करेंगी...

पड़ोसी देश पाकिस्तान के सिंध प्रांत में रहने वाली डॉक्टर सना राम चंद वह पहली हिंदू लड़की हैं, जिनका नाम सेंट्रल सुपीरियर सर्विस (सीएसएस) परीक्षा पास करने के बाद पाकिस्तान प्रशासनिक सेवा के लिए सुझाया गया है। पाकिस्तान की सेवा करने के लिए जिन 79 महिलाओं का चयन किया गया है, उनमें डॉक्टर सना राम चंद इकलौती हिंदू महिला हैं। कामयाबी के बाद उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा, ‘वाहेगुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी की फतह। मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि अल्लाह की कृपा से मैंने सीएसएस 2020 को पास कर लिया है और पीएएस के लिए सिलेक्ट हो गई हूं। सारा श्रेय मेरे माता-पिता को जाता है।’ डा. सना सीएसएस की परीक्षा पास करने वाले 221 अभ्यर्थियों में शामिल हैं। 18553 परीक्षार्थियों ने यह लिखित परीक्षा दी थी। विस्तृत चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक और मौखिक परीक्षा के बाद अंतिम चयन किया गया। मेधा सूची निर्धारित होने के बाद अंतिम चरण में समूह आवंटित किए गए और उनका चयन पीएएस के लिए हुआ है।

पीएएस श्रेणी हासिल करने वालों को सहायक आयुक्त के तौर पर नियुक्त किया जाता है और बाद में प्रोन्नत होकर वे जिला आयुक्त बनते हैं, जो जिलों का नियंत्रण करने वाला शक्तिशाली प्रशासक होता है। पीएएस शीर्ष श्रेणी है। इसके बाद अक्सर पाकिस्तान पुलिस सेवा और पाकिस्तान विदेश सेवा तथा अन्य आते हैं। डा. सना राम चंद सिंध प्रांत के शिकारपुर जिले स्थित कस्बा चक की रहने वाली हैं। सना राम की प्राथमिक से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा वहीं से हुई थी। इसके बाद उन्होंने सिंध के चंदका मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया और फिर कराची के सिविल अस्पताल में हाउस जॉब की। उनके पिता भी स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े हैं। वह सिंध प्रांत के शिकारपुर जिले के ग्रामीण इलाके की रहने वाली हैं। हाल ही में उन्होंने सिविल अस्पताल कराची में प्रैक्टिस पूरी की है। फिलहाल वह सिंध इंस्टीट्यूट ऑफ यूरोलॉजी एंड ट्रांसपेरेंट से एफसीपीएस की पढ़ाई कर रही हैं और जल्द ही एक योग्य सर्जन बन जाएंगी। पाक के सिंध प्रांत में 20 लाख के लगभग हिंदू आबादी रहती है। पूर्व में इस समुदाय की अधिकांश लड़कियों ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े रोज़गार को प्राथमिकता दी है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस रुझान में बदलाव आया है और उन्होंने पुलिस और न्यायपालिका से जुड़े क्षेत्र में रोज़गार पाने का रुख किया है। सीएसएस की वार्षिक परीक्षा 2020 में कुल 18553 उम्मीदवार शामिल हुए थे और इनमें टेस्ट और इंटरव्यू के बाद केवल 221 लोगों का चयन किया गया है। पकिस्तान की सिविल सर्विस परीक्षा में सफलता की दर 2 प्रतिशत से भी कम रही है और उनमें से पाकिस्तान की सेवा करने के लिए जिन 79 महिलाओं का चयन किया गया है, उनमे डॉक्टर सना राम चंद भी शामिल हैं। डॉक्टर सना ने बताया कि कॉलेज तक तो उनका यही लक्ष्य था कि उन्हें डॉक्टर बनना है। सना बहुत ही होशियार छात्रा रही हैं और उन्हें शैक्षणिक उपलब्धि के लिए पदक भी मिला था।

 एमबीबीएस के बाद सना की आगे की पढाई ठीक चल रही थी और इस बारे में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उन्हें सीएसएस करना है। सिंध के सरकारी अस्पतालों की स्थिति और मरीज़ों की परिस्थिति को देखकर डॉक्टर सना राम चंद का दिल टूट गया और उन्होंने सीएसएस करने का फैसला किया। वह कहती हैं, ‘मैंने पहले दृढ निश्चय किया हुआ था कि एक सर्जन और यूरोलॉजिस्ट बनना है। इस क्षेत्र में बहुत कम लड़कियां हैं। चांडका अस्पताल या जो दूसरे सरकारी अस्पताल हैं, उनको जब मैंने देखा कि न यहां मरीज़ों की कोई देखभाल है और न हमारे पास संसाधन, वहां काम करने का माहौल परेशान करने वाला था।’ वह आगे कहती हैं, ‘इसके विपरीत ब्यूरोक्रेसी आपको एक ऐसा प्लेटफॉर्म देती है जहां आप कुछ न कुछ बदलाव ला सकते हैं। मैं एक डॉक्टर के रूप में मरीज़ों के इलाज के लिए प्रतिबद्ध हूं, लेकिन इससे अवसर सीमित हो जाता है। ब्यूरोक्रेसी में अधिक अवसर हैं जिससे हम समस्याओं को हल कर सकते हैं। यही मेरा टर्निंग प्वाइंट था।’ डॉक्टर सना के अनुसार उन्हें सीएसएस का विचार 2019 में आया। उन्होंने तैयारी शुरू कर दी और 2020 में पेपर दिए और पास हो गई। लेकिन फिर भी उन्होंने एफसीपीएस को जारी रखा और चिकित्सा अधिकारी की नौकरी नहीं छोड़ी। उन्होंने कोविड वार्ड की ड्यूटी के साथ इंटरव्यू की तैयारी की। डॉक्टर सना राम चंद का कहना है कि लोगों को सफलता दिखाई देती है, लेकिन इसके पीछे जो संघर्ष है वो दिखाई नहीं देता है। सुबह आठ बजे से लेकर रात के आठ बजे तक उनकी वार्ड में ड्यूटी रहती, फिर वह सीधे लाइब्रेरी जाती थी। ‘मैंने अपने मोबाइल से सभी सोशल मीडिया अकाउंट को डिलीट कर दिया था। अपना सामाजिक जीवन भी इस तरह ख़त्म कर दिया था कि अपने चचेरे भाई की शादी में भी नहीं गई थी। मुश्किल से छह से सात घंटे सो पाती थी। लड़काना की चिलचिलाती गर्मी में भी मुझे पढ़ाई करनी होती थी। मैं कहीं भी आती-जाती, तो रास्ते में पढ़ लेती थी। मोबाइल फोन में किताब होती थी और जितने अंग्रेजी अखबार हैं वो सब पढ़ती थी।’ डॉक्टर सना कहती हैं कि वह नौकरी नहीं छोड़ सकती थी और अपनी पढ़ाई भी नहीं छोड़ना चाहती थी। ‘अगर आप नौकरी करते हैं तो पढ़ भी सकते हैं। बात यह है कि आप कितने दृढ़ हैं।’ उनका मानना है कि अगर आपको यह करना है तो करना है। फिर आप कोई बहाना नहीं बना सकते कि मेरी तो नौकरी बहुत कठिन है। सना राम चंद का कहना है कि उनके जो दोस्त थे वो छह-छह महीने तैयारी करते थे, जबकि वह एक महीने में तैयारी करके परीक्षा देती थी। वह कहती हैं कि पहली कोशिश में सफल होने का फार्मूला केवल इतना सा है कि आप कितनी तवज्जो देते हैं।

 आपने ख़ुद को कितना समर्पित किया हुआ है और दिन में कितने घंटे बैठकर आप पढ़ते हैं। डॉक्टर सना राम चंद के माता-पिता उनके सीएसएस से ख़ुश नहीं थे लेकिन उनकी सफलता के बाद उन्होंने भी उन्हें प्रोत्साहित किया। उनके अनुसार जिस तरह दूसरों के माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे ब्यूरोक्रेसी में आएं, उनके माता-पिता ऐसा नहीं चाहते थे। उन्होंने अपनी मां से कहा था कि वो उन्हें एक कोशिश करने दें। अगर पास हो गई तो ठीक है अन्यथा वह चिकित्सा के फील्ड को जारी रखेंगी। जब लिखित परीक्षा का रिज़ल्ट आया तो उस समय मेरी तस्वीर सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुई और लोगों ने इसकी सराहना की, जिसके बाद मेरे माता-पिता ने मुझे प्रोत्साहित किया और कहा कि अपने शौक को पूरा करो। अब मेरे पास माता-पिता का सपोर्ट है जो पहले नहीं था। डॉक्टर सना की चार बहनें हैं। उनका कोई भाई नहीं है। वह कहती हैं कि उन्होंने कभी यह महसूस नहीं किया कि वह किसी पुरुष से कम हैं। उनके अनुसार ब्यूरोक्रेसी में कई महिलाएं हैं जो बहादुर हैं और अच्छा काम करती हैं, वह उन्हें ही फॉलो करेंगी। डॉक्टर सना की कामयाबी की कहानी इस पटल पर रखने का मकसद न सिर्फ  हमारी महिला छात्राओं को प्रेरित करना है, बल्कि हमारे सबके अंदर मौजूद क़ाबीलियत और मजबूत इच्छा शक्ति की ताकत को सफलता में बदलने की क्षमता को उजागर करना भी है। सना की सफलता न सिर्फ  उनके समुदाय के लिए फक्र की बात है, बल्कि उनके देश और परिवार के लिए भी यह एक प्रेरणा है।

डा. वरिंदर भाटिया

कालेज प्रिंसीपल

ईमेल : [email protected]

प्रदेश में टिश्यू कल्चर सेब उत्पादन के लिए प्रयोगशाला स्थापित करवाई। प्रगतिनगर (गुम्मा) में लंबे अरसे से बंद पड़ी सेब की पेटी के कार्टन की फैक्टरी में उपलब्ध इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग कर वहां वर्ष 2010-11 में अटल बिहारी वाजपेयी गवर्नमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नालोजी स्थापित किया जो कि जिला शिमला का पहला एकीकृत सरकारी इंजीनियरिंग, पॉलिटेक्निक और आईटीआई  कॉलेज है। यदि प्रदेश सरकारें इस संस्थान का उचित प्रबंधन करती हैं तो यह संस्थान प्रतिष्ठित संस्थान बन सकता है...

वैश्विक महामारी कोरोना से स्वस्थ होने के उपरांत उत्पन्न जटिलताओं के चलते पिछले शनिवार को जुब्बल-कोटखाई के विधायक, प्रदेश सरकार के मुख्य सचेतक और पूर्व बागबानी मंत्री श्री नरेंद्र बरागटा का  निधन हो गया। उनकी अकस्मात मृत्यु से अविस्मरणीय क्षति उनके परिवार, गांव और विधानसभा क्षेत्र को तो हुई ही है, साथ में जिला शिमला ने अपना एक कर्मठ, निर्भीक, तेज-तर्रार, प्रयत्नशील नेता तथा प्रदेश के लाखों बागबानों ने अपनी आवाज़ को भी खो दिया। वर्ष 1998 में वह शिमला सदर तथा 2007 और 2017 में पूर्व मुख्यमंत्री स्व. रामलाल ठाकुर के विधानसभा क्षेत्र और कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले जुब्बल-कोटखाई से दो बार विधानसभा में चुन कर आए। धूमल सरकार के दोनों कार्यकाल में वह बागबानी मंत्री रहे। यह ज्ञातव्य है कि स्व. बरागटा जिला शिमला के सेब बहुल क्षेत्र कोटखाई से संबंधित थे। स्व. सत्यानंद स्टोक्स एक शताब्दी पूर्व प्रदेश में सेब लेकर आए थे। इन 100 वर्षों में प्रदेश के बागबानों और किसानों के जीवन उत्थान और आर्थिकी में सेब उत्पादन का योगदान जगजाहिर है। प्रदेश की सभी सरकारें भी सेब बागबानी को समय-समय पर प्रोत्साहित करती आ रही हैं। स्व. बरागटा ने भी इस कड़ी को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया। बागबानी मंत्री रहते हुए उन्होंने सेब बहुल क्षेत्रों में सेब विपणन संबंधित संरचना को सुदृढ़ किया। खड़ा पत्थर, पराला, कमलानगर (शिमला) और सोलन की सब्जी मंडी जहां आज हज़ारों बागबान और किसान अपनी फसल बेचते हैं, इनके निर्माण में स्व. बरागटा का विशेष योगदान रहा है। फसल मंडी तक सही सलामत पहुंच सके, इसके लिए नई ग्रामीण सड़कें बनाने और पुरानी सड़कों की दशा सुधारने के भरसक प्रयास किए।

 ठियोग-हाटकोटी-रोहड़ू सड़क की गुणवत्ता को लेकर जनता के बीच रहे। सेब  आर्थिकी  को ओलावृष्टि से बचाने के लिए देश में सर्वप्रथम प्रदेश में एंटी हेल गन स्थापित कर बचाने के प्रयास किए। बागबानों से उगाहे जा रहे अवैध कमीशन के खिलाफ भी वह प्रयत्नशील रहे। प्रदेश के कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए सेब की नई किस्में धूमल सरकार में उन्होंने मंगवाई। प्रदेश में टिश्यू कल्चर सेब उत्पादन के लिए प्रयोगशाला स्थापित करवाई। प्रगतिनगर (गुम्मा) में लंबे अरसे से बंद पड़ी सेब की पेटी के कार्टन की फैक्टरी में उपलब्ध इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग कर वहां वर्ष 2010-11 में अटल बिहारी वाजपेयी गवर्नमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नालोजी  स्थापित किया जो कि  जिला शिमला का  पहला एकीकृत सरकारी इंजीनियरिंग, पॉलिटेक्निक और आईटीआई  कॉलेज  था। यदि प्रदेश सरकारें इस संस्थान का उचित प्रबंधन और रखरखाव करती हैं तो  यह संस्थान कोटखाई और प्रदेश का प्रतिष्ठित संस्थान बन सकता है। वर्तमान सरकार में मुख्य सचेतक रहते हुए भी बागबानी और बागबानों से संबंधित मुद्दे अपनी सरकार के समक्ष निर्भीकता और बेबाकी से उठाते रहे। सेब बागबानी के एक शताब्दी के सफर को देखा जाए तो यक़ीनन इसमें अपार संभावनाएं हैं। वर्तमान सरकार  इस बात को समझकर  बागबानी को प्रदेश के अन्य भागों में विकसित करने की ओर अग्रसर है। संपूर्ण प्रदेश में जब बागबानी विकसित हो जाएगी तो निश्चित रूप  से स्व. बरागटा भी उस श्रेय के हकदार होंगे क्योंकि 10 वर्षों तक वह इस मंत्रालय के निर्णायक रहे हैं और बागबानी को सुदृढ़ करने की दिशा में उपयुक्त प्रगतिशील कदम उन्होंने उठाए। स्व. बरागटा  का जनाधार जिला शिमला में तुलनात्मक रूप से अधिक था। वर्ष 1998 में वह शिमला सदर से विधानसभा चुनाव जीते तथा इसके बाद वह जुब्बल-कोटखाई से चुनाव लड़ते थे। पिछली भाजपा सरकार में वह जिला शिमला से एकमात्र मंत्री थे तो स्वाभाविक रूप से शिमला जिला की जनता से उनका संवाद था। वर्तमान सरकार में भी जब सभी मंत्री अपने-अपने क्षेत्रों या संबंधित विभाग के काम के सिलसिले में राजधानी से बाहर रहते थे तो स्व. बरागटा जी ही सचिवालय में सरकार के प्रतिनिधि हुआ करते थे। पिछले वर्ष  ठियोग विधानसभा क्षेत्र  से भाजपा के  पूर्व विधायक स्व. राकेश वर्मा का देहांत हुआ था।

 इन दोनों नेताओं के नेतृत्व  का असर आसपास के 4 विधानसभा क्षेत्रों   जुब्बल-कोटखाई, ठियोग, चौपाल और रोहड़ू में रहता था। जिला शिमला से संबंधित पूर्व मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह, श्रीमती विद्या स्टोक्स और श्री खुशी राम बालनाहटा प्रत्यक्ष राजनीति से दूर हैं। क्षेत्र और प्रदेश की जनता इनके उत्तम स्वास्थ्य की कामना करती है। इस लेख के माध्यम से  जिला के अन्य नेताओं के नेतृत्व को कम आंकने का  यह कदापि प्रयास नहीं है। इन नेताओं का दायरा यक़ीनन अपने विधानसभा क्षेत्र  तक ही सीमित नहीं रहा है और ये आम जन के नेता रहे हैं। इनकी दूरदृष्टि और नेतृत्व का लाभ जिला शिमला सहित प्रदेश को हुआ है। ऐसे में आज जिला शिमला के लिए  राजनीतिक शून्य सी स्थिति उत्पन्न हो रही है। जिला शिमला एक सशक्त नेतृत्व की आस लगाए बैठा है। आज तक इन नेताओं ने इस क्षेत्र, जिला और प्रदेश को जो दिशा दी है, हम उसके लिए इनके प्रति कृतज्ञ रहेंगे। जिस प्रगतिशील और विकासशील स्थिति में आज हमें हमारा समाज, क्षेत्र और प्रदेश मिला है, हमारा और हमारे आने वाले नेतृत्व का यही कर्त्तव्य रहना चाहिए कि इन नेताओं से जो विकास रूपी मशाल हमें मिली है, हम सकारात्मक ऊर्जा  से उसे आगे बढ़ाएं। स्व. नरेंद्र बरागटा और स्व. राकेश वर्मा द्वारा आम जन तक पहुंचने और उनकी मदद करने, उनकी आवाज़ बनने  तथा क्षेत्र और बागबानी के विकास संबंधित जज़्बे को जीवित रखना, उस पर अमल करना और उसका क्रियान्वयन करना ही इन सपूतों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

बीरेंद्र सिंह वर्मा

लेखक शिमला से हैं